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चेतना को युग के सापेक्ष बदलते परिदृश्य से रूबरू करवाती हैं विजय की कहानियां

विज्ञान के अध्येता और साहित्य में रुचि विजय जोशी के लिए मणिकांचन संयोग ही कहा जाएगा। कथा साहित्य की गहराई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की इनके साहित्य पर साहित्यकारों ने समीक्षा किताबें लिखी और विद्यार्थियों ने शोध प्रबन्ध लिख कर वाचस्पति की उपाधि प्राप्त की। राजस्थान के कोटा में रह कर लिखा गया इनका कथा साहित्य आसमान के नक्षत्रों में धुव्र तारा बन कर जगमगा रहा है।

कालज्यी लेखकों की भांति इनके विचार भी समाज में आम जन की धारा को पाठकों से जोड़ते हैं। कथाएं सामाजिक और पारिवारिक परिवेश का यथार्थ उजागर करती हैं। हृदय में गहराई तक सीधे उतर कर स्पंदित करती है कहानी, इसी सोच से लिखते – लिखते इन्हें कथा साहित्य में महारथ हांसिल हो गया और आज सुनामधन्य साहित्यकारों में अपनी लेखन शैली और परिवेश से एक हस्ताक्षर बन गए हैं।

कथाकार ने अपनी कहानियों में सरल भाषा का प्रयोग करते हुए प्रभावशाली संवादों से कथाओं को सजीवता प्रदान की है। भाषा का प्रवाह पाठकों को बांधे रखता है। प्रत्येक कहानी कुछ न कुछ ऐसा सबक देती है जो वाणी को तो मौन कर देती है, परंतु भीतर विचारों का एक तूफान खड़ा कर देती है। लेखक ने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज को जागृत करने का सफल प्रयास किया है।

आलोचना के मर्म को गहनता से समझने वाले रचनाकार की सामाजिकता को सूक्ष्मता से परखने और आत्मसात करने की प्रवृत्ति इनकी रचनात्मकता को अद्भुत है यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कथाकार की हर कहानी हमारी चेतना को युग के सापेक्ष बदलते परिदृश्य से रूबरू करवाती है। ये सभी कहानियाँ यथार्थवादी हैं, इनमें पूरी ईमानदारी है, सच्चाई है। कथाकार का मौन अपने आप में भाषा है जिसका सुलगता एक दावाग्नि पैदा कर सकता है।

विजय की लेखन कला कौशल का ही जादू है कि देश के अनेक समाचार पत्र और साहित्यिक पत्रिकाएं इन्हें स्थान देना अपना गौरव समझती हैं। आकाश वाणी केंद्र निरन्तर प्रसारण करता है। अपनी साहित्यिक यात्रा के बारे में कथाकार बताते है कि साहित्यिक अभिरुचि और कला-संस्कृति पर लेखन अपने गुरु पिता श्री रमेश वारिद से विरासत में मिला। वहीं संगीत के प्रति रूझान और सांस्कृतिक विचारों का प्रवाह अपने सुसंस्कृत संयुक्त परिवार से प्राप्त हुआ। बाल्यकाल से किशोरावस्था तक प्रकृति चित्रण, राजस्थानी परम्परागत एवम आधुनिक शैली के चित्रों का सृजन किया, कला प्रदर्शनियों में कला-कृतियाँ प्रदर्शित होती रहीं। वर्ष 1985 से विज्ञान-पर्यावरण सन्दर्भित लेखन प्रारम्भ किया।

इनका प्रथम आलेख ‘‘कुटते हुए वृक्ष: गहराता हुआ प्रदूषण’’ दैनिक नवज्योति के अभ्युदय परिशिष्ट में 16 सितम्बर 1985 को प्रकाशित हुआ था। यही स्पन्दन लेखन का आगाज बन गया। पहली ही कहानी ‘टीस’का प्रसारण आकाशवाणी कोटा से 19 अगस्त 1994 को हुआ। कथाओं का प्रथम संकलन राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर भेजा तो पाण्डुलिपि प्रकाशन सहयोग से प्रथम कथा संग्रह ‘ख़ामोश गलियारे’, नटराज प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। प्रथम राजस्थानी कहानी संग्रह ‘‘मंदर में एक दन’’ का प्रकाशन राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के आर्थिक सहयोग से, विकास प्रकाशन, बीकानेर से हुआ। यही संग्रह कथा लेखन के लिए इनका आधार बना और अभिव्यक्ति की धारा कहानियों के माध्यम से प्रवाहित होती रही।

कथाकार के साहित्य का मूल्यांकन करते हुए समीक्षकों-विद्वानों के सम्पादन में इनके कथा-साहित्य पर केन्द्रित तीन समीक्षा-ग्रंथों का प्रकाशन किया है। डाॅ. प्रेमचन्द विजयवर्गीय एवं प्रो. राधेश्याम मेहर, सम्पादक द्वय द्वारा सम्पादित ‘‘संवेदनाओं का कथा संसार और विजय जोशी’’, प्रो. राधेश्याम मेहर एवं प्रो. अनिता वर्मा सम्पादक द्वय द्वारा सम्पादित ‘‘कथा कलशों के शिल्पकार: विजय जोशी’’

