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अंतरिक्ष में भी ट्रैफिक जामः मानव निर्मित उपग्रहों के टकराने का ख़तरा

अंतरिक्ष उद्योग ने मानव-निर्मित उपग्रहों के इन विशाल तारामंडलों में भारी दिलचस्पी दिखाई है. दरअसल, इनमें पूंजी निवेश से मोटी कमाई होने की उम्मीद रहती है.

पृथ्वी की सबसे नज़दीकी निचली कक्षा (LEO) में सैकड़ों उपग्रहों का विशाल-समूह है. सघन जाल के रूप में फैले ये सैटेलाइट दुनिया भर में फैले नेटवर्क के ज़रिए बिना किसी रुकावट के संचार की सुविधा मुहैया कराने में बुनियादी भूमिका निभाते हैं. इन्हीं की बदौलत धरती के दूरदराज़ के इलाक़ों में भी इंटरनेट की सुविधा मिल रही है. अंतरिक्ष उद्योग ने मानव-निर्मित उपग्रहों के इन विशाल तारामंडलों में भारी दिलचस्पी दिखाई है. दरअसल, इनमें पूंजी निवेश से मोटी कमाई होने की उम्मीद रहती है. SpaceX पहले ही अपने स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट समूहों के ज़रिए मई 2021 में पृथ्वी की निचली कक्षा में 60 सैटेलाइट लॉन्च कर चुका है. आने वाले वर्षों में कंपनी की विशाल-समूह परियोजना के हिस्से के तौर पर और हज़ारों सैटेलाइट लॉन्च करने की योजना है. वनवेब, अमेज़न और अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़ी दूसरी तमाम कंपनियों ने भी ऐसे ही मंसूबे बना रखे हैं.

स्पपेस एक्स पहले ही अपने स्टारलिंक सैटेलाइट इंटरनेट समूहों के ज़रिए मई 2021 में पृथ्वी की निचली कक्षा में 60 सैटेलाइट लॉन्च कर चुका है. आने वाले वर्षों में कंपनी की विशाल-समूह परियोजना के हिस्से के तौर पर और हज़ारों सैटेलाइट लॉन्च करने की योजना है.

बहरहाल, बग़ैर ज़रूरी नियम-क़ायदों के इस तरह उपग्रहों के विशाल-तारामंडल को लॉन्च किए जाने से पृथ्वी की निचली कक्षा में उपग्रहों की भरमार हो जाएगी. ऐसे में उनके संरक्षित और सुरक्षित तरीक़े से संचालन पर सवालिया निशान खड़े हो जाएंगे. इस तरह की भीड़-भाड़ से इन उपग्रहों के दूसरे सक्रिय उपग्रहों के साथ टकराने का जोखिम पैदा होता है. इतना ही नहीं धरती की निचली कक्षा में इधर उधर भटक रहे मलबों और उल्कापिंडों से भिड़ंत का भी ख़तरा रहता है. बाहरी अंतरिक्ष में इस तरह के एक भी टकराव का व्यापक प्रभाव पड़ेगा. इससे भविष्य में और भी ऐसी टक्करों का ख़तरा बढ़ जाएगा. दरअसल अंतरिक्ष में किसी भी तरह की ‘भिड़ंत से मलबों की तादाद में बढ़ोतरी होती है, जिनसे और भी ज़्यादा टकरावों की आशंका पैदा हो जाती है’.

अब तक हम बाहरी अंतरिक्ष में इक्का-दुक्का उपग्रहों के साथ विशाल-समूहों के बीच भिड़ंत के हालात से जैसे-तैसे बच पाए हैं. अंतरिक्ष यात्रा पर अपने वैज्ञानिकों को भेजने वाले देशों या दूसरे शब्दों में अंतरिक्ष में सक्रिय देशों और अंतरिक्ष उद्योग को इन घटनाओं से सबक लेना चाहिए. 2018 में CryoSat-2 के साथ मलबों के ढेर की भिड़ंत रोकने के लिए इसके मिशन कंट्रोलर को इसे ऊंची कक्षा में लेकर जाना पड़ा था. CryoSat-2 सैटेलाइट पृथ्वी के ध्रुवों में मौजूद बर्फ़ की परतों की मोटाई में होने वाले सूक्ष्म बदलावों पर निगरानी रखने का काम करता है. 2019 में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) ने स्टारलिंक सैटलाइट के साथ टक्कर रोकने के लिए अपने अर्थ ऑब्ज़र्वेशन सैटेलाइट को उसकी कक्षा से हटा लिया था. आकलनों के मुताबिक इस वाकये में भिड़ंत का जोखिम ‘टकराव रोकने के लिए ज़रूरी पैंतरेबाज़ी दिखाने के लिए आवश्यक सीमा से 10 गुणा ऊंचा था.’ वैसे तो अंतरिक्ष में सैटेलाइट द्वारा मलबे के टुकड़े से बचने के लिए पैंतरा दिखाते हुए दूर चला जाना आम बात है.

