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हवाई हिन्दुत्व से आगे की सोचें

कुछ बौद्धिक अब यह दिखाने को बुद्धि लगा रहे हैं कि गत चार वर्ष में हिन्दुओं के लिए कितना कुछ काम हुआ। एक बड़े विद्वान ने किसी लेख की अनुशंसा की। उस में ये उपलब्धियाँ गिनाई गई – 1. अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया से भारतीय मूर्तियाँ वापस लाना, 2. योग को दुनिया में फैलाना, 3. गाय की रक्षा करना, 4. गंगा नदी पर विशेष नजर, 5. हिन्दू तीर्थस्थानों की जरूरतों का ध्यान, 6. प्राचीन हिन्दू मूल्यों का पुनरुत्थान।

इन आधारों पर वे मानते हैं कि भाजपा शासन ने ‘हिन्दू विषयों पर दृढ़ रुख लिया।’ कहने की जरूरत नहीं कि ये सब महत्वहीन, गलत या अतिरंजित बातें हैं। योग दुनिया में दशकों पहले से फैल चुका। गोरक्षा के बदले सत्ताधीश ने गोरक्षकों पर गुस्सा दिखाया। लेख में मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलना ‘प्राचीन हिन्दू मूल्यों के पुनरुत्थान’ का उदाहरण बताया गया है! यद्यपि इस्लामी हमलावरों, अत्याचारियों के नाम पर भारत में 704 स्थान होने का उल्लेख किया है। जिन में मात्र एक को भाजपा सत्ता ने बदला भी, तो अपने पार्टी-नेता का नाम दिया। यदि यही सब हिन्दू हित-पूर्ति के उदाहरण हैं तो हमारी स्थिति शोचनीय है।

ऐसे बौद्धिकों ने पहले तीन वर्ष मुख्यतः सत्ताधारियों की जयकार और कांग्रेस का मजाक उड़ाने में नष्ट किया। पर उन्हें सोचना चाहिए कि हिन्दुओं के लिए यह वह कर दिखाने का दावा सत्ताधारी स्वयं क्यों नहीं कर रहे हैं? बौद्धिकों की काल्पनिक दलीलों का कोई मूल्य नहीं। सामान्य लोग अपने ठोस अनुभव से निष्कर्ष निकालते हैं।

वह निष्कर्ष यह है कि भाजपा सत्ता ने हिन्दू हितों को दो कौड़ी महत्व नहीं दिया। उस ने केवल पार्टी-हित सामने रखा। ‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘विकास सभी समस्याओं का समाधान है’, ‘संविधान हमारा धर्मग्रंथ है’ तथा ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ जैसे भ्रामक, हानिकारक विचार दिए। हिन्दुओं की तुलनात्मक दुरअवस्था की अनेदखी की। लोक सभा में अपने ही सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह का निजी विधेयक (226/2016) उपेक्षित किया, जो हिन्दुओं की नीची कानूनी हैसियत को ही सुधारने से संबंधित था। इसके विपरीत, भाजपा सत्ताधीश ने सुन्नी सूफियों के सम्मेलन को प्रचार दिया। यहाँ तक कि सब को ‘प्रोफेट मुहम्मद के रास्ते पर चलने’ की नसीहत दे डाली! यदि यही उन के मन की बात थी, तो फिर करोड़ों हिन्दुओं और मुसलमानों के समझने के लिए कुछ नहीं बचता। वे बिला शक-शुबहा जानते हैं कि मुहम्मद के रास्ते की असल बात क्या थी! आज भी उस के राहगीरों का कारनामा रोज दिखता है और उस की वीभत्स निशानियों से सारी दुनिया भरी है।

अतः कभी-कभार हिन्दुत्व की हवाई बातें, और अन्यतः कांग्रेसी-वामपंथी नीतियों पर ही निष्ठा रखना भाजपा नीति रही है। वे हिन्दू धर्म-समाज को सीधी चोट भले न पहुँचाएं, पर दूसरों द्वारा लगाए घाव भरने की उन की कोई तैयारी या इच्छा भी नहीं है। यह केंद्र में उन की दस साल सत्ता में देखा जा चुका।

फिर कभी सोचना चाहिए कि यदि भाजपा नेता के लिए भारत का संविधान ही धर्म-ग्रंथ है, तो उपनिषद् या भगवतगीता क्या है? याद रहे, कि इसी संविधान ने हिन्दू धर्म-संस्कृति को उपेक्षित किया, और ऊपर से गैर-हिन्दुओं को विशेष ऊँचा दर्जा भी दे रखा है। इस सूरते हाल उन से हिन्दू हितों की पूर्ति की आशा वृथा है। यह स्वयं उन के समर्थक बौद्धिकों की बातों से भी झलकता होता है। वे कोशिश करके भी कुछ नहीं दिखा पाते कि इस बिन्दु पर भाजपा सत्ताधीश ने क्या-क्या कर दिखाया।

वे बस दिलासा मात्र देते हैं कि भाजपा शासन और हिन्दू विरोधी कार्य नहीं करेगा। किन्तु यह क्या वास्तव में कोई उत्साहजनक बात है? यदि हो भी, तो उस का महत्व सत्ता में आकर सदैव विकास और सेक्यूलरवादी मंत्र-जप से स्वयं खत्म नहीं कर दिया जाता? सच्चे विमर्श की दृष्टि से यही प्रश्न केंद्रीय हैं।

