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इन महिला पत्रकारों के संघर्ष की कहानी वाकई दिल को छू जाती है…

unnamed (4)उपमा सिंह, मुंबई एनबीटी: लखनऊ शहर में हम चार बहनें। पापा की पोस्टिंग दूसरे शहर में। हमेशा डरते कि हम जॉब कैसे करेंगी, कैसे मैनेज करेंगी? हमेशा कहते, मैनेज नहीं कर पाओगी? आसान नहीं होता अकेले शहर में रहना… वगैरह, वगैरह। आज मैं मुंबई में हूं। लखनऊ और दिल्ली एनबीटी में काम करने के बाद यहां आए अभी कुल 4 महीने 26 दिन ही हुए हैं। लेकिन इतने ही दिनों में इस शहर ने मुझे हैरान कई बार किया। अपने पापा और मेरी जैसी लड़कियों के तमाम पैरंट्स को आज बताना चाहती हूं कुछ। दो महीने पहले की बात है। रात के सवा 12 बजे फिल्मफेयर अवॉर्ड्स पार्टी की कवरेज करके निकलते वक्त दिल में फुल धुकधुकी मची थी, इतनी रात में अंधेरी से मीरा रोड का यह सफर जाने कैसा होने वाला है? पहली बार इतनी रात को अकेली घर जा रही थी। जैसे ही ट्रेन की लेडीज कोच में कदम रखा, आंखें हैरानी से बड़ी हो गईं। चेहरे पर ऑटोमैटिक स्माइल आ गई। मन ने कुछ बुदबुदाया- अमा यार, ये कैसा शहर है? रात के साढ़े बारह बज रहे हैं और ट्रेन में पचासों औरतें! यक-ब-यक कुछ बीता हुआ याद आ गया। दरअसल, ट्रेन से पुराना राबता रहा है अपना।

ग्रेजुएशन का पूरा तीन साल बाराबंकी से लखनऊ अप-डाउन करते बीता है, जहां कई बार दिन में भी ट्रेन में औरतें मुश्किल से मिलती थीं। नई-नई लोकल चली थी तब, लखनऊ से बाराबंकी के लिए, पूरा डिब्बा घूम-घूम कर देखती कि कोई फैमिली कहीं बैठी हो, तो उसके साथ बैठ जाऊं। कहीं वो परिवार बीच के किसी स्टेशन पर उतर जाता को सांस रुक जाती, कई बार तो खुद भी उनके वाले स्टेशन पर उतर जाती, दूसरी किसी बोगी में दूसरी फैमिली या औरतों की तलाश में। कारण, वो झुंड, जिनकी रोजाना दिखने वाली शक्लों, एकटक घूरती आंखों और घटिया बातों का कोई तोड़ नहीं था मेरे पास। जो चाहे कर लो, ट्रेन बदल लो, टाइमिंग ऊपर-नीचे कर लो, वो खोज ही लेते थे। मन करता था गोली मार दूं, लेकिन कुछेक को थप्पड़ से ज्यादा कुछ नहीं मार पाई। थप्पड़ भी कितनों को मारती? रोज की ही बात थी। घर आकर रो लेती थी, ऊपरवाले को कोस लेती थी- लड़की क्यों बनाया?

उस शहर में साढ़े सात बजते ही रात हो जाती थी। सात बजे के बाद ही साइकिल रोककर खड़े हो जाते थे, मानों मौन धमकी हो कि बहुत पर निकल आए हैं, चली बड़ी पढ़ाई करने। फिर घर पहुंचो तो पूरा मुहल्ला बाहर खड़ा मिलता और गली में घुसते ही आधा दर्जन लोगों के एक ही सवाल होता- बिटिया, आज बहुत देर हो गई? और एक ये शहर है मुंबई…, रात के एक बजे हैं, स्टेशन के बाहर अकेली खड़ी हूं, लेकिन डर ही नहीं लग रहा। स्टेशन से घर भी अकेली आ गई स्कूटी पर, लेकिन बगल से न कोई दूसरी बाइक साथ-साथ चली, न कोई आवाज सुनाई दी- कहां, इतनी रात में? हम छोड़ दें? टाइप। वरना लखनऊ में तो दस बजे ऑफिस का काम खत्म हो जाए तो डेढ़ बजे तक दूसरे डेस्क के साथी का वेट करती कि वो छूटे तो उनके साथ निकलूं। दिल्ली में एक बार रात के नौ बजे अकेली घर गई तो डांट पड़ी थी- नौ बजे अकेली चल पड़ी? ये दिल्ली है लखनऊ नहीं? वैसे, मेरे पापा ही नहीं, कई लोग नहीं चाहते कि उनकी बेटी अकेली किसी शहर में रहकर जॉब करे। लेकिन सच मानिए, ये बड़े शहर कहीं बड़े दिल-ओ-दिमाग वाले हैं, उन दकियानूसी छोटे शहरों से। ये डराते नहीं बड़ा सोचने से, रोकते नहीं अलग करने से। इसलिए आप भी रोकिए मत अपनी बेटियों को। दिल बड़ा कीजिए और कहिए- जा बेटी, जी ले अपनी जिंदगी।

