ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

प्राचीन संस्कृत साहित्य में यात्रा से जुड़ी कहावतें अर्थ सहित

भारत में प्रायः यात्राओं एवं यात्रा अनुभवों का अत्यंत महत्व रहा है। संस्कृत साहित्य में यात्रा का उल्लेख मिलता है और कई यात्रा संबंधी कहावतें इसका जीवंत उदाहरण हैं। इनमें हमारे उन ऋषि-मुनियों की चिरयुगीन बुद्धिमत्ता का समावेश है जो अब तक के सर्वश्रेष्ठ यात्री हैं।

संस्कृत साहित्य में यात्रा

जब हमारे मस्तिष्क का भिन्न भिन्न अनुभवों से सामना होता है तभी हमारी बुद्धि का विकास होता है। ऐसे ही अनेक अनुभवों को प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन है यात्रा। हमारे पूर्वजों को यात्रा के महत्व का पूर्ण आभास था। उन्होंने कई शास्त्रों एवं पुस्तकों में यात्रा की आवश्यकता की भरपूर अनुशंसा की है।

ऋषि-मुनियों ने मानव के सर्वांगीण विकास हेतु यात्रा की आवश्यकता का उल्लेख इन शास्त्रों एवं पुस्तकों में कहावतों के रूप में की है। ये यात्रा संबंधी कहावतें संस्कृत भाषा में की गई हैं। आईए प्राचीन युग के इन यात्रा संबंधी संस्कृत कथनों को जानने एवं समझने का प्रयत्न करते हैं। सर्वप्रथम देखते हैं संस्कृत भाषा में यात्रा से संबंधित कितने शब्द हैं।

यात्रा से संबंधित प्रसिद्ध संस्कृत शब्द

यात्रा (YATRA) – TO TRAVEL – यात्रा करना
यात्री (YATRI) – TRAVELER – यात्रा करने वाला अथवा वाली
पर्यटक (PARYATAKA) – TOURIST – यात्रा करने वाला अथवा वाली
पर्यटन ( PARYATAN) – TOURISM – यात्रा करना
पथिक (PATHIKA) – THAT ON THE ROAD – सड़क मार्ग पर चलाने वाला अथवा वाली
प्रवासिन् (PRAVASIN) – LIVING IN ANOTHER COUNTRY – परदेश में रहने वाला अथवा वाली

इनके अतिरिक्त भी यात्रा से संबंधित अनेक शब्द हैं।

संस्कृत साहित्य में यात्रा संबंधी सद्-वचन

विभिन्न संस्कृत शास्त्रों में उल्लेख किए गए कुछ सद्-वचन तथा एक यात्री के लिए उनके क्या संदर्भ हैं, आईए जानते हैं:

१. पर्यटन् पृथिवीं सर्वां, गुणान्वेषणतत्परः।
(पंचतंत्र)
जो गुणों की खोज में अग्रसर हैं, वे सम्पूर्ण पृथ्वी का भ्रमण करते हैं।
Those who wish to seek virtues travel the entire world.

२. हदये सुखसम्पत्तिः पदे पर्यटनं फलम्।
(सर्व सिद्धांत संग्रह)
उनके हृदय में सुख व संपत्ती तथा पैरों में पर्यटन होता है।
They have happiness and wealth in their hearts and traveling in their feet.

३. चरैवेति चरैवेति॥
(ऐतरेय ब्राम्हण ७.१५)
चलते रहो, चलते रहो…
Keep moving, keep moving…

४. यस्मिन्प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति; स वै श्रेष्ठो गच्छत यत्र कामः।
(महाभारत, अश्वमेध पर्व ७-२३)
जो व्यक्ति उनके समक्ष आने वाले हर प्रकार के मार्ग पर चलने के लिए तत्पर हैं, वे श्रेष्ठ होते हैं तथा उनको अभीष्ट प्राप्त होता है।
Those who walk on what has come forth are indeed great and get what they desire.

५. चरन्ति वसुधां कृत्स्नां वावदूका बहुश्रुताः।
(महाभारत, शांति पर्व १९-२४)
बुद्धिमान और वाक्-कुशल व्यक्ति, सारी पृथ्वी का भ्रमण करते हैं।
Intelligent and eloquent people roam around the whole world.