अतः पार्टी संबंधी तर्क-वितर्क, कौन, क्यों, कैसे जीता-हारा, आदि पर बहस समय नष्ट करना है। पार्टी-चर्चा छोड़ ठोस विषय बिन्दुओं पर विमर्श केंद्रित करना चाहिए। दिन-रात नेताओं, पार्टियों की ऊँच-नीच, जुमलेबाजी, आदि पर लिख, बोल कर कोई लाभ नहीं होता। यदि विमर्श समस्यायों, समाधान के उपायों पर केंद्रित हो तब संभवतः राजनीतिक विमर्श का स्तर भी सुधरे।

पर चूँकि अभी वैसा नहीं, इसलिए गर्हित अपराध, सांस्कृतिक शैक्षिक गिरावट, अंग्रेजी दबाव, प्रशासनिक-न्यायिक लापरवाही, उत्तरदायित्वहीनता, और निकम्मे शासनतंत्र का विस्तार, आदि जारी रहेंगे। सत्ताधारी अपनी गतिवधियाँ केवल चुनाव दृष्टिगत निर्धारित करते रहेंगे। इस प्रकार, हिन्दू चिंताएं यथावत् अनाथालय में पड़ी रहेंगी।

भारत में राष्ट्रीय और हिन्दू चिंताएं एक ही चीज के दो नाम हैं। इस बुनियादी सचाई को ही खारिज कर दिया गया, जिसे स्थापित करना पहला जरूरी काम है। पाकिस्तान से लेकर मोरक्को तक 57 मुस्लिम देशों में कहने की भी जरूरत नहीं कि वहाँ राष्ट्रीय चिंता और मुस्लिम चिंता एक ही बात है। अमेरिका यूरोप में ईसाई हित को राष्ट्रीय हित के विरुद्ध नहीं, बल्कि एक या सहचारी माना जाता है। विश्व में केवल भारत है जहाँ मुख्य धर्मप्राण जनता की धार्मिक-सांस्कृतिक चिंताओं को न केवल सुना नहीं जाता, बल्कि उस का उल्लेख भी हल्केपन, ‘सांप्रदायिकता’ और ‘असहिष्णुता’ का प्रमाण बताया जाता है। यहाँ पूरी औपचारिक शिक्षा, कानूनी तंत्र और प्रशासनिक-कूटनीतिक व्यवहार इसी आधार पर चलता है।

विडंबना यह, कि इसी दुर्दशा का संकेत कर भाजपा पहले अपना आधार बनाती है। पर करती कुछ नहीं। उस के नेता सार्वजनिक रूप से किसी बिन्दु पर स्वयं को कमिट नहीं करते। बड़े-बड़े नेता भी ठोस तथ्यों पर सिफर मिलते हैं। इसीलिए अनर्गल, फूहड़ बयानबाजियाँ करते हैं। खाली दिमाग आखिर दे ही क्या सकता!

स्थिति साफ दिखेगी, जब भाजपा नेताओं की तुलना यहाँ विविध मुस्लिम या ईसाई नेताओं के बयानों, सार्वजनिक गतिविधियों से करें। वे मुस्लिम, ईसाई हित को सर्वोपरि रखने में कोई हिचक नहीं दिखाते। वे सदैव राष्ट्र-विरोधी नहीं होते, फिर भी साफ कहते हैं कि उन के लिए अपने मजहबी लक्ष्यों, विश्वासों के समक्ष राष्ट्रीय संविधान या कानून का कोई मूल्य नहीं। या वहीं तक है, जिस हद तक उन्हें अपनी मजहबी-राजनीतिक गतिविधियाँ (जिस में हिन्दुओं का धर्मांतरण कराना और वर्चस्व हासिल करना मुख्य है) बढ़ाने में रुकावट नहीं।

अर्थात जो नेता यहाँ संविधान, कानून की अनदेखी कर अपनी अनुचित गतिविधियाँ और चित्र-विचित्र माँगे थोपते रहते हैं, उन की तुलना में भाजपा नेता हिन्दू चिंता को सार्वजनिक विमर्श में भी नहीं लाते। विधान सभा, संसद, संयुक्त राष्ट्र, आदि मंचों पर विचार हेतु रखना तो दूर रहा। बल्कि उन की कल्पना में नहीं कि ऐसा भी किया जा सकता है! यह अभाव इस देश की सब से बड़ी राष्ट्रीय समस्या है।

यदि इसे आँख मिलाकर न देखा गया, तो निश्चय जानिए कि यहाँ सामाजिक संकट किसी विकास या वैज्ञानिक-तकनीकी उन्नति से नहीं घटेगा। इस बुनियादी सचाई का सामना करने के बदले इसे झुठलाना; लेकिन कभी राम-मंदिर, तो कभी किसी सांकेतिक जिक्र से भाजपा नेता केवल चुनाव जीतना चाहते हैं। ऐसे में उन की जीत हिन्दुओं का भ्रम ही बढ़ाती है। कोई ठोस उदाहरण नहीं कि कांग्रेस, कम्युनिस्ट, जनता दल, आदि की तुलना में भाजपा शासन किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर मूलतः भिन्न रहा। अन्यथा भाजपा समर्थकों को सचेत हिन्दुओं से ऐसी दलील की जरूरत न होती कि ‘भाजपा की हार से क्या मिलेगा?’ या ‘क्या कांग्रेसियों से देश का भला होगा?’। ऐसी नकारात्मक दलीलें स्वयं प्रमाण हैं कि भाजपा कार्यकर्ताओं के पास दिखाने के लिए कुछ नहीं कि उन के शासन में अमुक नीतिगत सेवा हुई। इसीलिए, सच्चे राष्ट्रवादियों या हिन्दुओं को राजनीतिक दलों से आगे देखना चाहिए।

साभार- https://www.nayaindia.com/ से



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