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वी.वी.रॉव व तहसीन पूनावाला ने भी इवीएम की जाँच की माँग की

नई दिल्ली। हालिया सम्पन्न चुनावों के बाद हार-जीत के साथ-साथ ई.वी.एम. से हुई छेड़छाड़ का मुद्दा लगातार तूल पकड़ रहा है और वाद-विवाद, अपील व सवालों के बीच चुनाव आयोग से इससे जुड़े तथ्यों व निष्पक्षता, ई.वी.एम. एवं वीवीपैट की सत्यता, जवाबदेही और पारदर्शिता का पुनः मूल्यांकन करने के उद्देश्य से सुप्रीमकोर्ट में याचिकाकर्ता वी.वी. रॉव और तहसीन पूनावाला ने आज राजधानी स्थित कॉन्स्टीट्यूश्नल क्लब में एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया।

मौके पर तहसीन पूनावाला व वी.वी. रॉव ने उपस्थित मीडिया-कर्मियों को सम्बोधित किया और उनके समक्ष ई.वी.एम. से जुड़े विभिन्न तथ्यों, मुद्दों, पहलुओं को रखा और अपील की कि चुनाव आयोग द्वारा इस सम्बन्ध में निष्पक्षता के आधार पर एक न्यायपूर्ण फैसला लेते हुए सभी के साथ न्याय करे। इस संदर्भ में वी.वी. रॉव ने चीफ इलेक्शन कमिशनर ऑफ इंडिया को लिखे पत्र से भी सभी को रूबरू कराया।

याचिकाकर्ता वी.वी.राव द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका (सिविल) क्र. 292 वर्ष 2009 में मुख्य चुनाव आयोग से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश एवं वैधानिक आवश्यकता को पूरा करने हेतु भारत सरकार द्वारा ई.वी.एम और वीवीपैट निर्माताओं को भुगतान करने हेतु हाल ही में जारी की गई राशि (लगभग 3256 करोड़ रूपये) का अन्तिम निर्धारण करने से पहले – मीडिया द्वारा जारी की गई मध्यप्रदेश के भिन्ड जिले एवं राजस्थान के धौलपुर आदि में उपयोग किए गए ई.वी.एम. में गड़बड़ी की सूचना कि ई.वी.एम. में डाले गये कुल वोटों की संख्या वीवीपैट प्रिन्ट से अलग पाई गई है जिसने भारत के चुनाव आयोग के सामने मतदाताओं का भारतीय चुनाव पर विश्वास स्थापित करने की एक नयी चुनौती रखी है – ई.वी.एम. एवं वीवीपैट की सत्यता, जवाबदेही और पारदर्शिता का पुनः मूल्यांकन करने की अपील की है।

माननीय न्यायालय ने रिट याचिका का समाधान इस विचार के साथ किया है कि याचिकाकर्ता इस मुद्दे को भारत के चुनाव आयोग के समक्ष रख सकता है। 2009 से याचिकाकर्ता ने, तकनीकी विशेषज्ञों और विभिन्न राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों के साथ भारत के चुनाव आयोग के साथ कई बार विचार विमर्श किया है। याचिकाकर्ता और भारत के चुनाव आयोग के मध्य पिछले 4 वर्षों के पत्राचार (लगभग 50 पत्र एवं सूचना के अधिकार के आदान प्रदान) से भारत के चुनाव आयोग द्वारा ई.वी.एम पर नजर रखने और उसे छेड़छाड़ मुक्त करने में आयोग की अक्षमता सम्बन्धी कई तथ्य सामने आए हैं।

