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वो बलिदानी आर्यवीर जिन्होंने अक्टूबर माह में अपना जीवन बलिदान कर दिया

विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन जातियों ने अपने बलिदानी वीरों को भुला दिया, वह जातियां भी संसार के मानचित्र से ओझल हो गईं| इतना ही नहीं इस प्रकार की जातियों का नाम लेने वाला भी आज इस संसार में कोई नहीं मिलता| इस प्रकार जिन्होंने अपने इतिहास से प्रेरणा दायक स्मृति दिवसों की स्मृति को बनाए रखा, इतिहास में उन जातियों के लिए गौरवमयी स्थान सुरक्षित हो गया तथा वह जातियां प्रगति की शिखरों तक पहुँच गईं| उनकी अपनी जनता ने तो दिया सो दिया समग्र विश्व में उनको सम्मान दिया गया| इस कारण ही कहा जाता है कि:-

यूनान मिस्र रोमा सब मिट गए जहाँ से
बाक़ी है किन्तु अब तक नामोनिशान हमारा |

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की शिष्य मंडली अर्थात् आर्य समाज के अनेक सुप्रसिद्ध लेखक इस प्रकार के हुए हैं, जिन्होंने अपनी कलम के बल पर आज तक हमारे बलिदानियों की यादों को, स्मृति दिवसों को,उनके जीवन के प्ररेणाप्रद जीवनों तथा जीवानांशों को आज तक सुरक्षित बनाए रखा तथा आज भी रख रहे हैं| इन जीवनों से प्ररेणात्मक सन्देश देकर आर्य जनों को ही नहीं देश के जन जन के हृदयों को आंदोलित कर रहे हैं| इन पंक्रियों में हम इस प्रकार के कुछ आर्य वीरों के अत्यंत संक्षिप्त जीवन परिचयों से आर्य जनों को अवगत कराने जा रहे हैं, जिन्होंने अक्तूबर मॉस में जन्म लिया, अपना बलिदान दिया या फिर आर्य समाज के लिए अत्यधिक कार्य किया| यदि हम में से किसी ने भी इन जीवनों से प्रेरणा लेकर ऋषि के कार्य को आगे बढाने का संकल्प लेते हुए कार्य किया तो मैं समझूंगा कि मैं अपने उद्देश्य में सफल हो गया हूँ|

श्याम जी कृष्ण वर्मा

श्याम जी कृष्ण वर्मा स्वामी दयानंद सरस्वती जी के मुख्य शिष्यों में से एक थे| स्वामी जी के आदेश से आपने अपने जीवन के एक बहुत बड़े भाग को विदेश में बिताया| आप क्रांतिकारी आन्दोलन के एक प्रकार से जन्मदाता थे ओर देश की स्वाधीनता के लिए विदेश में रह कर योजनायें बनाकर उन योजनाओं को कार्यान्वित करते रहे| स्वामी जी के ही आदेश से आपने विदेश में रह रहे भारतीयों के अंत:करण में स्वाधीनता की चिंगारियां पैदा कीं अपितु उन्हें देश की आजादी के लिए संगठित करने का कार्य भी किया| इसके साथ ही साथ आप विदेश में रहते हुए यह बात प्रचारित करते रहे कि अंग्रेज भारत के मालिक नहीं, आक्रमणकारी हैं, आततायी हैं तथा वह बलात् रूप से भारत पर कब्जा बनाए हुए हैं| इसके साथ ही साथ विदेश रहते हुए विदेशियों के सामने भी सदा इस बात को साक्षात् करने का प्रयास भी करते रहे कि भारत में स्वाधीनता के लिए जो भी प्रयास किये जा रहे हैं. वह सरकार के विरोध में नहीं हैं अपितु खोई हुई आजादी को पुन: प्राप्त करने के प्रयास मात्र ही हैं| ४ अक्टूबर १८५७ में आपका जन्म हुआ और ३१ मई १९३० को जेनेवा देहांत हो गया|

महात्मा बृज लाल :
मध्य भारत के जिला बैतूल के गाँव चिन्चोली निवासी पिता धनाराम पटेल और माता तापीबाई जी के सुपुत्र तथा भागीरथी बाई के पति महात्मा बृजलाल के नाम से सुप्रसिद्ध हुए| इस गाँव के हिन्दू भी ताजिये निकाला करते थे|(जो मुसलमानों का उत्सव है) किन्तु मुसलमान हिन्दुओं के किसी त्यौहार में भाग नहीं लेते थे| आर्य समाज के वहां के नेता बृजलाल ने अपने गाँव में हिन्दुओं के द्वारा ताजियें निकालने की परम्परा को बंद करवा दिया| इसके साथ ही उन्होंने इस क्षेत्र में शुद्धि का कार्य भी आरम्भ कर दिया| उनके इस कार्य से वहां के अत्यधिक असहिष्णु पिन्जारे नामक मुसलमान अत्यधिक कुपित हो गए किन्तु बृजलाल जी को इससे कुछ भी न तो भय ही हुआ और न ही उन्हें किसी प्रकार की चिंता ही हुई|

गाँव में होने वाले गणपति उत्सव में आपने पूरा सहयोग देते हुए इस उत्सव को अभूतपूर्व सफलता दिलाई| इस का परिणाम यह हुआ कि पिन्जारे मुसलमानों ने आर्य समाज तथा आर्य समाजियों पर हमले करना आरम्भ कर दिया| १२ अक्टूबर १९२८ को जब वह हाल ही में खरीदे खेत का कब्जा लेने जा रहे थे तो मार्ग में अब्बास खान नामक एक धर्मांध मुसलमान ने छूरा मारकर घायल कर दिया आर्य वीर का देहांत हो गया अब्बासखान को फांसी की सजा हुई किन्तु बाद में सजा माफ़ कर केवल दस वर्ष का कारावास कर दिया गया| आर्यवीर के माता पिता भी इस दु:ख को न सहते हुए कुछ दिनों बाद ही चल बसे|