मम्मी पापा पूछते, आज किसे पीटकर आई है?

unnamedशशि पाण्डेय मिश्रा, लखनऊ एनबीटी: बचपन से ही मेरी मम्मी-पापा ने मुझे कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि मैं एक लड़की हूं। शायद यही बात मेरी ताकत बनी। मैं आधी रात भी अकेले कहीं भी जा सकती हूं। मुझे डर नहीं लगता। जब से मैंने होश संभाला तब से लेकर आज तक मेरा यह अनुभव रहा कि महिलाओं के साथ छेड़खानी करने वाले बड़े डरपोक होते हैं। मैंने घर, स्कूल, कॉलेज, ऑफिस या सड़क कहीं भी कमेंट या किसी तरह की छेड़खानी बर्दाश्त नहीं की। मैं तो लगभग हर रोज किसी न किसी कि पिटाई या कसाई करके आती थी। घर में मम्मी-पापा बड़े चाव से पूछते थे आज किसे पीट कर आई? मैं उन्हें बड़े मजे से बताती। वो न तो कभी डरे न ही डराया। हमेशा मेरी हौसला अफजाई की। यही कारण है कि आज भी किसी भी छेड़खानी करने वाले को मैं वहीं बड़े प्यार से बेइज्जत करती हूं और वो डरपोक दुबक जाते हैं।

एक वाकया सुनिए, आप भी हिम्मत लीजिए कि ऐसे लोगों से डरने की नहीं, डराने की जरूरत है। अभी हाल ही में मैं बस में चढ़ी। बस में भीड़ बहुत थी इसलिए खड़े रहना पड़ा। मेरे आगे-पीछे लड़के खड़े थे। मैंने बस में ऊपर लगा रॉड पकड़ रखा था। तभी पीछे खड़े लड़के ने मेरे हाथ पर हाथ रखा। मैंने सोचा शायद गलती होगी। हाथ थोड़ा आगे करके हैंडल पकड़ लिया। लड़के ने फिर अपना हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख दिया। मुझे गुस्सा आया और मैंने पीछे पलटकर अपना हाथ उस लड़के के हाथ में पकड़ाकर कहा भैया ये लो आराम से हाथ पकड़ो। आप बेकार में इतनी देर से परेशान हो रहे हैं। आपको मेरा हाथ पकड़ने में संतोष मिल रहा है तो लो जब तक मेरा स्टॉप नहीं आता आप आराम से मेरा हाथ पकड़े रहो। बस में सब हंसने लगे, लड़का शर्म से बस रुकवाकर नीचे उतर गया।

