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भाईचारे का राग अलापने वाले जान लें कि हमने भाई चारे की क्या कीमत चुकाई है

नूपुर शर्मा का विरोध कर रहे अल्लाह के नेक बन्दे, पांच वक्त के नमाजी एक मोमिन ने कहा कि भारत के हिन्दू और मोमिनों को गंगा-जमुनी तज़हीबी संस्कृति के रूप में एक साथ रहना चाहिए। नूपुर व्यर्थ में हिन्दू और शांतिप्रिय के मध्य विवाद उत्पन्न कर रही है।

अभी सूचना आई है कि पापिस्तान में एक अजन्मे हिन्दू बच्चे का सिर काट कर बाकी अंश गर्भ में छोड़ दिया। हिन्दू महिला की हालत खराब है। कुछ साल पहले खबर आई थी कि श्रीलंका में एक मोमिन डॉक्टर ने सैंकड़ो बौद्ध महिलाओं के गर्भाशय ही निकाल दिए। पाकिस्तान में 1947 से व बंग्लादेश में 1971से हिन्दू नरसंहार चल रहा है।

1970 के आसपास अफगानिस्तान में लगभग 100000 (एक लाख) से अधिक सिख और 280000 (दो लाख अस्सी हज़ार) हिन्दू रहते थे.. आज 2022 में वहां सिर्फ़ 159 सिख और हिन्दू बचे हैं.. जिनमें से एक 140 सिख हैं और बाक़ी 19 हिन्दू.. बौध अब वहां हैं ही नहीं।

लगभग 4 करोड़ की कुल अफ़गानिस्तान आबादी में, ये है अल्पसंख्यकों की आबादी.. कुल 156.. ये आबादी कैसे ख़त्म हो गयी इस पर कोई बात नहीं करता है.. खासकर वामपंथी व शांतिदूत तो बिलकुल भी नहीं।

कारगिल (भारत) में एक गोम्पा (बौद्ध मंदिर) है जो बहुत ही पुराना है.. अब हालात ये हो गए हैं वहां कि बौद्ध अपने उस पुराने मठ में पूजा अर्चाना नहीं कर सकते हैं.. बौद्ध समुदाय उस गोम्पा का पुनर्निर्माण और मरम्मत करना चाहते थे जिसकी इजाज़त वहां का मुस्लिम बाहुल्य समुदाय नहीं दे रहा है.. आजकल वहां इस बात को लेकर बहुत तनाव का माहौल है
ये सब ऐसे ही धीरे धीरे होता है और ऐसा होता है कि न तो दुनिया जान पाती है, और न ही वो इसके बारे में बात करती है.. पचास सालों में तीन लाख से घटकर कोई आबादी सिर्फ़ 19 हो जाती है मगर इतनी बड़ी समस्या पर न कोई कुवैत बोलता है और न ही कोई अन्य देश.. हां कुवैत नुपुर शर्मा को फांसी पर लटकाने के लिए बावला हुवा जा रहा है
और आगे का हाल ये है कि अब चार करोड़ अफ़गानी मुसलामानों के बीच सिर्फ़ 140 सिख अफ़गानिस्तान में नहीं रह सकते हैं.. क़ाबुल में सिखों के गुरुद्वारे पर तीन दिन पहले हमला हुवा.. और भारत सरकार ने आनान फ़ानन में सभी सिखों और हिन्दुवों को वीज़ा दिया है ताकि उन सबको भारत में सुरक्षित रखा जा सके.

आप शांतिदूत के भाईचारे के इतिहास को जानते नहीं अथवा जानकर अनभिज्ञ बने हुए हैं। कुछ उदहारण लीजिये।

1-महमूद गजनवी ने अपने भाई को आजन्म कैद में रखकर ग़जनी की गद्दी छीनी थी। उसके बाद ग़जनवी के बेटे मसूद ने अपने सगे भाई को अँधा करके जेल में डाल दिया और गद्दी हथिया ली।

2- सन 1184 में मुहम्मद गौरी ने खुसरू मलिक को और उसके पुत्र को गिरफ्तार करके उनकी हत्या कर दी।

3-सन 1296 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा जलालउद्दीन खिलजी और उसके सब समर्थकों की हत्या कर दी। इसी खिलजी ने अपने दो भांजों उमरखां और मंगूखां की ऑंखें निकाल लीं और तीसरे भांजे अकातखां का सिर काट डाला और उसके सब साथियों की खाल खींच ली।

4-मलिक काफूर ने दो शहजादों-खिजरखां और शादीखां की जेल में ऑंखें निकलवा लीं। उसके बाद मुबारक ने मलिक काफूर को ही मार डाला और अपने तीन भाइयों खिजरखां , उमरखां और शादीखां को भी मार डाला तथा अपने श्वशुर को भी क़त्ल कर दिया। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए खुसरू खां मुबारक को मार दिया और गाज़ी मलिक ने खुसरू खां को मार दिया।

5-सन 1327 में मुहम्मद तुग़लक़ अपने चचेरे भाई बहाउद्दीन गुरशस्प को जिन्दा जला दिया और उसका मांस पकाकर सारे परिवार को परोसा। शेखजानी को जानवरों की तरह लोहे के पिंजरे में बंद करके उसकी हत्या कर दी।

6- सन 1564 में हुमायूँ ने अपने भाई कामरान को अँधा कर दिया और कामरान के एकमात्र पुत्र की हत्या कर दी।

7- जिंदा पीर औरंगज़ेब ने 8 जून, 1658 को अपने बाप शाहजहां को ही गिरफ्तार करके आगरे किले में बंदी बना दिया। 1659 में औरंगज़ेब ने अपने बड़े भाई दारा शिकोह की हत्या कर दी और सं 1661 में अपने छोटे भाई मुराद की ग्वालियर में हत्या कर दी।

8- वर्तमान में पाकिस्तान में प्रधानमंत्री जुल्फिकार भुट्टों, बेनज़ीर भुट्टों से लेकर सेना के अध्यक्षों तक की हत्या हुई। बंगलादेश में शेख मुजीब रहमान की परिवार सहित हत्या हुई।

जो हिन्दू-सिख-ईसाई 1947 के पश्चात पाकिस्तान और बंगलादेश में रुक गए उनका क्या हश्र हो रहा हैं। न उनका धन, न संपत्ति, न ही बेटियां, न ही उनका सम्मान। उनका कुछ भी सुरक्षित नहीं है। फिर उनके लिए एक प्रावधान उनकी प्राण रक्षा के लिए किया जा रहा हैं। तो उससे भारत के मुसलमानों को आपत्ति क्यों? इससे यही सिद्ध होता है कि शांतिदूतों से भाईचारा केवल एक जुमला है। जमीनी हकीकत अलग है।

साभार –https://www.facebook.com/arya.samaj/ से

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