महात्मा नारायण स्वामी जी का देहांत
गाँव सिंगारपुर जिला जौनपुर उ.प्र. में सरकारी कर्मचारी श्री सूर्याप्रसाद जी के यहाँ वसंत पंचमी १९२६ विक्रमी को जन्मा बालक आगे चल कर महात्मा नारायण स्वामी जी के नाम से सुप्रसिद्ध हुआ| आप एक अद्वितीय विद्वान्, संगठनकर्ता तथा उच्चकोटि के लेखक थे| सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के अठारह वर्ष तक मंत्री तथा प्रधान रहे| हैदराबाद सत्यागाह में भाग लिया तथा फिर सिंध में सत्यार्थ प्रकाश सत्याग्रह के लिए गए और दोनों स्थानों से विजयी होकर लौटे| सिंध में तो सत्याग्रह से पूर्व ही विजय मिल गई| १५ अक्टूबर १९४२ को बरेली में आपका निधन हुआ|

स्वामी आनंद बोध जी का देहांत
स्वामी आनंद बोध जी का पूर्व नाम रामगोपाल शालवाले था| दिल्ली में शालों की दुकान होने के कारण शालावाले उनके नाम के साथ जुड़ गया| आप अनेक वर्ष तक सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान रहे| आपके नेतृत्व में आर्य समाज ने अनेक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की तथा देश विदेश में आर्य सम्मलेन हुए| आप भारतीय संसद के सदस्य भी रहे| जब भी कभी आर्यों पर कोई समस्या आती या सरकार से किसी प्रकार की मांग करनी होती तो आप तत्काल सरकार के दरवाजे पर जा खड़े होते| आप एक निर्भीक तथा कर्मठ आर्य नेता थे| आपका जन्म १९०९ ईस्वी को तथा देहांत अक्टूबर १९९४ को हुआ|

देहांत महात्मा आनंद स्वामी जी
महात्मा आनंद स्वामी जी का नाम जन जन में हंसमुख संन्यासी के रूप में जाना जाता है| आपने अपनी सारा जन भाषा की पुस्तकों से आर्य समाज का परिचय तथा सन्देश जन साधारण तक पहुंचाया| आपका देहांत २४ अक्टूबर १९७७ को हुआ किन्तु आपकी पुस्तकें आज भी साधारण लोगों को आर्य समाज के साथ जोड़ने का कार्य कर रही हैं|

देहांत स्वामी सर्वानंद जी
स्वमीई सर्वानंद जी नाम कमाने की लालसा नहीं रखते थे और परदे के पीछे रहकर ही समाजका कार्य करना पसंद करते थे| उनमे न तो किस प्रकार का यश लेने की और न ही किसी प्रकार की एषणा की कभी इच्छा रही| धन को भी छूने की कभी अभिलाषा नहीं रही| अपने कोमल तथा मधुर स्वभाव से आपने लोगों में आर्य समाज के प्रति अनुरक्ति पैदा की| दयानंद मैथ दीनानगर आज भी आपके बिना सूना दिखाई देता है| आपका देहांत १०४ वर्ष की आयु में १९०५ की दीपावली के लगभग हुआ|

जन्म पंडित जगदेव सिंह सिद्धान्ती जी
हरियाणा के जिला झज्जर के बरहाना गाँव के गुगनाण पाना निवासी प्रीत्रम अहलावत तथा श्रीमती मामकौर के यहाँ विजयदशमी सन १९०० में जन्मे बालक जगदेव ने अपनी मेहनत और पुरुषार्थ से तथा आर्य समाजकी सेवा से सिद्धान्ती की उपाधि प्राप्त की| आर्य महाविद्यालय किरठल के आचार्य स्वरूप आर्य समाज की सेवा की तथा यहीं से हैदराबाद के सत्याग्रह आन्दोलन के लिए सत्याग्रहियों का जत्था लेकर गए| बाद में आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के मंत्री तथा आर्य मर्यादा के सम्पादक बने| आप इन्हीं दिनों मैं जयपुर स्थित राजस्थान विश्वविद्यालय में पढ़ भी रहा था|

वहीँ से १९७१ में स्वामी अग्निवेश आदि के यथार्थ स्वरूप पर मेरा एक लेख उनके पास पहुंचा| उन्होंने यह लेख आर्य समाज के शिरोमणि विद्वान और लेखक प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी को यह कहते हुए दिखाया और कहा कि देखो जयपुर से आये किसी अशोक आर्य ऐ इस लेख में तो वेशों की खूब पोल खोल रखी है| इस पर जिज्ञासु जीने उन्हें बताया कि यह तो वही अबोहर वाले अशोक आर्य हैं, जो पुस्तकालय विज्ञान का कोर्स करने जयपुर गए हुए हैं| इसके पश्चात जिज्ञासु जी ने भी वेश पंथ की पोला खोलते हुए कई लेख लिखे| अनेक पदों पर रहते हुए पंडित जगदेव सिंह सिद्धान्ती जी ने आर्य समाजकी भरपूर सेवा की| आप अद्वीतीय वक्ता तथा वैदिक सिद्धांतों के मर्मग्य थे| हरियाणा के निर्माण में भी आपका सराहनीय योगदान रहा| २७ अगस्त १९७९ को आपका देहांत हो गया|

डॉ. अशोक आर्य
पॉकेट १/ ६१ रामप्रस्थ ग्रीन से, ७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ. प्र. भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६ e mail [email protected]

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