बदमाशों ने अहसास कराया कि मैं भी बहुत दिलेर हूं

unnamed (1)ज़ेबा हसन, लखनऊ एनबीटी: रात दस बजे भी ऑफिस से निकलते समय अब कोई डर नहीं लगता। यानी कुछ महीने पहले तक इसका मुझे अहसास नहीं था। लेकिन थैंक्स टु द बदमाश, मैंने जान लिया कि हिम्मत कहीं बाहर से नहीं, अंदर से आएगी। दरअसल, कुछ ही महीने पहले की बात है रात के दस बज गए थे और मैंने ऑफिस से स्कूटी निकाली, हमेशा की तरह ही कान में इयरफोन लगाया और गाने सुनते हुए चल पड़ी। सिकंदरबाग चौराहे पर मेरी स्कूटी के पीछे एक बाइक थी और उस पर दो लड़के। मैंने ध्यान नहीं दिया और म्यूजिक की धुनों के साथ आगे बढ़ रही थी। तभी वो बाइक मेरी स्कूटी के साथ-साथ चलने लगी और भद्दे कमेंट मुझे सुनाई देने लगे। अब मेरा पूरा ध्यान उन्हीं पर था पर मैंने उनकी गाड़ी का नम्बर याद कर लिया था। मैं गाड़ी तेज करती तो वो भी तेज कर लेते मैं धीमी करती तो वो भी रुक रुक कर चलने लगते। उस वक्त परिवहन विभाग के पास नया-नया पुलिस बूथ खुला था। मैंने अपनी गाड़ी वहीं रोकी और अंदर बैठे दो सिपाहियों को बाहर बुलाया। मैंने उन्हें बताया कि दो लड़के मेरा पीछा कर रहे हैं। जब वो आनाकानी करने लगे तो मैंने प्रेस कार्ड निकाल कर अपना इंट्रोडक्शन दिया। कार्ड देखते ही वर्दीधारी हरकत में आए और मैंने उन्हें गाड़ी का नम्बर दिया। उनमें से एक मेरे साथ चल पड़ा और मैंने खूब तेज स्कूटी चलाई। आखिर वो बाइक सवार हमें मेडिकल कॉलेज पेट्रोल पम्प पर मिल गए। मैं सिपाही के साथ उन दोनों के पास पहुंची और कहा कि जो भद्दी बातें उस वक्त बोल रहे थे अब बोलो। करीब दस मिनट तक उन्हें लताड़ा, दोनों लड़कों ने सॉरी बोला तो मैंने सिपाही से कहा ठीक है भैया, अब इन्हें जाने दीजिए मैं भी जा रही हूं। उस दिन समझ आया कि मेरे अंदर कितनी दिलेर लड़की छुपी हुई है।

बस, थोड़ा दिमाग से काम लो

unnamed (2)रेखा खान, मुंबई एनबीटी: छठी क्लास में जब मैंने अपनी एक हमउम्र संगीता को हिंदी ट्यूशन पढ़ाकर 60 रुपये कमाते देखा, तो इतनी समझ थी कि इन 60 रुपयों में घर का राशन आ सकता है, मगर विमन एंपावरमेंट जैसे भारी-भरकम टर्म से अन्जान थी। मेरे पिताजी बहुत छोटी उम्र में ट्रेन हादसे में चल बसे थे। उनके जाने के बाद मेरी मां और हम 6 भाई-बहनों की जिंदगी बदल गई। क्योंकि आज से 35 साल पहले मेरी अनपढ़ और पहाड़ी मां ने पूरे खानदान के सामने ये फैसला लिया कि वह अपने बच्चों को पहाड़ में खेती-बाड़ी करने के बजाय मुंबई में पढ़ाएंगी। उनकी शक्ति ने मेरे लिए ड्राइविंग फ़ोर्स का काम किया। गढ़वाली हिंदू होकर मुसलमान से शादी करने की ‘हिम्मत’ या फिर अपने करियर और जिंदगी को अपने हिसाब से जीना उन्हीं से सीखा।

दूसरी हिम्मत मुझे मिलती है अपने जर्नलिस्टिक प्रफेशन से। अभी हाल ही की बात है। मैं लेट नाइट ऑफिस से लौटते हुए गलती से एक ऐसी ट्रेन में बैठ गई जो चर्चगेट स्टेशन से मुंबई सेंट्रल यार्ड में जानेवाली थी। थकान और बेख्याली में आंख भी लग गई। जब आंख खुली तो पाया कि पूरी ट्रेन खाली है और मैं रात के पौने 12 बजे एक अलग-सी जगह पर हूं। ट्रेन रुकने के बाद वहां 3 -4 मजदूर लोग दिखे, जो पटरी पर कुछ काम कर रहे थे। मैं झूठ नहीं कहूंगी, बुरी तरह से डर गई थी। जेहन में निर्भया और शक्ति मिल्स की घटनाएं कौंधने लगी, मगर फिर मैंने साहस और चतुराई से काम लिया। उन लोगों से आंखें चुराने के बजाय उन्हें अपना प्रेस कार्ड दिया और बताया कि मैं वहां एक स्टोरी के लिए आई हूं और मेरे साथी पहुंचने वाले हैं। उन लोगों ने मुझ पर यकीन कर मुझे रास्ता दिखाया और मैं घर आ गई। मैं सोच रही थी कि उस डर के कमजोर पल में मुझे ताकत मेरे प्रफेशन ने ही दी। शायद मैं पत्रकार न होती तो इतनी दबंगई न दिखा पाती। यह मैं कर पाई, मगर अक्सर सोच में पड़ जाती थी कि क्या मेरे आसपास की लड़कियां या महिलाएं मुझ जितनी इंडिविजुअल हैं? वे महिला होने के नाते मेरी तरह एंपावर्ड हैं?

