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अपने पिता से संस्कारों की ये अनमोल वसीयत मिली है आशुतोष राणा को

फेसबुक पर आशुतोष राणा की ने अपने दिवंगत पिता के जन्मदिवस पर उनकी याद में एक ऐसा वाकया पोस्ट किया है जिसे हर भारतीय को ज़रुर पढ़ना चाहिए….

बात सत्तर के दशक की है जब हमारे पूज्य पिताजी ने हमारे बड़े भाई मदनमोहन जो राबर्ट्सन कॉलेज जबलपुर से एमएससी कर रहे थे, की सलाह पर हम तीन भाइयों को बेहतर शिक्षा के लिए गाडरवारा के कस्बाई विद्यालय से उठाकर जबलपुर शहर के क्राइस्ट चर्च स्कूल में दाखिला करा दिया. मध्य प्रदेश के महाकौशल अंचल में क्राइस्ट चर्च स्कूल उस समय अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में अपने शीर्ष पर था.

पूज्य बाबूजी व मां हम तीनों भाइयों ( नंदकुमार, जयंत, व मैं आशुतोष ) का क्राइस्टचर्च में दाखिला करा हमें हॉस्टल में छोड़के अगले रविवार को पुनः मिलने का आश्वासन देके वापस चले गए. मुझे नहीं पता था कि जो इतवार आने वाला है वह मेरे जीवन में सदा के लिए चिन्हित होने वाला है. इतवार का मतलब छुट्टी होता है लेकिन सत्तर के दशक का वह इतवार मेरे जीवन की छुट्टी नहीं “घुट्टी” बन गया.

इतवार की सुबह से ही मैं आह्लादित था, ये मेरे जीवन के पहले सात दिन थे जब मैं बिना मां बाबूजी के अपने घर से बाहर रहा था. मन मिश्रित भावों से भरा हुआ था, हृदय के किसी कोने में मां, बाबूजी को इम्प्रेस करने का भाव बलवती हो रहा था, यही वह दिन था जब मुझे प्रेम और प्रभाव के बीच का अंतर समझ आया. बच्चे अपने माता-पिता से सिर्फ प्रेम ही पाना नहीं चाहते, वे उन्हें प्रभावित भी करना चाहते हैं. दोपहर 3.30 बजे हम हॉस्टल के विज़िटिंग रूम में आ गए. ग्रीन ब्लेजर, वाइट पैंट, वाइट शर्ट, ग्रीन एंड वाइट स्ट्राइब वाली टाई और बाटा के ब्लैक नॉटी बॉय शूज़, यह हमारी स्कूल यूनीफ़ॉर्म थी. हमने विज़िटिंग रूम की खिड़की से स्कूल के कैम्पस में मेन गेट से हमारी मिलेट्री ग्रीन कलर की ओपन फोर्ड जीप को अंदर आते हुए देखा, जिसे मेरे बड़े भाई मोहन, जिन्हें पूरा घर भाईजी कहता था ड्राइव कर रहे थे,और मां बाबूजी बैठे हुए थे. मैं बेहद उत्साहित था मुझे अपने पर पूर्ण विश्वास था कि आज इन दोनों को इम्प्रेस कर ही लूंगा. मैंने पुष्टि करने के लिए जयंत भैया, जो मुझसे छह वर्ष बड़े हैं, से पूछा – मैं कैसा लग रहा हूं? वे मुझसे अशर्त प्रेम करते थे, मुझे लेकर प्रोटेक्टिव भी थे, बोले – शानदार लग रहे हो. नंद भैया ने उनकी बात का अनुमोदन कर मेरे हौसले को और बढ़ा दिया.

जीप रुकी.. उलटे पल्ले की गोल्डन ऑरेंज साड़ी में मां और झक्क सफेद धोती-कुर्ता गांधी टोपी और काली जवाहर बंडी में बाबूजी उससे उतरे. हम दौड़कर उनसे नहीं मिल सकते थे. यह स्कूल के नियमों के खिलाफ था, सो मीटिंग हॉल में जैसे सैनिक विश्राम की मुद्रा में अलर्ट खड़ा रहता है, एक लाइन में तीनों भाई खड़े मां-बाबूजी के पास पहुंचने का इंतजार करने लगे. जैसे ही वे करीब आए, हम तीनों भाइयों ने सम्मिलित स्वर में अपनी जगह पर खड़े-खड़े Good evening Mummy. Good evening Babuji. कहा.

