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कुछ तो बात है श्री सुरेश प्रभु मे

ऐसी क्या बात है कि सुरेश प्रभु में जो उन्हें राजनेताओं की जमात से अलग और ऊँचे पर ले जाती है? ऐसा कौन सा जादू है उनके व्यक्तित्व में जो उन्हें पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी और वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की आँखों का तारा बनाता है? उनके गुणों का वह कौन सा आकर्षण था जो बहुत ही सख्त समझे जानेवाले शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे को भी उन्हें केंद्रीय मन्त्रिमण्डल में स्थान देने के लिए बाध्य करता है? और तब प्रधानमंत्री किस अनुराग के चलते बीजेपी कोटे के ऊर्जा मंत्रालय को सुरेश प्रभु के सुपुर्द करते हैं? बाद में शिवसेना अपने कोटे से केंद्रीय मंत्री के रूप में प्रभु की जगह दूसरे सांसद को शपथ दिलाती है तब किस कारण से तात्कालिक प्रधानमन्त्री श्री वाजपेयी सुरेश प्रभु को अपने साथ रखने के लिए अपनी महत्वाकांक्षी नदियों को जोड़नेवाले प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाकर उनको कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर उनका राजनीतिक कद और बढ़ा देते हैं और सुरेश प्रभु को अपने साथ जोड़े रखने के लिए शिवसेना की नाराजगी की भी परवाह नहीं करते ?

कृषकाय सुरेश प्रभु का वह कौन सा शैक्षणिक वजन है जो सर्व शक्तिमान अमेरिका को भी अपने मोहपाश में लेने को मजबूर करता है? ईश्वर में अगाध आस्था रखनेवाले , सीधे सादे लिबास और पूरे सप्ताह दिन के अनुसार रंगों के कपडे पहननेवाले सुरेश प्रभु की वह कौन सी योग्यता है जो उन्हें संयुक्त राष्ट्र के सूट बूटधारी अधिकारियों के बीच स्थान दिला जाता है? आए दिन रेल्वे की करोड़ों परियोजनाओँ, नई रेलों का शुभारंभ होता है, श्री सुरेश प्रभु जहाँ तक हो वहाँ तक खुद इन कार्यक्रमों में न जाकर आधुनिक डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर रिमोट से ही इस कार्य को संपन्न कर अपना भी समय बचाते हैं और रेल्वे के कई अधिकारियों का समय बचाने के साथ रेल्वे को कई फालतू के खर्चों से बचा लेते हैं।

श्री प्रभु उद्योग जगत के दिग्गजों के किसी सेमिनार को संबोधित कर रहे हों या दुनिया के किसी भी प्रतिष्ठित मंच पर किसी अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में, आम कार्यकर्ताओँ के बीच खड़े हों या किसी अध्यात्मिक मंच पर, हर कोई उनकी कही हुई बात को ध्यान से सुनता है। सुरेश प्रभु के साथ न कोई लाव लश्कर होता है न कोई प्रोटोकाल, न सहायक। कार्यक्रमों मेें भी न हार पहनने का शौक न स्वागत समारोह का। कम से कम समय में अपनी बात कहना और अगले कार्यक्रम के लिए रवाना हो जाना। अपने भाषण में वे कभी किसी विरोधी की न तो छीछालेदारी करते हैं न उसकी कमियों पर कोई बात करते हैं।

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भारत सरकार के अनेकों पदों पर रहे सुरेश प्रभु के चुंबकीय मुस्कान पर गांव- गरीब – किसान को कुर्बान होने की प्रेरणा कैसे मिलती है? दुनिया की पंचायतों का मुखिया अमेरिका और उसके प्रमुख बराक ओबामा आखिर किस धारणा के तहत सुरेश प्रभु को जहाँ भी मिलते हैं , वहीं गले लगा लेते हैं? आखिर क्यों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ज्यादातर स्वयंसेवक सुरेश प्रभु की ईमानदारी के कायल हैं? अब तक रेलकर्मियों ,रेल अधिकारियों और रेल यात्रियों के कोप का भाजन बननेवाले रेल मंत्रियों में सुरेश प्रभु का नाम क्यों नहीं आता? रेल यात्रियों के ‘मन की बात’ करनेवाले रेल मंत्री के रूप में सुरेश प्रभु एक मात्र मंत्री क्यों बन गए हैं? देश के चंद सम्मानित नेताओं में से एक पूर्व रेलमंत्री मधु दंडवते को उनकी अपनी घरेलू लोकसभा सीट पर पराजित करने के बाद भी सुरेश प्रभु श्री दंडवते के प्रिय कैसे बने रहे?

चार बार देश के पश्चिम क्षेत्र कोकण के रत्नागिरी से लोकसभा की दहलीज पर पहुँचने, एक बार उत्तर भारत के हरियाणा से राज्यसभा में स्थान पाने के बाद सुरेश प्रभु का नाम कभी मगरूर नेताओं की सूची में क्यों नहीं आया? पक्ष निष्ठा और राष्ट्र निष्ठा को अपना ध्येय बना चुके सुरेश प्रभु आखिर क्यों और कैसे नीतिश कुमार, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक जैसे गैर भाजपाई मुख्यमंत्रियों के मित्र समझे जाते हैं? इसी मित्रता के विस्तार के रूप में आंध्र प्रदेश में भाजपा के चंद विधायकों के बूते पर राज्यसभा तक पहुँचने के लिए क्या सुरेश प्रभु के तेलगु देशम प्रमुख चन्द्रबाबू नायडू की आपसी अंडरस्टैंडिंग को ही आधार माना गया है? सादगी के मामले में किसी भी राजनेता को मात देनेवाले सुरेश प्रभु आखिर किसी केजरीवाल की तरह दिखावे की राजनीति भले ना करते हों पर राजनीतिकों और बहुसंख्य जनता की पारखी निगाहों में कैसे समाये रहते हैं? ऐसी अनगिन बातें हैं जो केंद्रीय रेलमंत्री सुरेश प्रभु को देखकर मन में उठती हैं , जरा आप भी महसूस करके देखें।

श्री सुरेश प्रभु देश की राजनीति में ठीक ऐसे ही हैं जैसे सीप में समाया मोती, समुद्र के खारे पानी की एक बूँद जब स्वाति नक्षत्र में सीप में समा जाती है तो वह एक अमूल्य मोती में बदल जाती है। देश की राजनीति को आज सुरेश प्रभु जैसे मोतियों की ज़रुरत है जो जनता के मन में राजनीति और सत्ता वर्ग के प्रति आस्था, विश्वास और सम्मान पैदा कर सके।

(लेखक भाजपा मुंबई के महामंत्री हैं)

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