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अयोध्या का वो मंजर जो न किसी ने देखा, न किसी ने लिखा

मैं उज्जैन से 2 दिसंबर की शाम को अयोध्या पहुँच चुका था। उज्जैन से दिल्ली और दिल्ली से अयोध्या की पूरी यात्रा रोमांचक थी। अयोध्या में कार सेवा के लिए जा रहे कार सेवकों केलिए रास्ते भर में हर स्टेशन पर खाना खिलाने वालों सेलेकर हार पहनाने वालों की भीड़ मौजूद होती थी। उ्ज्जैन से दिल्ली जाते समय कोटा स्टेशन पर भाजपा कार्यकर्ताओं की भीड़ कार सेवकों का स्वागत ऐसे कर रही थी मानो किसी बारात का स्वागत किया जा रहा हो। कार सेवकों के साथ यात्रियों की भी जमकर खातिरदारी की जा रही थी। दिल्ली पहुँचने पर गाड़ी से उतरते ही भाजपा, विश्वहिंदू परिषद् और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता चाय नाश्ता लेकर तैयार थे और आपका सामान लेकर आपको लखनऊ, फैजाबाद और अयोध्या की ओर जाने वाली गाड़ी में बिठाने के लिए तैयार थे।

यानी माहौल ऐसा था कि आप अगर अयोध्या जाने के लिए निकले हैं तो फिर आपको न टिकट की फिक्र थी, न सामान उठाने की और न खाने की। खैर, दिल्ली से 3 दिसंबर की शाम को जब मैं फैजाबाद पहुँचा तो वहाँ भी पूरे प्लेटफार्म पर भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओँ का हुजुम मौजूद था। कौन कार्यकर्ता किस प्रदेश से आया था उसके हिसाब से उसे गाईड किया जा रहा था कि उसके प्रदेश का कैंप कहाँ लगा है और कैसे पहुँचना है।

फैजाबाद से अयोध्या की दूरी सभी कार्यकर्ता पैदल ही जय श्रीराम, राम लला हम आएँगे मंदिर वहीं बनाएंगे, एक धक्का और दो …के नारों के साथ अपने अपने प्रदेशों के कैंपो की ओर उत्साह से जाते दिखाई दे रहे थे। ये दृश्य अयोध्या में 3 दिसंबर की रात से 6 दिसंबर की सुबह तक 24 घंटे दिखाई दे रहा था। फैजाबाद से लेकर अयोध्या तक भगवा झंडे और भगवा दुपट्टा लिए कार्यकर्ताओँ का सैलाब दिखाई दे रहा था। ट्रकों, टेक्टरों, बसों और बैलगाड़ियों से भी हजारों लोग अयोध्या पहुँच चुके थे। फैजाबाद से लेकर अयोध्या तक में पूरे माहौल में एक अजीब उत्साह, सनसनी और तूफान के पहले की खामोशी दिखाई दे रही थी।

अयोध्या में 3 दिसंबर की पहली और ठंडी रात मैं होटलों में ठिकाना ढूंढ रहा था। मगर छोटी-मोटी होटलों से लेकर धर्मशालाओँ तक में कहीं जगह नहीं थी। फिर फैजाबाद में दो प्रमुख होटलों होटल तिरुपति और होटल अयोध्या का पता चला मगर उसमें कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और दिल्ली से लेकर दुनिया भर से आए पत्रकारों ने पहले ही बुकिंग करा रखी थी, और वो इतनी मंहगी थी कि उनमें ठहरना अपनी औकात के बाहर की बात थी। खैर, पहली रात मैने एक छोटी सी होटल वाले की कृपा से निकाली।

दूसरे दिन यानि 4 दिसंबर को सुबह मैने अयोध्या का पैदल ही दौरा किया। वाहन और साधन के नाम पर वहाँ कुछ नहीं था, हजारों लोग पैदल ही इधर से उधर आ-जा रहे थे। कई राज्यों के कार सेवकों के कैंपों में गया, वहाँ हर कारसेवक में उत्साह का माहौल था। कैंप में सबकी परेशानियाँ और शिकायतें एक जैसी थी, कहीँ खाना ठीक नहीं था, कहीं सोने को बिस्तर नहीं मिला था तो कहीं मच्छरों ने सोने नहीं दिया। मगर हक एक इस बात के लिए समर्पित था कि वह कार सेवा करने आया है और चाहे गोली चले या जान चली जाए कार सेवा करके ही जाएगा। मुझे मिथिला के कुछ लोग मिले जो अपने साथ खाने का सामान अपने साथ लेकर आए थे। उनका कहना था कि सीता उनके गाँव की बेटी है इसलिए वे अयोध्या का पानी भी नहीं पी सकते। वे तीन दिन के खाने के साथ पानी तक अपने साथ ही लेकर आए थे।

राम जन्म भूमि आंदोलन और विश्व हिंदू परिषद् की ओर से सर्वोच्च न्यायालय को आश्वासन दिया गया था कि कार सेवा के नाम पर सांकेतिक रूप से सभी कार सेवक सरयू नदी से एक एक मुठ्ठी रेत लेकर आएंगे और बाबरी ढाँचे के पास जाकर डाल आएँगे। कहने को तो ये एक बहुत ही सहज-सरल और सामान्य सी दिखने वाली योजना थी। लेकिन इस योजना को जिस योजनाबध्द तरीके से अमल में लाया गया उससे ये साफ हो गया था कि 6 दिसंबर का दिन बाबरी ढाँचे का आखरी दिन होगा, लेकिन इसकी कल्पना न तो कारसेवकों को थी, ना प्रशासन को, न सरकार की खुफिया एजेंसियों को और ना ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़े दिग्गज नेताओँ को।

