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हिंदी भाषा को लेकर अनावश्यक विवाद

देश के गृहमंत्री अमित शाह जी ने हिंदी भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए आग्रह किया। गृहमंत्री जी का कहना था कि हिंदी को अंग्रेजी के स्थान पर प्राथमिकता देनी चाहिए। उनके इस बयान में कुछ भी गलत नहीं था।

उनके बयान का दक्षिण भारत के राजनेताओं ने विरोध किया जिनमें तमिलनाडु मुख्य है। मैंने अपने जीवन के 6 वर्ष तमिलनाडु में व्यतीत किये है। इसलिए मुझे वहां की भाषा, पहनावा, सोच को नजदीक से देखने का अवसर मिला हैं। मैं दो घटनाओं से भाषा सम्बंधित विवाद पर अपनी टिप्पणी करना चाहूंगा।

पहला मैं जब तमिलनाडु गया तो मुझे तमिल नहीं आती थी। एक बार मैं एक दुकानदार से रास्ता पूछने लगा तो उसने हिंदी तेरियादे अर्थात हिंदी नहीं मालूम कहकर मुझे चलता कर दिया। संयोग से कुछ दिनों के पश्चात मैं उसी दुकान से कपड़े खरीदने गया तो उसने हिंदी में मेरा स्वागत किया। क्योंकि बाप बड़ा न भैया। सबसे बड़ा रुपया।

दूसरा उदाहरण मेरे मेडिकल कॉलेज के कर्मचारी का है। उसका लड़का ग्वालियर में एक कॉलेज में उच्च शिक्षा के लिए साक्षात्कार देने गया। स्टेशन से उतर कर वह अपने कॉलेज साक्षात्कार देने के लिए पहुंच ही नहीं पाया। क्योंकि वह केवल तमिल और इंग्लिश जानता था। जबकि ग्वालियर के जन केवल हिंदी जानते थे। बिना साक्षात्कार दिए वह वापिस आ गया।

हिंदी भाषा क्यों राष्ट्रभाषा के रूप में सारे देशवासियों की भाषा होनी चाहिए? क्योंकि

-स्वामी दयानन्द के अनुसार हिंदी भाषा पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।

-आज कोई व्यक्ति जीवन में केवल अपने स्वराज्य में ही निवास नहीं करता। शिक्षा, नौकरी आदि के लिए वह अपने राज्य से अलग राज्य में जाता हैं। इसलिए पुरे देश की एक राष्ट्रीय हिंदी भाषा होनी चाहिए। ताकि देशवासियों को आपस में संवाद में कोई समस्या न हो।

-हिंदी सीखना स्थानीय भाषा की हत्या, उससे भेदभाव नहीं हैं। राजनेता ऐसे बयान देकर केवल भड़काते है।

– हिंदी वर्तमान में 44% लोग बोलते हैं। इसलिए सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा होने के कारण राष्ट्रभाषा बनने योग्य है।

– हिंदी को थोपने का तर्क देने वाले अंग्रेजी को स्वदेशी किस आधार पर बता रहे है। जबकि अंग्रेजी के उच्चारण मात्र सिखने में पूरा जीवन लग जाता हैं। अंग्रेजी जानने वाला व्यक्ति अपने आपको उच्च और क्षेत्रीय अथवा हिंदी बोलने वालों को नीचा समझता हैं। यह अंग्रेजी राज की गुलाम मानसिकता का प्रतीक हैं।

– हिंदी भाषा जानने वाले न केवल देश की हज़ारों बोलियां, क्षेत्रीय भाषा जैसे गुजराती, मराठी आदि सरलता से समझ सकते हैं। जिनका अंग्रेजी से कोई सम्बन्ध नहीं हैं।

– एक तमिल भाषी व्यक्ति जो हिंदी जानता हो देश के किसी भी भाग में भ्रमण करने जाये तो उसे मार्ग में कोई कठिनाई न होगी। अगर पुरे देश के मार्ग, रेल दिशा निर्देश आदि हिंदी में हो तो कितनी सुलभता होगी।

– एक ओर आप विश्व भ्रातृत्व की बात कर रहे है। दूसरी ओर भाषा भेद को लेकर आपस में संघर्ष कर रहे हैं। यह कैसी विचित्र मानसिकता है?

– देश की 130 करोड़ जनसंख्या को भाषा के नाम पर आपस में एक दूसरे के विरुद्ध कर कुछ मुट्ठी भर लोग केवल अपनी तुच्छ राजनीति करना चाहते हैं। ऐसे राजनीति करने वालों से सावधान।

-हिंदी जानने वाला व्यक्ति संस्कृत को समझने की योग्यता रखता हैं। हमारे धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में हैं। संस्कृत और हिंदी की लिपि एक ही देवनागरी हैं। हिंदी से परिचित व्यक्ति इन ग्रंथों को पढ़ने में सरलता अनुभव करेगा। अन्यथा वह इन ग्रंथों के विदेशियों द्वारा किये गए अधकचरे अनुवादों पर निर्भर होकर भ्रमित ही होगा। इसके दूरगामी परिणामों पर किसी ने विचार नहीं किया।

आइये देश को एकता के एक सूत्र में पिरोने के लिए हिंदी को सकल देश की राष्ट्रभाषा के रुप में स्वीकार करें।

(हिन्दी राष्ट्रभाषा लेखमाला भाग 1)

(लेखक राष्ट्रवादी व अध्यात्मिक विषयों पर लिखते हैं)

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