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अदिवासी दिवस एक छलावा है

आज का दिन आदिवासी दिवस कौन जादू से हुआ? ये तो International Day of the World’s Indigenous Peoples है। क्या हम ट्राइबल और इंडीजीनस का भी फर्क भूल गये? क्या हम उन बहसों को भी भूल गये जिनके कारण अंततः इन्हें अनुसूचित जनजाति कहने पर सहमति बनी थी।

इसका तो भारत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में आधिकारिक और औपचारिक रूप से स्टैंड ले चुका है कि यह दिवस भारत में प्रवर्तनीय नहीं है। भारत ने कहा था कि आज़ादी के बाद भारत में सब मूलनिवासी हैं। भारत ने इस दिवस की प्रासंगिकता दुनिया के कई देशों में पाई थी और वहाँ इस दिवस को मनाने का समर्थन भी किया था। उन उपनिवेशवादी देशों में अपनी तरह का पाखंड चलता है। चुनांचे इनके अधिकारों के सार्वभौम घोषणापत्र को आज तक भी इंटरनेशनल लॉ की विधिक मान्यता नहीं मिल पाई है।होगा भी कैसे जहाँ एक तरफ़ कोलंबस डे सेलीब्रेशंस भी चलते रहें और दूसरी ओर यह दिवस भी।रामाय स्वस्ति, रावणाय स्वस्ति। हालाँकि यह भी कहना होगा कि कई सिटी कौंसिलों और राज्यों ने इस द्वैत को पहचाना है और कोलंबस दिवस को इंडीजीनस पीपुल्स डे की तरह मनाना शुरू किया है। संयुक्त राष्ट्र के २००७ के उस घोषणापत्र पर उन्हीं देशों ने विरोध किया जहाँ ये समस्या सबसे ज़्यादा थी, यानी संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड।

यहाँ भारत में Aboriginals या Autochthonous या native कहे जाने वाले कोई विशिष्ट वर्ग नहीं हैं। यह तो उन लोगों के लिए है जो एक settler colonization के शिकार हुए, जहां उपनिवेशवाद विजयी हुआ।

भारत ने तो उपनिवेशकों को lock, stock and barrel वापस भेजा। किसी को इंग्लैंड, किसी को पुर्तगाल। पराजित कर अपना-सा मुँह लेकर लौटा दिया।

भारत पर यह जबरन का इंटरनेशनलिज्म क्यों लागू करवाने की जद्दोजहद है? 9 अगस्त को मनाना है तो काकोरी शहीदों की स्मृति में मनायें। भारत छोड़ो आंदोलन की स्मृति में मनायें और एक आत्म-समीक्षा करें कि अंग्रेज़ी औपनिवेशिकता का क्या क्या छोड़ना बाक़ी रह गया है।

यह उन भाई लोगों की पिछले दरवाज़े से आर्य आक्रमण थियरी को नये नक़ाब में घुसाने की कोशिश है, जो अंग्रेजों के उपनिवेशवाद को उचित ठहराने की माथापच्ची करते थे। यह उन लोगों की भी हमदर्दी हासिल करती है जो इस भारत को अपनी मातृभूमि या पितृभूमि की तरह बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। और जो अनुभव सिन्हा की फ़िल्म मुल्क में एक धमकी की तरह कहलाते हैं कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी। पाँच हज़ार साल पहले जायेगी। रोज़ जिस थियरी के परखचे उड़ रहे हैं, अब वह इस रूप में आई है। ‘लपटन साहब की वर्दी पहनकर आई है।’

भारत में आटविक होते थे, वनेचर भी लेकिन ‘आदिवासी’शब्द का प्रचलन शास्त्रों में कभी न था।1930 के आसपास इस ‘आदिवासी’ शब्द ने आकार लिया। अब क्या कहें इसे। आदिवासी वहाँ कहाँ हो जहाँ हम सब अनादिवासी हैं। सनातन के साथी। किरातेश्वर की पूजा करने वाले देश को ये ‘ फ़र्स्ट पीपुल्स’ का ज्ञान देने वाले कहाँ से आ गये। मध्यकाल में सत्ताओं के अत्याचारों ने कइयों को वनों की शरण लेने को बाध्य किया और इस कारण जनजातीयकरण यहाँ जड़ विरासत न होकर समानुकूलन की एक रणनीतिक प्रक्रिया रही। यहाँ वनवासी राजा रहे हैं। श्रृंगवेरपुर के निषाद से लेकर गोंडवाना साम्राज्य तक उन्होंने शासन किया है।

भारत के जिन लोगों का भारत से मूल सम्बन्ध मिटाने की कोशिश है, उनमें से एक भी जाति, एक भी गोत्र ऐसा नहीं है जो यह कहता हो कि वे अफ़्रीका से या यूरोप से भारत आए थे। सब के लिए यही उनकी मातृभूंमि है। उनका कोई भारत-पार पुण्य-स्रोतस्थल नहीं। नौ अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन की जो राष्ट्रीय पुकार अंग्रेजों के ख़िलाफ़ उठी थी, अब उस की धार अपनी ही अंतड़ियों की ओर मोड़ी जा रही है। इसीलिए उस राष्ट्रीयता के मुक़ाबले स्थानीयताओं को खड़ा करने का यह नया उपक्रम है। यहाँ भारत के ही लोगों के बीच एलियनेशन पैदा करने की कोशिशें हैं। ये कि अपने ही देशवासियों को ‘ दिकू’ बताओ और पत्थलगढ़ी आंदोलन चलाओ। सर के बल खड़ा कर दो उन वनवासियों को जिन्होंने देश में सबसे पहले अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध विद्रोह किये। अब उन्हें कन्वर्ट करो और कहो कि मूलनिवासी तुम हो। बाकी देश छोड़ें। क्विट इंडिया की कसक अभी भी है बाक़ी।

(लेखक मध्य प्रदेश के सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी हैं व विभिन्न राष्ट्रीय, धार्मिक व सामाजिक विषयों पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं)

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