मैंने देखा good evening सुनके बाबूजी हल्का सा चौंके फिर तुरंत ही उनके चहरे पर हल्की स्मित आई जिसमें बेहद लाड़ था. मैं समझ गया कि वे प्रभावित हो चुके हैं. मैं जो मां से लिपटा ही रहता था, मां के करीब नहीं जा रहा था ताकि उन्हें पता चले की मैं इंडिपेंडेंट हो गया हूं. मां ने अपनी स्नेहसिक्त मुस्कान से मुझे छुआ, मैं मां से लिपटना चाहता था किंतु जगह पर खड़े-खड़े मुस्कुराकर अपने आत्मनिर्भर होने का उन्हें सबूत दिया. मां ने बाबूजी को देखा और मुस्कुरा दीं, मैं समझ गया कि वे प्रभावित हो गई हैं. मां, बाबूजी, भाईजी और हम तीनों भाई हॉल के एक कोने में बैठ बातें करने लगे. हमसे पूरे हफ्ते का विवरण मांगा गया, और 6.30 बजे के लगभग बाबूजी ने हमसे कहा कि अपना सामान पैक करो, तुम लोगों को गाडरवारा वापस चलना है, वहीं आगे की पढ़ाई होगी. हमने अचकचा के मां की तरफ देखा. मां बाबूजी के समर्थन में दिखाई दीं.

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हमारे घर में प्रश्न पूछने की आजादी थी घर के नियम के मुताबिक छोटों को पहले अपनी बात रखने का अधिकार था, सो नियमानुसार पहला सवाल मैंने दागा और बाबूजी से गाडरवारा वापस ले जाने का कारण पूछा? उन्होंने कहा रानाजी मैं तुम्हें मात्र अच्छा विद्यार्थी नहीं एक अच्छा व्यक्ति बनाना चाहता हूं. तुम लोगों को यहां नया सीखने भेजा था, पुराना भूलने नहीं. कोई नया यदि पुराने को भुला दे तो उस नए की शुभता संदेह के दायरे में आ जाती है. हमारे घर में हर छोटा अपने से बड़े परिजन, परिचित,अपरिचित जो भी उसके सम्पर्क में आता है, उसके चरण स्पर्श कर अपना सम्मान निवेदित करता है. लेकिन देखा कि इस नए वातावरण ने मात्र सात दिनों में ही मेरे बच्चों को परिचित छोड़ो अपने माता-पिता से ही चरण स्पर्श की जगह Good evening कहना सिखा दिया. मैं नहीं कहता कि इस अभिवादन में सम्मान नहीं है, किंतु चरण स्पर्श करने में सम्मान होता है, यह मैं विश्वास से कह सकता हूं. विद्या व्यक्ति को संवेदनशील बनाने के लिए होती है संवेदनहीन बनाने के लिए नहीं होती. मैंने देखा तुम अपनी मां से लिपटना चाहते थे लेकिन तुम दूर ही खड़े रहे, विद्या दूर खड़े व्यक्ति के पास जाने का हुनर देती है न कि अपने से जुड़े हुए से दूर करने का काम करती है. आज मुझे विद्यालय और स्कूल का अंतर समझ आया, व्यक्ति को जो शिक्षा दे वह विद्यालय, जो उसे सिर्फ साक्षर बनाए वह स्कूल, मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे सिर्फ साक्षर होके डिग्रियों के बोझ से दब जाएं. मैं अपने बच्चों को शिक्षित कर दर्द को समझने उसके बोझ को हल्का करने का महारथ देना चाहता हूं. मैंने तुम्हें अंग्रेजी भाषा सीखने के लिए भेजा था आत्मीय भाव भूलने के लिए नहीं. संवेदनहीन साक्षर होने से कहीं अच्छा संवेदनशील निरक्षर होना है. इसलिए बिस्तर बांधो और घर चलो. हम तीनों भाई तुरंत मां-बाबूजी के चरणों में गिर गए. उन्होंने हमें उठाकर गले से लगा लिया.. व शुभाशीर्वाद दिया कि किसी और के जैसे नहीं स्वयं के जैसे बनो…

पूज्य बाबूजी जब भी कभी थकता हूं या हार की कगार पर खड़ा होता हूं तो आपका यह आशीर्वाद “किसी और के जैसे नहीं स्वयं के जैसे बनो” संजीवनी बन नव ऊर्जा का संचार कर हृदय को उत्साह उल्लास से भर देता है . आपको शत शत प्रणाम.

आशुतोष राणा के फेसबुक पेज से



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