जल्द ही मुझे इसके जवाब आसपास मिलने लगे। शादी करके जब अपने ससुराल आई तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की दयनीय और पिछड़ी स्थिति को लेकर कई धारणाएं टूटीं। बाजी (मेरी अपनी ननद) सरकारी उच्च पद पर कार्यरत हैं और एक लंबे अरसे से डिवोर्सी हैं। यहां मैं देखती हूं कि दो बच्चों के बावजूद वे परित्यक्ता नहीं हैं बल्कि उन्होंने अपने शौहर से खुला (मुस्लिम समाज में जब औरतें तलाक लेती हैं तो उसे खुला कहते हैं) लिया। वे अपने फैसले को लेकर स्पष्ट थीं कि अगर शौहर उनकी और बच्चों की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते तो उन्हें एक दुनियावी झूठे रिश्ते का बोझ ढोने की जरूरत नहीं। फिर उस वक्त मैं बेहद हैरतजदा हो गई जब मेरे घर में काम करने वाली एक मामूली काम वाली बाई ने हाल ही में एक नवजात बच्ची को अडॉप्ट किया। 12 साल की शादीशुदा जिंदगी में मां बनने के लिए हर तरह के पापड़ बेल चुकी रुखसाना (बदला हुआ नाम) ने आखिरकार बच्चा गोद लेने का फैसला किया। हैरानी इस बात की कि आज जब सभी लड़के के पैदा होने को ही सबकुछ मानते हैं, उसने लड़की गोद ली। और खुशी है कि यह फैसला खुद रुखसाना का था। मुझे समझ में आया है कि औरत की शक्ति उसके आत्म निर्भर होने के साथसाथ उसके अंदर छिपी हुई है, वे ठान लें तो पहाड़ भी काट लें।

11 साल से बिना डरे नाप रही हूं सड़कें

unnamed (3)पूनम गौड़, नोएडा एनबीटी: अक्सर लड़कियां घर से दूर जॉब करना नहीं चाहतीं। इसके लिए उन्हें कई बार अपने सपनों से, करियर से समझौता करते भी देखा है। लेकिन मेरा मामला कुछ अलग ही रहा। मेरा पैशन ऐसा था कि हमेशा घर से दूर इलाकों में रिपोर्टिंग का काम मिला, मगर मैंने दो बार नहीं सोचा। पालम में रहते हुए मैंने फरीदाबाद, गुड़गांव और नोएडा जैसे शहरों को कवर किया। रिपोर्टर हूं तो आने-जाने का कोई समय तय नहीं है। ऐसे में कभी 8 बजे तो कभी 10 बजे और कभी कभार तो ऑफिस से निकलने में 12 भी बज जाते हैं। लेकिन मुझे दिक्कत नहीं हुई।

छोटी मोटी परेशानियां होती हैं। कभी स्कूटी खराब होना, कभी ट्रेन का 2 घंटे लेट हो जाना लेकिन इन सब परेशानियों को मैने खुद पर हावी नहीं होने दिया। रात में घर से किसी को बुलाने का मैं ख्याल नहीं कर सकती। क्योंकि सिंगल मदर हूं, बेटा छोटा है और पापा को 78 साल की उम्र में मैं परेशान करना नहीं चाहती। फरीदाबाद में एक शाम घर निकलने की तैयारी थी और सूचना आई की असावटी के पास 6 गैंगमैन कट गए हैं। जाना पड़ा, ट्रेनें बंद हो गई और वहां से करीब 12:30 बजे वापस आई। रिपोर्टिंग का सबसे टफ समय वह रहा जब मेरी मां का मोतियाबिंद का ऑप्रेशन चल रहा था और ऑफिस में स्टाफ की कमी की वजह से मुझे छुट्टी नहीं मिल रही थी। मैंने अपने ऑफिस के पास के अस्पताल में ही इस वजह से मां का ऑप्रेशन करवाया और वहीं से काम किया। कई बार असुरक्षा की भावना आई, कई बार मनचलों और झपटमारों से सामना भी हुआ, कभी कभार उन्हें पकड़ने में कामयाबी मिली तो कई बार मेरे फोन मेरे सामने छिन गए। पिछले करीब 11 साल से मैं इसी तरह काम कर रही हूं और आधी रात तक सड़कों पर रहती हूं। सुरक्षित हूं और अकेले कहीं भी जाने की हिम्मत रख सकती हूं।