याचिकाकर्ता एवं भारत के चुनाव आयोग के मध्य पत्राचार से प्राप्त तथ्यों ने इस बात पर जोर दिया है कि विचार विमर्श विस्तृत होना चाहिए जिसमें ई.वी.एम. के कार्य करने के सभी कानूनी, तकनीकी एवं प्रक्रियात्मक तत्वों पर ध्यान दिया गया हो। यह विचार विमर्श राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, सम्बन्धित नागरिकों के प्रतिनिधियों और इस क्षेत्र के विशेषज्ञों की उपस्थिति में होना चाहिए जो प्रश्नों के उत्तर दे सकें। याचिकाकर्ता ने इस बात पर जोर दिया है कि यह प्रयास लोकतन्त्र के विस्तृत हित में किया जाना चाहिए।

इस देश की मीडिया, राजनीतिक दलों और मतदाताओं इस बात के गवाह हैं कि याचिकाकर्ता के द्वारा दर्शायी गई चिन्ता से भारत के चुनाव आयोग सचेत हुआ है और उन कई नये तरीकों पर ध्यान दिया है जिससे ई.वी.एम में छेड़छाड़ की जा सकती है। इसमें सुरक्षा, प्रक्रियात्मक, तकनीकी, कानूनी और राजनीतिक चिन्ताएँ सम्मिलित हैं। तकनीकी विशेषज्ञों ने यह सिद्ध किया है कि ई.वी.एम. से छेड़छोड़ की जा सकती है।

श्री रॉव ने बताया कि इस बात का खुलासा होने के बाद कि वास्तविक ई.वी.एम. में गड़बड़ी की जा सकती है, 13 राजनीतिक दलों के अध्यक्ष एक साथ भारत के चुनाव आयोग से मिले एवं याचिकाकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए मतदाता सत्यापन पत्र के ऑडिट ट्रायल की आवश्यकता पर जोर दिया।

यद्यपि आरम्भ में भारत के चुनाव आयोग की ओर से प्रतिरोध (उपर्युक्त छेड़खानी किए जाने की संभावना और इसके समाधान के लिए मतदाता सत्यापन ऑडिट ट्रायल वीवीपैट को लागू करने) दर्शाया गया पर बाद में चुनावों की पारदर्शिता और जवाबदेही के हित में इसके महत्व को समझे और उन्होंने तकनीकी विशेषज्ञों की नई समिति का गठन किया। इनके मार्गदर्शन में भारत के चुनाव आयोग ने उपलब्ध ई.वी.एम. में ही वीवीपैट जोड़ना स्वीकार किया। सभी हितग्राहियों विशेषकर याचिकाकर्ता एवं सभी राजनीतिक दलों से विस्तृत विचारविमर्श के बाद भारत के चुनाव आयोग ने ई.वी.एम के उत्पादन के लिए उत्पादन, प्रमाणीकरण व जाँच, सत्यापन आदि के लिए नियम व दिशानिर्देश तय करने के बाद वीवीपैट की अनुमति दे दी।

तहसीन पूनावाला ने याचिका के हवाले से बताया कि जहाँ सन् 2013 व सन् 2017 के बीच ज्यादातर मतदान केन्द्रों में वीवीपैट आन्शिक रूप से उपलब्ध अथवा अनुपलब्ध थे, तो एक ही विचार बचता है कि कागज के मत पत्र का प्रयोग किया जाए। इसका कारण यह है कि केवल इसी विधि के द्वारा, जिसे जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों द्वारा मान्यता प्राप्त है, चुनावो को पारदर्शी तरीके से, मतदाताओं के अभिव्यक्ति के अधिकार को लागू करते हुए स्वतन्त्र एवं पक्षपात रहित तरीके से कराया जा सकता है, जो कि लोकतन्त्र का आधार है।

