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हिन्दी आती है तो कान में सीसा घोलकर सरकारी रेडिओ सुनें

अब तो हद हो रही है। एक ओर देश के प्रधान मंत्री इस और उनके करोड़ों प्रशंसक इस बात पर फूले नहीं समा रहे हैं कि प्रधान मंत्री जी पूरी दुनिया में बर मंच पर हिन्दी बोलकर देश की भाषा का सम्मान और गौरव बढ़ा रहे हैं दूसरी ओर प्रधान मंत्री के अधीन चलने वाला केंद्र का हर सरकारी विभाग जी खोलकर हिन्दी  की धज्जियाँ  उड़ा रहा है।
 
अन्य विभागों की बात तो जाने दें क्योंकि उनको देश के लोगों से कोई लेना देना नहीं है सब विभागों का पाला कार्पोरेट के दलालों से पड़ता है और उनका काम अंग्रेजी से चल जाता है, लेकिन आकाशवाणी जैसा माध्यम जिसमें प्रधान मंत्री श्री मोदी जान फूँकने में लगे हैं वह उसी तेजी से हिन्दी की हत्या करने पर आमादा है।
 
आकाशवाणी के एफएम चैनल 107.1 पर आज, सोमवार, 30 मार्च को  दोपहर 12 बजे कोई सुश्री, श्रीमती या सुकन्या जयशंकर प्रसाद की जीवनी अधकचरी हिन्दी और अंग्रेजी में पेश कर रही थी उसे सुनकर तो ऐसा लगा कि या तो किसी अंधे कुए में कूदकर आत्म हत्या कर लेना चाहिए या परमात्मा से ऐसा कोई वरदान माँग लेना चाहिए कि इस देश के हिन्दी भाषियों को जितनी भी थोड़ी बहुत हिन्दी आती है उन्हें ऐसा श्राप मिले कि वो कालिदास के अमर नाटक  शकुंतला की तरह हिन्दी ऐसे ही भूल जाए जैसे महर्षि कण्व के श्राप से राजा दुष्यंत शकुंतला को भूल गया था।
 
अब जरा आकाशवाणी के रेडिओ एफएम 107.1 पर हिन्दी की महान विद्वान सुश्री, श्रीमती या सुकन्या के शब्दों पर गौर फरमाएँ।  जयशंकर प्रसाद हिन्दी के उच कोटि के विद्वान थे, उन्होंने कमाईनी लिखी, (मुझे आश्चर्य हुआ कि उस मोहतरमा ने कामायनी को कमीयनी क्यों नहीं बोला) और भारत के वेद शास्त्रों की खूब स्टडी की वो बहोत बड़े विद्वान थे……
 
आगे सुनने की हिम्मत नहीं हुई इसलिए तत्काल चैनल बदल दिया, लेकिन मेरी इच्छा है कि जन हित में इस मोहतरमा की ये शानदार प्रस्तुति देश के सभी आकाशवाणी केंद्रों पर, दूरदर्शन पर बार बार प्रसारित की जाए ताकि जिन लोगों को हिन्दी का थोड़ा बहुत ज्ञान है वे अपने हिन्दी ज्ञान पर शर्मिंदा होकर आत्महत्या कर लें, जब इस देश का किसान आत्म हत्या कर सकता है तो हिन्दी वाले कौनसी अमर जड़ी खाकर आए हैं।
 
इस देश में आप किसी को घूरकर देखें तो आप पर अपराधिक मुकदमा चल सकता है मगर आप खुले आम देश की संस्कृति,  साहित्य, परंपरा, मूल्यों और राष्ट्रीयता को जीवित रखने वाली देश की भाषा से हर मंच पर खुलकर बलात्कार करें आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इस देश के मीडिया को, अंग्रेजी के लेखकों को, पत्रकारों को और हिन्दी के नाम से सरकारी टुकड़े तोड़ने वाले हर शख्स को ये छूट मिली हुई है कि वह हिन्दी को इतने घटिया तरीके से पेश करे कि सुनने वाला आत्म हत्या कर ले।
 
आश्चर्य और शर्म की बात ये है कि जो लोग हिन्दी में अंग्रेजी का ज़हर घोलने को सही बताते हैं वही ये कबी नहीं कहते कि अंग्रेजी अखबारों में या टीवी चैनलों में कौन माई का लाल हिन्दी के शब्द प्रयोग में लाता है। अगर अंग्रेजी चैनलों पर या अंग्रेजी अखबारों में हिन्दी का प्रयोग नहीं होता है तो फिर हिन्दी चैनल और अखबार वालों ने अपनी हिन्दी में अंग्रेजी का ज़हर क्यों घोल रखा है। 

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