4 और 5 दिसंबर को मैने अयोध्या की गली-गली से लेकर बाबरी ढाँचे के आसपास के क्षेत्रों का बहुत ही गहनता से मुआयना किया। अयोध्या और फैजाबाद के लोगों के लिए कार सेवकों का बार बार आना और वहाँ इस तरह का माहौल बनना परेशानी का सबब था। अयोध्या और फैजाबाद के मुलमान तक इस बात से खुश नहीं थे कि जिस मस्जिद में हम कई पीढ़ियों से नमाज पढ़ने नहीं गए उसके लिए मुस्लिम ने्ताओँ और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने इतना बखेड़ा कर रखा है। हिंदू चाहते थे कि जैसे भी हो इस मसले का हल निकलना चाहिए। या तो अदालत इसका हल करे या नेता या कार सेवक।

बाबरी मस्जिद अयोध्या की बस्ती से थोड़ी दूर सुनसान से क्षेत्र में स्थित थी। इसके चारों तरफ कार सेवकों ने इतनी खुदाई कर दी थी कि इसकी नींव पूरी तरह हिल चुकी थी। ये एक टिबड्डे पर किसी हवामहल की तरह खड़ी थी। 4 और 5 दिसंबर को भी मैने देखा कि सैकड़ों कार सेवक मस्जिद के आसपास की जमीन की खुदाई में जी जान से लगे थे। और जो भी कार सेवक उन्हें खुदाई करता देखता वो भी वहीं पडी गैती फाँवड़े लेकर खुदाई में लग जाता। क्योंकि इस जमीन पर खुदाई को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं थे इसलिए ये काम जोरों पर चल रहा था। जिस निष्ठा, संकल्प और जी जान लगाकर कार सेवक खुदाई का काम कर रहे थे उसे देखकर ऐसा लगता था मानों सभी गढ्ढे खोदने, मिट्टी उठाने और फेंकने के काम में कुशल हो, मगर जब मैं इनसे मिला और बात की तो पता चला कि कोई शिक्षक था, कोई व्यापारी तो कोई सरकारी अधिकारी है और किसी ने जिंदगी में एक तगारी मिट्टी भी नहीं खोदी होगी, मगर यहाँ आकर वो दिन भर खुदाई करके भी नहीं थके।

जब मैने बाबरी ढाँचे के चारोँ ओर गहन निरीक्षण किया तो पाया कि अगर इसे 6 दिसंबर को नहीं तोड़ा होता तो ये इतनी कमजोर हालत में था और इसके नीचे की जमीन इतनी खोदी जा चुकी थी कि पहली बरसात में ही ये भरभराकर गिर जाता।

5 दिसंबर की शाम से आधी रात तक सभी कैंपों में गहमा गहमी थी। देर रात तक हर कैंप में भजन और संगीत के कार्यक्रम होते रहे। सब कार सेवकों को माईक पर लगातार निर्देश दिए जा रहे थे कि 6 दिसंबर की सुबह से हर कार्यकर्ता कार सेवा में भाग लेगा। कार सेवा के लिए कार्यकर्ता सरयू नदी पर जाएँगे और वहाँ स्नान कर एक मुठ्ठी बालू लेकर बाबरी ढाँचे के परिसर में जाएँगे और बालू वहाँ समर्पित कर अपनी कार सेवा को पूरा करेंगे। ये कार सेवकों पर था कि वे कितनी भी बार कार सेवा कर सकेंगे।

मैं कारसवकों, राम जन्म भूमि आंदोलन के नेताओँ और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी से जुड़े नेताओँ और खुफिया अधिकारियों से भी मिला, ताकि जान सकूँ कि 6 दिसंबर को आखिर क्या होने वाला है। इन मुलाकातों में मैने कई चौंकाने वाली जानकारियाँ हासिल की।

एक महत्वपूर्ण जानकारी मुझे ये मिली कि कार सेवको का जो जत्था सबसे पहले कार सेवा यानी सरयू नदी की रेत लेकर बाबरी परिसर में अर्पित करने जाएगा वो आंध्रप्रदेश के नंदयाल जिले का होगा, उसके पीछे आँध्रप्रदेश के सभी जिलों के कारसेवक, आंध्र प्रदेश के कारसेवकों के पीछे महाराष्ट्र के कार सेवक होंगे।

कहने को तो ये बहुत ही सामान्य जानकारी थी, मगर मेरे खुराफाती पत्रकारिता वाले दिमाग के लिए ये बहुत बड़ी जानकारी थी। ये रणनीति इसलिए बनाई गई थी कि अगर गोली चले तो सबसे पहले प्रधानमंत्री नरसिंहराव के गृह जिले नंदयाल के लोगों पर गोली चले और दूसरा नंबर नरसिंह राव के मंत्रिमंडल में गृहमंत्री एसबी चव्हाण के राज्य महाराष्ट्र के कारसेवकों का हो। मैं जब आंध्र प्रदेश के कार सेवको के कैंप में गया तो मैने देखा कि उनका खाना अयोध्या में ड्यूटी पर आए केंद्रीय पुलिस सेवा के कैंप से बनकर आ रहा था क्योंकि उनको उत्तर भारत की सब्जी पूड़ी नहीं भा रही थी और उनके लिए चावल और रसम की व्यवस्था सीआरपीएफ के जवान कर रहे थे। किसी कार सेवक ने प्रधान मंत्री कार्यालय में एक अधिकारी से शिकायत कर दी थी कि हमें यहाँ का खाना नहीं भा रहा है और तीन दिन में तो हम भूखे मर जाएंगे।

साभार – इन्दौर से प्रकाशित दैनिक प्रजातंत्र से

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