क्यों बांधूं अपने मुंह पर स्कार्फ? मैंने कोई जुर्म किया है?

unnamed (4)शालू अवस्थी, लखनऊ एनबीटी: आज से दो साल पहले मैं बहुत डरती थी, राह चलते लड़कों के कमेंट्स को इग्नोर करती थी। मम्मी के कहने की वजह से मुंह पर स्कार्फ बांध कर स्कूटी चलाया करती थी। कोई छेड़ जाए तो मन ही मन गुस्सा तो बहुत आता था, लेकिन बोल नहीं पाती थी। फिर जर्नलिज़्म में आई और अब पीछे मुड़कर देखती हूं तो हैरान होती हूं वो डरपोक लड़की मैं कैसे हो सकती हूं? यहां आकर जाना कि हम लोगों के थॉट्स बनाते हैं, तो दूसरों में बदलाव लाने से पहले हमें खुद में बदलाव लाना होगा। आज मैं न सिर्फ खुद के साथ गलत होने पर आवाज उठा सकती हूं बल्कि मैं बाकी किसी के साथ भी गलत होता नहीं देख सकती। इसका श्रेय मैं अपने प्रफेशन को देती हूं। और खुद की ताकत का अहसास कराया मुझे एक वाकये ने। मैं ऑफिस से लौट रही थी। गले में ऑफिस का आईकार्ड टंगा रह गया। पॉलीटेक्निक चौराहे पर मैं ऑटो से उतरी, तभी सामने से एक लड़का आया और मेरा आइडेंटिटी कार्ड मेरी गर्दन से उठाकर देखने लगा। लड़के की हिम्मत देखकर पहले हमेशा की तरह मुझे डर लगा पर फिर मैंने हिम्मत दिखाई और उसका कॉलर पकड़ कर उसे जोर से तमाचा मार दिया। चौराहे पर ही पुलिस बूथ था। पुलिस आई और उसे ले गई। अब ऑफिस बेधड़क जाती हूं। मम्मी टोकती है कि स्कार्फ से ढक ले चेहरा, तो अब कह देती हूं- क्यों छिपाऊं अपना चेहरा, मैंने कोई जुर्म थोड़ी किया है?

मम्मी खुश, मैं हैरान

unnamed (5)दीपिका शर्मा, मुंबई एनबीटी: पेशे से एक पत्रकार हूं और बेहद छोटे से शहर से हूं, जहां लड़कियों के लिए इस तरह का कोई पेशा चुनना और उसे करने के लिए अपने घरवालों को राजी करना किसी छोटी-मोटी जंग से कम नहीं होता। पत्रकारिता में रहते हुए कई बार ऐसे मौके आए जब मुझे अपने विमिनहुड पर बहुत गर्व हुआ लेकिन हाल ही में मेरे ही शहर में हुए एक छोटी सी घटना ने महिलाओं के प्रति बदलते नजरियों और उसके लिए बढ़ते दायरे को साफ दिखा दिया। मेरी मम्मी वर्किंग वुमन रही हैं लेकिन उसके बाद भी उन्हें मेरा पत्रकारिता जैसा पेशा चुनना कतई पसंद नहीं था। उनके हिसाब से लड़कियों के लिए सिर्फ कुछ ही नौकरियां अच्छी हैं जैसे टीचर बनना या बैंक की नौकरी जहां समय से घर पर आया जा सके। यही कारण है कि जब मैंने अपनी मां के सामने पत्रकारिता के लिए पढ़ाई करने की बात कही तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया और काफी समझाने-बुझाने और रोने के बाद मम्मी ने सिर्फ इस शर्त पर मास्टर्स डिग्री करने दी कि उसके बाद पीएचडी कर के प्रफेसर बन जाओगी। इन बातों को 6 साल हो गए हैं। लेकिन पिछले साल जब मैं अपने घर गई तो एक आंटी हमारे घर आई हुई थी। उन्होंने मम्मी से कहा कि उनकी बेटी जर्नलिजम करना चाहती है। मैं उम्मीद कर रही थी कि मम्मी उन्हें मना करेंगी लेकिन तभी मम्मी ने उन्हें कहा, हां कराइए अच्छा कोर्स है। मेरी बेटी भी पत्रकार है। यह सुन कर जैसे दिमाग सन्ना गया और अंदर ही अंदर एक खुशी हुई कि अब कम से कम मेरी मम्मी के लिए तो लड़कियों के लिए नौकरी के दायरे बढ़े हैं। अब लगता है कि अगर मेरी मम्मी समझ गई है तो बाकी दुनिया भी धीरे धीरे ही सही समझ जाएगी।

