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वैदिक अग्निहोत्र क्रिया

वैदिक अग्निहोत्र की नवम् क्रिया के अंतर्गत अग्नि प्रजव्लित हो चुकी है| यह अग्नि निरंतर ठीक से जलती रहे, इसका प्रयास हम समिदाधानम् के माध्यम से करते हैं| यज्ञ की अग्नि प्रचंड होनी चाहिए| यदि अग्नि धीमी है तो यह यज्ञ उतना कार्य उत्तम परयावर्ण बनाने के लिए नहीं कर पावेगा, जितनी हम आशा लगाए हुए हैं, तो भी यह कुछ तो कार्य करेगा ही किन्तु जब हमने यज्ञ के लिए सब उत्तम वस्तुओं का प्रयोग किया है, विज्ञान के आधार पर जो समिधाएँ यज्ञ में डालनी चाहियें, वह प्रयोग कर रहे हैं, जो सर्वोत्तम देसी गाय का घी यज्ञ के लिए सब से उत्तम होता है, उसका भी हम प्रयोग कर रहे हैं, ॠतुनुसार जिस आहूत होने वाली सामग्री की आवश्यकता होती है, उसका भी हम प्रयोग कर रहे हैं| इस सामग्री में पौष्टिक पदार्थ यथा बादाम, किशमिश, काजू, अखरोट,पिस्ता आदि, रोगनाशक पदार्थ यथा अगर तगर गुग्गल,लौंग, इलायची, दालचीनी आदि तथा सुगन्धित पदार्थ यथा गुलाब के फूल,चन्दन आदि मिलाकर सामग्री बनाई गई है| इन सब का सदुपयोग तब ही होगा, पूर्ण लाभ तब ही मिलेगा जब यज्ञ की अग्नि प्रचंड होगी| धीमी आंच पर लाभ भी धीमा ही मिलेगा| इसलिए यज्ञ की अग्नी को तीव्र करने के लिए हम घी से सनी हुई तीन समिधाओं को हम चार मन्त्रों के गायन के साथ यज्ञ कुंड में रखते हैं| इन समिधाओं का आकार यज्ञ कुण्ड के आकार के अनुसार छोटा या बड़ा हो सकता है| साधारण रूप में यह समिधाएँ लगभग आठ अंगुल की लम्बाई में होती हैं|


प्रथम समिधा के लिए मन्त्र

 ओम् अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्धवर्धय
चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय, स्वाहा| इदमग्नये
जातवेदसे, इदन्न मम||१|| आस्वलायन गृह्य. १.१०.१२
यह मन्त्र आश्वलायन गृह्यसूत्र में से लिया गया है| इस में श्ब्दानुसार अर्थ इस प्रकार है:-
जातवेद: अयं इध्म: ते आत्मा

हे सब ऐश्वर्यों के स्वामी प्रभो! यह काष्ठ तेरा आत्मा है| यहाँ काष्ठ से अभिप्राय: लकड़ी की समिधा से है| यहाँ हम यज्ञ की अग्नि को तीव्र करने के लिए कार्य कर रहे हैं और यह तीव्रता घी से सनी हुई लकड़ी ही दे सकती है| इस कारण यह लकड़ी इस यज्ञ स्वरूप प्रभु की आत्मा कही गई है| यह काष्ठ ही तेरा(यज्ञ का) जीवन भी है| अग्नि का अस्तित्व लकड़ी के बिना संभव ही नहीं होता इसलिए यहाँ इस यज्ञ में डाली जाने वाली समिधा को अग्नि स्वरूप प्रभू का जीवन कहा गया है|

तेन इध्यस्व च वर्धस्व
इस प्रकार अग्नि स्वरूप परमात्मा को यहाँ सम्बोधित करते हुए कहा गया है कि यह जो लकड़ी की समिधा घी से पूरी तरह से लिपटी हुई है, आप इस समिधा के द्वारा प्रकाशित हों अर्थात् यह समिधा यज्ञ की इस अग्नी को तीव्रता दे|

इत्-ह अस्मान् च वर्धय
अग्नि का काम है, इस के अन्दर जो भी डाला जावे, उसके गुणों को बढ़ा कर लौटा देवे अर्थात् इन गुणों को वायुमंडल में, परयावरण में फैला देवे ताकि इनका लाभ जन सामान्य अथवा प्राणी मात्र को बिना कसी प्रकार का भेदभाव किये मिल सके| इस कारण यहाँ कहा गया है कि हे अग्नि देव! यज्ञ में डाली इस समिधा के द्वारा न केवल आप ही प्रचंड होकर बढ़ें अपितु हमें भी आगे बढ़ने के लिए अपने साथ ले चलें अथवा हमें मार्ग दिखावें|

