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चीन को मात देने को तैयार वाराणसी के काष्ठ कलाकार

केंद्र सरकार की पहल से वाराणसी के काष्ठ कला उद्योग को बल मिला है। विलुप्त होते जा रहे लकड़ी के खिलौने व सामान अब एक बार फिर स्टेशनों व बाजार में बिकते नजर आ रहे हैं। उद्योग को भौगोलिक पहचान (जीआई) का संरक्षण मिलने से काष्ठ कला कारोबार करीब 30 प्रतिशत बढ़ा है। साथ ही इंटरनेट से जुडऩे के कारण विदेश में भी इसकी मांग बढ़ी है। वाराणसी में काष्ठ कला अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। शहर के कश्मीरीगंज और खोजवां इलाके लकड़ी के खिलौने बनाने का प्रमुख केंद्र है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शिल्पियों को व्यक्तिगत रूप से और विभिन्न मंचों से प्रोत्साहित किए जाने से व्यवसाय में तेजी आई है। यहां के लकड़ी के खिलौने अमेरिका, जर्मनी और खाड़ी के देशों में खूब पसंद किए रहे हैं। लकड़ी से तैयार मूर्तियां भी खासी पसंद की जा रही हैं। गणेश, शिव, पंचमुखी गणेश, पंचमुखी हनुमान, विश्वकर्मा की आकर्षक मूर्तियां तैयार की जा रही हैं। शतरंज के मोहरे, गौतम बुद्ध की प्रतिमा की भी काफी मांग है।

वाराणसी का कश्मीरीगंज, खोजवां इलाके के कारीगर बेजान लकडिय़ों को तराश कर उसे ऐसे खूबसूरत स्वरूप दे रहे हैं,जिनके हुनर के कायल देशी ही नहीं, बल्कि विदेशी भी हुए है। अब इस कारोबार को नया जीवन मिला है और यह उद्योग फिर से रफ्तार पकडऩे को बेताब है। इस उद्योग के दशकों का उतार चढ़ाव देखने वाले बुजुर्ग कलाकार रामखेलावन सिंह अब बदलते उद्योग को नए कलेवर में देख रहे है। इनकी दूसरी पीढ़ी के रामेश्वर सिंह भी उद्योग की बदहाली के बाद बदलते बयार से काफी उत्साहित है।

रामेश्वर सिंह ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि प्रधानमंत्री मेले व प्रदर्शनी जैसे आयोजन में हस्तशिल्प उद्योग को काफी प्रोत्साहित करते रहते है। और उन्होंने विकास का रास्ता दिखाया है। रामेश्वर सिंह ने कहा कि अगर 500 से ज्यादा मशीनों वाला अत्याधुनिक प्रशिक्षण केंद्र बन जाए तो वाराणसी के खिलौने चीन को मात दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय फैशन डिजाइन व प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे अन्य संस्थानों में काष्ठ कला उद्योग को शामिल किया जाना चाहिए, जिससे वहां भी प्रशिक्षण दिया जाए। उन्होंने बताया एक शिल्पी प्रतिदिन लगभग 500 से 1,000 रुपये तक मेहनताना कमा लेता है।

उन्होंने कहा कि इंटरनेट सुविधा ने भी काष्ठ उद्योग को नया बाजार दिया है। बाजार के लिए तरस रहे बनारस के खिलौने अब इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर में पहुंच रहे हैं। खरीदार से लेकर थोक कारोबारी इंटरनेट के माध्यम से काष्ठ कारीगरों से जुड़ चुके हैं।

साभार-बिज़नेस स्टैंडर्ड से



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