बहरहाल एक सक्रिय उपग्रह के साथ भिड़ंत से बचने के लिए अंतरिक्ष उद्योग अब भी ज़रूरी तौर-तरीक़े सीख रहा है. इस काम के लिए इन तमाम उपग्रहों के संचालकों के बीच हर वक़्त सीधे और सक्रिय संपर्क की ज़रूरत होती है. संचालकों के बीच संचार की मौजूदा व्यवस्था अस्थायी किस्म की है. इतना ही नहीं अभी इस तरह का संपर्क ई-मेलों के ज़रिए किया जाता है. बाहरी अंतरिक्ष में धीरे-धीरे भीड़भाड़ बढ़ती जा रही है. इससे वहां भिड़ंत का ख़तरा बढ़ता जा रहा है. ऐसे में सैटेलाइट ऑपरेटर्स के बीच संचार और संपर्क की मौजूदा व्यवस्था न तो टिकाऊ रहने वाली है और न ही इससे कुशलता सुनिश्चित की जा सकती है.

बाहरी अंतरिक्ष में धीरे-धीरे भीड़भाड़ बढ़ती जा रही है. इससे वहां भिड़ंत का ख़तरा बढ़ता जा रहा है. ऐसे में सैटेलाइट ऑपरेटर्स के बीच संचार और संपर्क की मौजूदा व्यवस्था न तो टिकाऊ रहने वाली है और न ही इससे कुशलता सुनिश्चित की जा सकती है.

शिक्षा जगत द्वारा किए गए आकलनों से भी कक्षा के ऊपर के वातावरण के भविष्य को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आती है. अंतरिक्ष में मलबे के भावी उभारों से जुड़े यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के मॉडल का इस्तेमाल कर शोधकर्ताओं ने उपग्रहों के विशाल गुच्छों के एक से ज़्यादा बार टकरावों की संभावनाओं की पड़ताल की. रिसर्च के ज़रिए ‘पता न लगने वाले मलबे जैसी चीज़ों से भारी जोखिम’ की पहचान की गई. ये चीज़ें आकार में 10 सेंटीमीटर से भी छोटी हैं. हालांकि पता न लगाए जा सकने वाले मलबों से आम तौर पर प्रलय मचाने वाली भिड़ंतों का ख़तरा नहीं होता. इसकी वजह ये है कि इन सैटेलाइटों की संरचना में रक्षा कवच मौजूद होते हैं. हालांकि फिर भी ऐसे टकरावों से सैटेलाइट के प्रमुख क्रियाकलापों, मसलन संचार के ठप पड़ जाने की आशंका रहती है. इस तरह के महत्वपूर्ण क्रियाकलापों में रुकावट आ जाने से मोटे तौर पर संबंधित विशाल उपग्रह प्रणालियों की सेहत पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है. इतना ही नहीं पृथ्वी पर मौजूद नाज़ुक राष्ट्रीय बुनियादी ढांचों की गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है.

इस सिलसिले में एक और जोख़िम उभरती तकनीकों के विस्तार और बाहरी अंतरिक्ष पर उनके प्रभावों के साथ नज़र आता है. शोधों से संकेत मिलते हैं कि अगर पृथ्वी की निचली कक्षा में एक भी सैटेलाइट असुरक्षित हालत में हो तो शैतानी इरादों वाले किरदारों के पास उनको जानबूझकर दूसरे उपग्रहों से भिड़ाने के लिए ज़रूरी पैंतरेबाज़ियों की काबिलियत मौजूद होती है. साइबर तौर-तरीक़ों के ज़रिए वो अंतरिक्ष में मौजूद किसी भी चीज़ के साथ इस तरह की टक्कर करवाने की क्षमता रखते हैं. इसके साथ ही एक और बात पर ध्यान देना ज़रूरी है. साइबर हमलों का ख़तरा तो हर सैटेलाइट पर है लेकिन उपग्रहों के विशाल-तारामंडल के लिए साइबर सुरक्षा के और भी ज़्यादा इंतज़ामों की ज़रूरत होती है. इसकी वजह ये है कि इन विशाल संरचनाओं की कनेक्टिविटी ज़्यादा होती है और चौतरफ़ा फैली इकाइयों तक उनके नेटवर्क का जाल फैला रहता है. इस सिलसिले में संचार के उद्देश्यों से इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (IoT) ऐप्लिकेशंस के तानाबाने की मिसाल ले सकते हैं.

बाहरी अंतरिक्ष के इस्तेमाल के बदलते स्वरूप और उपग्रहों के विशाल-समूहों से उसकी संरक्षा और सुरक्षा को पहुंचने वाले संभावित ख़तरों की वजह से कुछ ज़रूरी नियम-क़ायदे तय करना ज़रूरी हो जाता है. इससे पहले कि देर हो जाए हमें सचेत होकर क़दम उठाने की दरकार है.