ज़िद है तो ज़िद है जी

unnamed (6)प्रवेश सिंह, गाजियाबाद एनबीटी: हर रोज नोएडा से गाजियाबाद करीब 65 किमी स्कूटी से राइडिंग, रात को अक्सर 10-11 बजे तक घर पहुंचना, यह सफर मेरे लिए तभी संभव है क्योंकि हौसला है। जर्नलिज़म मेरा पैशन है और खुद को साबित करने की ज़िद मेरा जुनून है। मैं शुक्रगुजार हूं उन सबकी जिनके सपोर्ट से सपनों के सफर पर चल पाना मेरे लिए संभव हो पा रहा है। मैं आभारी हूं उन हालातों की जिन्होंने मुझमें खुद को साबित करने की ज़िद पैदा की।

एक कहानी बताती हूं। पिछले साल बरसात के दिनों में मैं करीब साढ़े नौ बजे गाजियाबाद ऑफिस से निकली। गऊशाला अंडरपास में पानी भरा होने की वजह से रास्ता बंद था। मैने केला भट्टा की एक संकरी गली से शार्टकट लिया, लेकिन थोड़ा आगे चलने के बाद पता चला कि रास्ते के बीचो-बीच एक थ्रीवीलर खराब हो गया है। रास्ता दोनों साइड से ब्लॉक हो चुका था। करीब साढ़े 10 बजे तक भी जब रास्ता नहीं खुला तो मैने स्कूटी वहीं केला भट्टा में खड़ी की और वाहनों के बीच से पैदल निकलते हुए मेन सड़क पर आकर करीब पौने 11 बजे एक ऑटो बुक किया, लेकिन ऑटो वाले पर भरोसा नहीं किया। रास्ते में एक पुलिस चौकी पड़ी वहां ऑटो वाले को रोका। ऑटो का नंबर पुलिस वालों को दिया ताकि ऑटो वाला रास्ते में कोई गड़बड़ी करने की हिम्मत न कर सके। झमाझम बारिश हो रही थी। किसी तरह एनएच-24 पर पहुंची।

रात 10 बजे के बाद एनएच-24 पर भारी वाहनों का आवागमन बढ़ जाता है। सेक्टर-62 से करीब डेढ़ किमी पहले रास्ता एकदम चौक जाम था। सर्विस रोड से होते हुए नोएडा में एंट्री के लिए बॉर्डर पार की समस्या की वजह से ऑटो वाला तैयार नहीं हुआ। 12 बज चुके थे। जाम टस से मस नहीं हुआ। किसी ने सलाह दी कि साइड से सीधे निकल जाओ निर्माणाधीन एफएनजी रोड से होते सीधे 71 के पास रूट निकलेगा। मैने यह रास्ता देखा नहीं था। ऑटो वाला इस रास्ते से जाने को तैयार हो गया। करीब 3 किमी चलने के बाद 3 कट थे। जिनमें एक 71 के लिए जाता है, लेकिन रात में सुनसान सड़क थी। कहीं कोई साइन बोर्ड नहीं, ऑटो वाले ने गलत कट ले लिया। हम चले जा रहे थे, लेकिन कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कहां जा रहे हैं। मोबाइल में गूगल सर्च किया कुछ क्लियर नहीं हुआ। मैने ऑटो वाले से कहा एनएच-24 की ओर वापसी कर लो। सुनसान में चलने से बेहतर है। जब जाम खुल जाएगा, घर पहुंच जाएंगे। ऑटो काफी लंबा चल चुका था। रास्ते में उसकी सीएनजी खत्म हो गई। ऑटो में ऑयल था, लेकिन स्टार्ट नहीं हुआ। बगल में एक गांव था। मैंनें उसका ऑटो लॉक कराया और खोखे वाले से वहां के मोहल्ले के बारे में जानकारी ली। फिर एक घर का दरवाजा खुलवाया। उन्हें अपनी समस्या बताई। आई कार्ड दिखाया और सेक्टर-62 तक छोड़ने की गुजारिश की। मेरी मदद की दो भाइयों ने। उन्होंने ऑटो वाले का ऑटो अपने घर खड़ा करवाया और मुझे व ऑटो वाले दोनों को 62 छोड़ा। रात के करीब डेढ़ बजे मैं घर पहुंची। सोते वक्त यही सोच रही थी कि डर कर हार जाती तो अभी उसी सड़क पर खड़ी रो रही होती।

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