पूनावाला ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना है कि जब मतदाता अपना मत देता है तो वह संविधान की धारा 19(1)(अ) में स्थित अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रा के मूल अधिकार का प्रयोग करता है। इस कारण मतदाता द्वारा किया गया चुनाव पवित्र है और इसे चुनाव प्रक्रिया में प्रदर्शित होना चाहिए। यह प्रक्रिया मतदाता में यह विश्वास उत्पन्न करने वाली हो की उसका मत स्पष्ट रूप से उसके चुने हुए उम्मीदवार को ही गया है। जब मतदाता कागज के मतपत्र पर अपने चुने हुए उम्मीदवार के सामने चिन्ह लगाता है, तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के उसके मूल अधिकार और उसके चुने हुए उम्मीदवार के बीच कोई संदिग्धता नहीं होती। परन्तु ई.वी.एम. के बटन को दबाते समय मतदाता इस विश्वास का अनुभव नहीं करता। ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है जिससे वह इस प्रश्न का उत्तर पा सके कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के एक भाग के रूप में उसके द्वारा डाला गया मत निश्चित रूप से उसके चुने हुए उम्मीदवार को ही गया है। इस कारण ई.वी.एम. की प्रक्रिया को उतनी ही साफ और स्पष्ट होनी चाहिए जितनी मतपत्र की प्रक्रिया। अतः ई.वी.एम. की प्रक्रिया को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मत के रूप में मतदाता की अभिव्यक्ति उसके चुनाव के रूप में प्रकट हो। ‘‘इसे ई.वी.एम. द्वारा कैसे प्राप्त किया जा सकता है यह वाद-विवाद का विषय है।” ई.वी.एम. की प्रक्रिया यह दर्शाने में सक्षम होनी चाहिए कि मतदाता का चुनाव और प्रिन्ट किया गया स्लिप एक से हो।

वीवीपैट के साथ वर्तमान ई.वी.एम. में जब बटन दबाया जाता है तो मत अंकित हो जाता है। परन्तु मतदाता के पास ऐसा कोई साधन नहीं है कि वह यह जान सके कि मत उसके द्वारा चुने गये उम्मीदवार को ही गया है। यही वह “अस्पष्ट मत” है जो ई.वी.एम. में अंकित हुआ है और जिसकी गिनती कर उसके आधार पर चुनाव के परिणाम की घोषणा की जाती है। वह स्लिप जिस पर मतदाता का चुनाव अंकित है उसकी गिनती नहीं की जाती। यह अस्पष्टता वीवीपैट के साथ वाले ई.वी.एम में बनी हुई है जो मतदाता के विश्वास पर पूरी नहीं उतरती जो उसे कागज के मत पत्र के प्रयोग के समय मिलती थी। यदि इसे प्राप्त नहीं किया गया तो अस्पष्टता बनी रहेगी और इस प्रणाली से संविधान की धारा 19(1)(अ) के अन्तर्गत मतदाता की अभिव्यक्ति के मूल अधिकार की पूर्ण एवं पारदर्शी अभिव्यक्ति नहीं हो पाएगी।

वी.वी. रॉव का भारत के चुनाव आयोग (सबसे बड़ी स्वतन्त्र संवैधानिक संस्था जिसके पास स्वतन्त्र और पक्षपात रहित चुनाव करवाने के लिए आवश्यक निर्णय लेने का अधिकार है) से नम्र निवेदन है कि चुनाव प्रक्रिया में अस्पष्टता दूर करने के लिए मतदाताओं के मतों की सत्यापनीयता को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न हितग्राहियों से सुझाव लेने में खुलापन दर्शाये। वीवीपैट के लागू किए जाने के बाद भी ई.वी.एम. में डाले गए मतों की प्रामाणिकता अस्पष्ट है और अब चुनाव प्रक्रिया की सत्यापनीयता, पारदर्शिता और उसकी जवाबदेही को पुनः स्थापित करने की जिम्मेदारी भारत के चुनाव आयोग पर है।

श्री रॉव ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के हित में, हाल में हुए चुनाव में सामने आये मुद्दो के बाद वीवीपैट के साथ ई.वी.एम. की प्रामाणिकता की सत्यता के लिए उठाए गए कदमों, प्राप्त सुझावों और इस चुनौती का सामना करने के लिए प्रस्तावों से अवगत कराने की गुजारिश की है।

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