प्रजया पशुभि: ब्रह्मवर्चसेन अन्नाद्येन सम-एधय
इस के साथ ही हम अग्निदेव से एक याचना इस आहुति के माध्यम से और भी करते हैं, वह यह कि प्रजा अर्थात् इस जगत् में तेरी प्रजा स्वरूप जितनी भी जीवात्माएं हैं| इन जीवात्माओं में चाहे कोई मनुष्य है, पशु है या अन्य किसी प्रकार का कोई भी प्राणी है, इन सब के अन्दर ज्ञान का तेज भर दो| भाव यह है कि इस यज्ञ को करने से सब प्राणियों की बुद्धि तीव्र हो| केवल बुद्धि ही तीव्र न हो अपितु हे अग्निदेव! इन सब प्राणियों का हाजमा भी अच्छा हो| यदि हाजमा अच्छा रहे गा तो ही यह जो कुछ भी उपभोग करेंगे, चाहे वह क्षुधा को शांत करने के लिए हो अथवा बौद्धिक हो, को पचा पाने में और समझ पाने में सक्षम हो सकेंगे| इस प्रकार प्रकांड पंडित बनकर तथा प्राप्त किये हुए को पचा पाने में अथवा सम्भाल पाने में सक्षम हो सकें|

स्वाहा इदं जातिवेदसे अग्नये मम न
हे अग्नि देव! हम अपने मन, वचन और कर्म से यह ठीक ही कह रहे हैं कि यह जो काष्ठ रूप समिधा को आप के समर्पण कर रहे हैं, यह वास्तव में ही सब प्रकार के धनों के स्वामी अग्निदेव के लिए ही समर्पित है| इस पर मेरा कुछ भी, किसी प्रकार का भी अधिकार नहीं है|

इस सब से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि अग्नि वास्तव में सब प्रकार के ऐश्वर्यों का मुख होता है किन्तु हमारा यह यज्ञ करने वाला साधक तो परम अग्नि को प्राप्त करने की चाहना रखता हुआ वह परमात्मा का ध्यान करते हुए आत्म चिन्तन कर रहा है| उसके इस आत्म चिन्तन का आधार इस काष्ठ से प्रचंड रूप से जलने वाली यह आग ही तो है| इस के उल्ट वह परमात्मा रूप अग्नि, जिसे हम परम अग्नि के नाम से जानते है, वह अग्नि तो इस संसार के कण कण में, अनु अनु में, पत्ते पत्ते में व्याप्त है| इन सबका आधार वह अग्नि बनी हुई है| शुद्ध जीवन जिसे आर्य जीवन के नाम से जाना गया है, यह तो केवल सांसारिक ही नहीं पारलौकिक ऐश्वर्यों को पाने की ही सदा कामना करता रहता है| साधक ने समय समय पर जितनी साधना की होती है उसके अनुसार उसकी रुचियों में भी परिवर्तन होता रहता है| जिस प्रकार स्कूल में पढ़ने वाले बालक की योग्यता के अनुसार कक्षाएं बदलती रहती हैं तो इनके साथ ही उसकी सोच भी बदलती है, यह अवस्था ही साधक और उसकी की जा रही साधना की भी होती है, तो भी साधारण अवस्था में प्रत्येक मनुष्य की सदा यह इच्छा तो कम से कम होनी ही चाहिए कि उसका शरीर स्वस्थ तथा उन्नत हो, उसका ज्ञान निरंतर बढ़ता रहे, उसको सब ओर से यश की प्राप्ति हो तथा सदा ही सब का उपकार करता रहे| यह भावनाएं आहुति देते समय आत्मसमर्पण के भाव से की जाती है| यह आहुतियाँ स्वर्ग प्राप्ति का साधन स्वरूप समझते हुए देनी चाहिए।

व्याख्यान
यह जगत् परमपिता परमात्मा की रचना है| उसकी रची हुई इस रचना में जितने भी छोटे अथवा बड़े प्राणी हैं, सब कुछ न कुछ देने वाले होने के कारण देवता स्वरूप ही माने जाते हैं और इस धारणा के अनुसार सब देवता अपने अपने ढंग से यह अग्निहोत्र तथा यज्ञ कर रहे हैं| जब विश्व के सब प्राणी यज्ञ की आहुतियाँ डाल रहे हैं तो क्या कारण है कि मैं यह आहुतियाँ देते हुए इसे अपना मानते हुए तुच्छ क्यों बनूँ? इस तुच्छता की भावना से ऊपर उठ कर क्यों न इन देवताओं के यज्ञ करने वाली इस मंडली के ही साथ मिला जाऊं? इस अग्निहोत्र को अपनी तुच्छ आहुति भेंट करते हुए मेरी यह अवस्था हो कि मैं एक हाथ से जो भी आहुति डालूं, उसका मेरे दूसरे हाथ तक को भी पता न चल पावे| हे पिता! मेरे अन्दर त्याग का यह भाव पैदा करो|

डॉ.अशोक आर्य
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