तथा डाॅ. गीता सक्सेना द्वारा लिखित ‘‘विजय जोशी के कथा साहित्य का शैल्पिक सौन्दर्य’’ समीक्षा ग्रंथ इनके कतात्मक लेखन की सफलता की कहानी स्वयं सुनाते हैं।
साहित्य पर शोध
यह साहित्यकार की सफलता का द्योतक है कि इनका साहित्य शोध का विषय बना और विभिन्न विश्वविद्यालयों से शोधार्थियों ने इनके साहित्य पर पीएच.डी. और एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की है। ‘‘विजय जोशी के कथा साहित्य में सामाजिक चेतना के विविध आयाम एवं शिल्प विधान’’ विषय पर सन् 2011 में कोटा विश्वविद्यालय से एक छात्र ने पीएच.डी.की। इसी प्रकार तीन विद्यार्थियोंं ने ‘‘विजय जोशी का सृजनात्मक व्यक्तित्व एवं कृतित्व’’ विषय पर कोटा विश्वविद्यालय,”चीखते चैबारे में मनोविज्ञान एवं शिल्प” विषय पर विनायका मिशन विश्वविद्यालय, तमिलनाडू और ”श्री विजय जोशी के कहानी संग्रह ख़ामोश गलियारे का कथ्य एवं शिल्पगत विवेचन“ विषय पर विक्रम विश्विद्यालय,उज्जैन, मध्यप्रदेश, से एम.फिल. किया। वर्तमान में भी दो शोधार्थी इनके कथा साहित्य पर ‘मनोवैज्ञानिक विश्लेषण’ तथा ‘कथ्य एवं शिल्पगत अनुशीलन’ विषयों पर पीएच.डी. कर रहे हैं।

आपको समय-समय पर सृजनात्मक लेखन के साथ राजस्थानी और हिन्दी साहित्य की सेवा के लिए विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित और पुरस्कृत किया जाकर होंसला अफजाई की गई। इनको कोटा सहित प्रतापगढ़,उदयपुर,अलवर, बारां, श्रीगंगानगर, लखनऊ,वाराणसी, जबलपुर, गुना, आदि कई जगहों से विभिन्न संस्थाओं द्वारा युवा साहित्यकार, हिंदी सेवी,हिन्दी भूषण अलंकरण, मुंशी प्रेमचन्द कथा सम्मान,महर्षि गौतम साहित्य रत्न सम्मान,सृजन साहित्य सम्मान, कला भारती सम्मान,गौतम प्रतिभा सम्मान, नव प्रतिभा सम्मान, हाड़ौती रत्न सम्मान एवं श्री कर्मयोगी साहित्य गौरव सम्मान ,सृजन साहित्य सम्मान और राजस्थान सरकार, जिला प्रशासन कोटा द्वारा स्वतंत्रता दिवस 2002 पर सम्मान से सम्मानित किया गया।

परिचय
कथाकार के परिचय में एक समाचार पत्र में प्रकाशित टिप्पणी दृष्टव्य है “कथाकार का दृश्य जगत, आम भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार ही है। परिवार की घुटन, दैन्य, विवशता, उसमें जीने की इच्छा का दृश्यांकन प्रेरित है। विजय जोशी, विज्ञान के विद्यार्थी हैं, साथ ही चित्रकार भी। चित्रात्मकता जब कथाकार की भाषा में आती है, तब उसमें काव्य बिम्ब की तरह कथा में परिवेश सम्मिलित होने लग जाता है, वहाँ शिल्प अपने आप वर्णनात्मक परिधि की सीमा को लांघ जाता है।”

राजस्थान की साँस्कृतिक और साहित्यिक नगरी झालावाड़ में पुरातत्ववेत्ता, इतिहास विज्ञ, कला-साहित्य मर्मज्ञ पिता श्री रमेश वारिद एवं माँ श्रीमती प्रेम वारिद के परिवार में आपका जन्म 1 जनवरी,1963 को हुआ। वनस्पति विज्ञान शास्त्र, हिंदी साहित्य एवं शिक्षा (निर्देशन और परामर्श) में अधिस्नातक तथा पत्रकारिता-जनसंचार में स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की। संगीत और चित्रकला की शिक्षा आपको विरासत में प्राप्त हुई। आप वर्तमान में कोटा जिले के सांगोद उप खंड में सीनियर सेकेंडरी विद्यालय में जीव विज्ञान के व्याख्याता है। राजस्थान के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों में शुमार नाम है विजय जोशी का।
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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा
मो.9928076040

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