 

 

६. चरन्मार्गान्विजानाति ।
(महाभारत, आदि पर्व १३३-२३)
पथिक व्यक्ति को मार्ग का ज्ञान स्वयं ही हो जाता है।
A wanderer (eventually) knows the path.

७. आस्ते भग आसीनस्य, ऊध्वर्स्तिष्ठति तिष्ठतः।
शेते निपद्यमानस्य, चराति चरतो भगः।
(ऐतरेय ब्राम्हण ७.१५)
ठहरे हुए व्यक्ति का सौभाग्य भी ठहर जाता है। उठ खड़े होने वाले व्यक्ति का सौभाग्य उठ खड़ा हो जाता है तथा सुप्त व्यक्ति का सौभाग्य भी सुप्त हो जाता है। उसी प्रकार गतिमान व्यक्ति का सौभाग्य उसके साथ- साथ चल पड़ता है अर्थात उसके सौभाग्य में भी वृद्धि होने लगती है।
The fate of a person who sits, also seats. The fate of a standing person also stands and the fate of a sleeping person also sleeps. But the fate of a person who walks (travels) also walks (grows) along.

८. चरन् वै मधु विन्दति, चरन् स्वादुमुदुम्बरम्।
सूयर्स्य पश्य श्रेमाणं, यो न तन्द्रयते चरन्।
(ऐतरेय ब्राम्हण ७.१५)
जो व्यक्ति सदा श्रमशील एवं गतिशील हैं, वही सदा मधुपान (शहद/ अमृत / परिश्रम का सुफल) करते हैं। कर्मयोगी को सदा श्रेष्ठ कर्म का श्रेष्ठ परिणाम मिलता है। सूर्य की कर्मठता तथा सृजन शीलता देखिए, क्षण भर भी जो दूसरों के कल्याण के लिये अपने श्रम से विमुख नहीं है।
The one who travels enjoys the nectar. The same enjoys sweet fruits. Look at the efforts of lord Surya; he is never tired of walking.

९. अन्योन्यवीर्यनिकषाः पुरुषा भ्रमन्ति।
(उरुभंग 2)
एक दूसरे की पहचान जो वीरता के मापदंड से करते है, वे भ्रमण करते हैं।
Those who test each-other based on their valor, travel.

१०. दुःखं हन्तुं सुखं प्राप्तुं ते भ्रमन्ति मुधाम्बरे।
(बोधिचर्यवतार)
वे आकाश में सम्मोहित से, दुःख भुलाने के लिये तथा सुख की प्राप्ति के लिये घूमते (उड़ते) है (हमारे समान)।
They roam madly in space, to forget the grief, and to attain happiness (just like us).

११. हृदि श्रीर्मस्तके राज्य पादे पर्यटनं फलम्।
(सर्व-सिद्धांत-संग्रह)
उनके मन में संपत्ति, सिर पर राज्य का दायित्व तथा पैरों में पर्यटन होता है।
They have wealth in heart, kingship on their heads (responsibilities) and traveling in their feet.

१२. योजनानां सहस्त्रं तु शनैर्गच्छेत् पिपीलिका।
(सुभाषितमाला)
शनैः शनैः ही सही, सतत चलते रहने पर, चींटी जैसी छोटी सी जीव भी सहस्रों योजन की यात्रा पूर्ण कर लेती है।
Even a tiny creature such as ant can move ahead miles together if it keeps on walking consistently.

१३. यस्तु संचरते देशान् यस्तु सेवेत पण्डितान् ।
तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥
(सुभाषित मंजरी)
भिन्न भिन्न देशों में भ्रमण करने वाले तथा विद्वानों के साथ संबंध रखने वाले
व्यक्ति की बुद्धि उसी तरह बढ़ती है, जैसे तेल की एक बूंद पानी में फैलती है।
The intelligence of a person who travels in different countries and associates
with scholars expands, just as a drop of oil expands in water.

Reसंस्कृत के सुशांत रत्नपारखी द्वारा https://www.inditales.com/hindi/ के लिए प्रस्तुत

 

 

 

 

 

सुशांत रत्नपारखी संस्कृत के लिए समर्पित हैं उनकी वेब साईट भी देखें
https://resanskrit.com/

image_pdfimage_print


1 टिप्पणी
 

  • Mayur

    जनवरी 11, 2020 - 8:04 pm

    Good informative article… keep going…

Comments are closed.

सम्बंधित लेख
 

Back to Top