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केंद्रीय मंत्री श्री ‘निशंक’ द्वारा आशीष कौल की पुस्तक ‘रक्त गुलाब’ का विमोचन

नई दिल्ली। वरिष्ठ मीडियाकर्मी आशीष कॉल की तीसरी किताब , ‘रक्तगुलाब’ का विमोचन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति में किया गया। पिछले दो साल में ये आशीष की तीसरी किताब है जिसने बेस्टसेलर की श्रेणी में खुद को स्थापित किया है।

कश्मीर और कश्मीरी पंडितों के विस्थापन से जुड़े सच को हर मराठी मानुष तक पहुंचाने की कोशिश है आशीष कौल कृत राजहंस प्रकाशित मराठी उपन्यास “रक्त ग़ुलाब” ।विगत वर्ष की हिंदी बेस्टसेलर उपन्यास “रिफ्यूजी कैंप” का मराठी अनुवाद ये उपन्यास एक तरह से अपने पात्रों, घटनाओं, तर्कों और सवालों के सहारे कश्मीर पर जन जन की सोच को एक नयी दिशा देता है।

दरअसल ,ये कहानी एक साधारण लड़के “अभिमन्यु’ के नेतृत्व में 5000 लोगों के अपने आप में एक विशाल आत्मघाती दस्ते में तब्दील होने की कहानी है ताकि वो अपने घर,अपने कश्मीर वापिस लौट सकें । ये आसान शब्दों में कही गयी इंसानी जज़्बे की वो कहानी है जो हर भारतीय में छुपे अभिमन्यु को न सिर्फ झकझोरती है , बल्कि जगा भी रही है । संदेश स्पष्ट है कि जब तक आप स्वयं खुद के लिए खड़े न होंगे, कोई आपके साथ खड़ा नहीं होगा ।

“अभिमन्यु की कहानी को मराठी में कहना मेरे लिए बहुत ज़रूरी था। कश्मीर के बाद महाराष्ट्र ने न सिर्फ मुझे काम दिया , बल्कि ज़िन्दगी को एक नयी दिशा और मुझे दोबारा ज़िन्दगी संवारने का अवसर भी दिया। वो कश्मीरी पंडित जो १९ जनवरी को अपने ही देश में रिफ्यूजी हो गए थे ,उनको शायद सबसे बड़ा सहारा महाराष्ट्र ने ही तब दिया जब बाला साहेब ने यहाँ के शिक्षण संस्थानों में कश्मीरी विद्यार्थियों के लिए सीटें विशेष तौर पर आवंटित की। विश्व की सौ प्रतिशत साक्षर कश्मीरी पंडित कम्युनिटी के लिए ये बहुत बड़ा सहारा था।ये मेरा तरीका है महाराष्ट्र की मिटटी के प्रति आभार व्यक्त करने का।”भावुक आशीष ने कहा।

लेखक की छह साल की बच्ची ने उनसे पूछा , ‘अगर हम कश्मीरी हैं और कश्मीर वाकई इतना सुंदर है, तो हम वहाँ क्यूँ नहीं रहते? आशीष के पास तब कोई जवाब नहीं था । आज छह साल बाद ये किताब उस बच्ची और हर बूढ़े जवान सबके सवालों का जवाब है कि कश्मीरी पंडित आखिर वहाँ से क्यूँ निकाले गए और क्यूँ वापिस नहीं जा पा रहे और कैसे जा पाएंगे ? हजारों साल पहले महाभारत में अभिमन्यु ने अपनी जान देकर एक चक्रव्युह भेदा था जो अपने आप में भय का प्रतीक था । तब भी कोई अपनी ज़मीन वापिस चाहता था और आज भी लाखों लोग अपने कश्मीर लौटना चाहते हैं। ये किताब हम सब में छुपे उसी अभिमन्यु को जगाने का एक प्रयास है । ये किताब एक कोशिश है धर्म जाति से ऊपर उठ आतंक के खिलाफ एक लड़ाई के लिए लोगों में अभिमन्यु को जगाने की ताकि सब बैठकर किसी करिश्मे का इंतज़ार करने की बजाए खुद आतंक के खिलाफ खड़े हों ।

रोचक ढंग से किताब कहानी के पात्रों और घटनाक्रमों के साथ कश्मीर के हज़ार साल के इतिहास और गौरवशाली हिन्दू अतीत को पाठकों के सामने रखती है ताकि वर्तमान समस्या की जड़ को समझा जा सके। आशीष ने बताया ,”हिंदी में “रिफ्यूजी कैंप” और मराठी में “रक्त गुलाब” इस कहानी को कहना ज़रूरी था ताकि हिंदुस्तान में फिर कोई ‘कश्मीर’ न जन्मे , ताकि फिर कहीं किसी अभिमन्यु , अभय प्रताप कौल या आरती को ‘रालीव गालिव या चलिव ’ यानि हमसे मिल के हम जैसे हो जाओ (धर्म परिवर्तन) , भाग जाओ या मर जाओ जैसे नारे लाउड स्पीकर पर न डरा पाएँ , ताकि फिर कोई मुख्तार अपने दोस्त से न बिछड़ जाये । कहना ज़रूरी था ताकि फिर मुट्ठी भर आतंकी भय का साम्राज्य खड़ा कर लाखों लोगों को भागने पर मजबूर न कर पाएँ। कहना ज़रूरी था ताकि टीवी चेनलों पर समझाया जा रहा ‘कश्मीर’ असल कश्मीर और उसकी समस्याओं से देश को दूर न कर दे।