टकराव के ख़तरों को कम से कम करने और टिकाऊ कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए उपग्रहों के विशाल-गुच्छों के इर्द-गिर्द विशिष्ट नियमों और नीतियों का निर्माण. भविष्य में सैटेलाइट की संख्या में बढ़ोतरी होने वाली है. ऐसे में पृथ्वी पर मौजूद प्लैटफ़ॉर्म ‘निगरानी रखने और नियंत्रण करने में शायद पर्याप्त न हों.’ लिहाज़ा इनको लेकर बनने वाले नियम-क़ायदों में अंतरिक्ष में बढ़ते ट्रैफ़िक प्रबंधन के नए रुख़ों को शामिल करना होगा.

बाहरी अंतरिक्ष में मान्यताओं, नियमों और जवाबदेह बर्तावों को रेखांकित करते हुए आचार संहिता का निर्माण करना. इस आचार संहिता के दायरे में न सिर्फ़ सरकारी बल्कि निजी क्षेत्र भी शामिल करना चाहिए. कुछ तयशुदा ऑर्बिटल क्षेत्रों में मुट्ठी भर किरदारों (कंपनियों और देशों) का एकाधिकार रोकने के लिए ये ख़ासतौर से अहम है. बाहरी अंतरिक्ष के इन इलाक़ों तक सबका जायज़ हक़ और समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ये ज़रूरी है.
संचालकों के बीच संचार के लिए स्पष्ट हॉटलाइन कायम करना. इतना ही नहीं इन हॉटलाइनों के परीक्षण के लिए साझा अभ्यासों की व्यवस्था करना भी ज़रूरी है.

अंतरिक्ष और धरती की सतह के दायरों में साइबर हमलों को रोक पाना नामुमकिन है. लिहाज़ा इनको रोकने की क़वायद करने की बजाए उपग्रहों के विशाल-गुच्छों के संचालकों को जोखिमों का आकलन करने पर ज़ोर देना चाहिए. इसके अलावा ख़तरों को कम करने की स्पष्ट नीतियां बनानी चाहिए (मिसाल के तौर पर साइबर ख़तरों, टक्कर से जुड़े जोख़िमों, आदि). इसके अलावा विनाशकारी प्रभाव वाली नाकामी को रोकने के लिए अधिकता और निरर्थकता से जुड़े उपाय भी लागू करने चाहिए.

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) भिड़ंत रोकने के लिए एक स्वचालित या ऑटोमेटेड सिस्टम तैयार कर रहा है. ये तंत्र मशीन लर्निंग तकनीक पर आधारित है. भिड़ंत रोकने वाला ये स्वचालित सिस्टम अंतरिक्ष के भीतर टकराव की आशंकाओं को काफ़ी कम कर देगा. एक बार मशीन को टकराव से बाल-बाल बचने वाले हालातों की जानकारी मिल जाएगी तो वो भविष्य में ऐसी परिस्थितियों के बारे में और बेहतर तरीके से पूर्वानुमान लगा पाएगा. हालांकि, इस तरह की सुविधा के बावजूद संचालकों को अपने स्टाफ़ को मशीनों द्वारा लिए गए फ़ैसलों की व्याख्या करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए. निर्णय लेने की प्रक्रिया में हर वक़्त इंसानों को शामिल किए जाने और उनके दखल का विकल्प बनाए रखने से इस प्रक्रिया में मदद मिलेगी. मोटे तौर पर संचालकों द्वारा सिस्टम की क्षमताओं पर भरोसा करने लायक परिस्थितियों का निर्माण करना ज़रूरी है. पर्याप्त परीक्षणों और विकास से जुड़े तंत्र के अभाव में ये लक्ष्य हासिल नहीं हो सकता.

साइबर हमलों का ख़तरा तो हर सैटेलाइट पर है लेकिन उपग्रहों के विशाल-तारामंडल के लिए साइबर सुरक्षा के और भी ज़्यादा इंतज़ामों की ज़रूरत होती है. इसकी वजह ये है कि इन विशाल संरचनाओं की कनेक्टिविटी ज़्यादा होती है और चौतरफ़ा फैली इकाइयों तक उनके नेटवर्क का जाल फैला रहता है.

बेहतर कार्यप्रणाली से जुड़ी इन तमाम सिफ़ारिशों के साथ-साथ ज़िम्मेदार नवाचार के व्यापक सिद्धांतों का पालन भी निहायत ज़रूरी है. लंबे समय तक राज्यसत्ताओं ने बाहरी अंतरिक्ष की सुरक्षा पर जोखिम से जड़ी प्रशासनिक व्यवस्था के नज़रिए से ज़ोर डाला है. बहरहाल सोच के मौजूदा दायरे और प्रशासनिक तौर-तरीक़ों को बदलने की ज़रूरत है. इस सिलसिले में नवाचार से जुड़े प्रशासन पर भी ध्यान लगाने की आवश्यकता है ताकि टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के हित में हो सके. हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अंतरिक्ष के क्षेत्र से जुड़े सभी किरदार एक-दूसरे की सुरक्षा के लिए पारस्परिक रूप से ज़िम्मेदार होते हैं.

साभार https://www.orfonline.org/hindi/ से

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