“रक्त गुलाब”’ उन वीभत्स 48 घंटों के घटनाक्रमों का तो ज़िक्र करती ही है कि जिनमें वादी में अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों को मोब लिंचिंग जैसी घटनाओं और बलात्कार और बरबरताओं का सामना करना पड़ा । न न्यूज़ मीडिया था और न सशक्त सरकार।कोई नहीं था तब। हर शाम हिन्दू घरों पर पत्थरबाजी , रोज़ रात लाउड स्पीकर्स से गूँजती धमकियाँ कि या धर्म बदलो, या भाग जाओ या दर्दनाक मौत के लिए तैयार हो जाओ ,विशिष्ट हिन्दू व्यक्तियों को दिन दहाड़े , सरे आम गोलियों से भून सब हिंदुओं को भेड़ बकरियों की तरह सड़कों पर मरने के लिए छोड़ गए सब ।सब हो रहा था और कानून और पुलिस नदारद थे । 1989 -90 का वो घटनाक्रम कि जिसने करीब 6 लाख लोगों से उनका घर , त्यौहार , परम्पराएँ छीन ली । कोई कश्मीर के उस इतिहास की बात नहीं करता । बात करने से लोग कतराते हैं। सायास उस इतिहास को मिटाने के प्रयास जारी हैं ताकि कश्मीरियत को दफन किया जा सके , ताकि लोग भूल जाएँ कि कैसे करीब 6 लाख लोग अपने ही घर में रिफ़्यूजी बन गए । ये सभी घटनाएँ इस किताब में दर्ज हैं।

पिछले साल मूल किताब,”रिफ्यूजी कैंप” का लोकार्पण दिल्ली में तत्कालीन सूचना व प्रसारण और खेल व युवा मामलों के मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर ने किया था और ये अपने पहले ही सप्ताह में लोकप्रियता के पायदान चढ़ते हुए अमेज़ॉन बेस्ट सेलर की लिस्ट में शुमार हुई थी। पिछले एक साल से ऊपर के समय में इस कहानी को लेकर युवाओं में ख़ासा विमर्श लगातार जारी रहा है, जिसके लिए लेखक हरियाणा , उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , दिल्ली , पंजाब और हिमाचल के शिक्षण संस्थानों और साहित्य समारोहों के विविध मंच से सम्बोधन करते रहे हैं।

किताब को जाने माने लोगों का भी काफी समर्थन प्राप्त है । चीफ़ ऑफ आर्मी स्टाफ रिटायर्ड जनरल जे जे सिंह ने किताब का फॉरवर्ड लिखा है । ये पहली बार है कि पाकिस्तान से गायक संगीतकार हसन जहाँगीर ने भी कहा है कि ‘किताब सीमा के दोनों ओर के लोगों से ये स्मष्ट कहती है कि ‘अमन’ विकल्प नहीं मूल मानवीय भाव है जो सीमा के दोनों ओर के लोगों के लिए ज़रूरी है। ‘ इसके अलावा कलाकार अभिनेता राहुल सिंह , कुश्तीबाज संग्राम सिंह ने भी इस किताब को पसंद किया है।

“किताब लिख दी , छप गयी , बिक भी रही है , पर मेरे लिए इसकी सफलता तब है जब ये एक आम भारतीय (खासकर युवा) के बीच चर्चाएँ शुरू कर पाये । ‘कश्मीर’ सिर्फ कश्मीरियों की नहीं पूरे भारत के लिए महत्वपूर्ण है। पूरा भारत जब कश्मीर की समस्या और उसकी वजह को समझेगा तभी कोई रास्ता भी निकलेगा ।इसलिए कोशिश है की ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के बीच किताब और किताब में उठाए गए विषयों पर चर्चा हो । मराठी के बाद अंग्रेजी और उर्दू में भी ये कहानी लोगों तक पहुंचाने की मेरी कोशिश रहेगी।” लेखक आशीष कॉल ने बताया।

नोट – राजहंस प्रकाशित “रक्त गुलाब “लेखक आशीष कौल की पहली किताब, हिंदी में प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित “रिफ्यूजी कैंप” का मराठी भाषान्तरण है । 27 साल से अपने मीडिया कैरियर में नए बिजनस आइडिया देने और पुराने व्यवसाय में नयी जान फूंकने वाले आशीष दरअसल बिज़्निस लीडर होने के साथ साथ एंटेरटेनमेंट की दुनिया का जाना माना नाम हैं। ज़ी ग्रुप में एक्ज़ीक्यटिव वाइस प्रेसिडेंट , बजाज ग्रुप में कंट्री मैनेजर ,हिंदुजा ग्रुप में बिजनीस हैड रहे आशीष कॉल आजकल फोकलोर मीडिया की कमान संभाल रहे हैं।
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