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विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के साथ भारत को गौरवान्वित करने वाले वीरचंद गाँधी

११ सितंबर १८९३ से शिकागो—अमेरिका में विश्वधर्म सम्मेलन प्रारंभ हुआ जो १७ दिन चला। सर्व धर्म परिषद शिकागो में विश्वविख्यात जैनाचार्य श्रीमद् विजयानंद सूरि प्रसिद्ध नाम आत्मारामजी को जैन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया और उन्हें अपनी में मानद सदस्य का स्थान दिया । साधु जीवन की मर्यादा के अनुसार श्री आत्मारामजी म.सा. का जाना संभव नहीं था तो परिषद् के अत्यधिक आग्रह पर आचार्य विजयानन्दसूरिजी (आत्मारामजी महाराज) ने 6 महीने का प्रशिक्षण देकर वीरचन्द गाँधी को को इस धर्म संसद में अपना प्रतिनिधि बनाकर अपनी रचना — ‘ शिकागो प्रश्नोत्तर’ के साथ सम्मेलन में भाग लेने भेजा था।

वीरचंद गाँधी अपने साथ एक रसोईया भी लेकर गए थे क्योंकि विदेश में शाकाहार भोजन मिलना मुश्किल था l पगड़ी बांधे जोधपुरी स्टाइल का सूट पहने वीरचंद गाँधी जब अमेरिका पहुंचे तब वे मात्र 29 वर्ष के थेl वीरचन्द गाँधी ने जैन दर्शन और अन्य भारतीय दर्शनों का अध्ययन किया।

विश्व धर्म संसद में श्री वीरचंद जी गाँधी ने जैन धर्म के सिद्धांतो को प्रभावशाली ढंग से विश्व के सामने रखा। वीरचंद गाँधी ने पहले ही दिन पूज्य गुरूदेव का उल्लेख करते हुए जो विद्वत्तापूर्ण प्रवचन दिया उससे उपस्थित विद्वानों में उसकी धूम मच गयी। वहाँ के सभी समाचार पत्रों में आपके फोटों व प्रवचनों की चर्चा होने लगी। उनकी सभाओं में उस समय दस हजार की उपस्थिति होती थी। वीरचंद गाँधी के पहले विदेशी लोग जैन धर्म को बौध्द धर्म की शाखा समझते थे l जैन दर्शन पर उनके शोधपूर्ण रोचक व सारगर्भित व्याख्यानों के बाद अमरीकी और विदेशी लोग जैन धर्म व जैन ध्रर्म के सिद्धांतो की और आकर्षित हुए व वीरचंद गाँधी को कुछ साल अमेरिका में रहने का निवेदन किया। वीरचंद गाँधी ने अमेरिका व यूरोप में कुल 535 व्याख्यान दिए व कई मेडल जीते l वीरचंद गाँधी और स्वामी विवेकानंद अच्छे मित्र थेl

उन्हें और व्याख्यान देने के लिए अमेरिका में ठहरने का निवेदन किया गया। वे कुछ वर्षों तक अमेरिका में रहे और जैन धर्म, भारत और भारतीय संस्कृति पर अनेक व्याख्यान दिये। जैन धर्म, दर्शन, इतिहास तथा भारतीय संस्कृति के बारे में व्याप्त अनेक भ्रान्तियों का उन्होंने निराकरण किया। अमेरिका में वीरचन्द ने प्राच्यविद्या और जैनविद्या को समर्पित दो संस्थाएँ स्थापित कीं। अमेरिका के अलावा यूरोपीय देशों में भी उन्होंने व्याख्यान दिये। कहते हैं कि उन्होंने कुल 535 व्याख्यान दिये। उन्हें स्वर्ण पदक, रजत पदक और अन्य अनेक सम्मान प्राप्त हुए। शिकागो में आज भी वीरचन्द की प्रतिमा लगी हुई है।

जिस प्रकार विवेकानन्द से भगिनी निवेदिता प्रभावित हुई, उसी प्रकार वीरचन्द से श्रीमती होवार्ड प्रभावित हुई। वीरचन्द से प्रेरित होकर होवार्ड ने पूर्ण शाकाहार और जैन जीवनशैली अपना ली। शिकागो में वीरचन्द गाँधी ने भारतीय महिलाओं की शिक्षा के लिए जो संस्था बनाई, उसकी सचिव श्रीमती होवार्ड बनी। इस संस्था के माध्यम से अनेक भारतीय महिलाओं को अमेरिका में उच्च शिक्षा के अवसर मिले। इससे वीरचन्द का शिक्षा और नारी शिक्षा के प्रति लगाव व्यक्त होता है। वीरचन्द के व्यक्तित्व और व्याख्यानों से प्रभावित होकर अनेक विदेशियों ने सदा-सदा के लिए पूर्ण शाकाहार अपना लिया था।

वीरचन्द गाँधी को मानवसेवा, जीवदया और संस्कृति की रक्षा में बहुत रुचि थी। जब 1896-97 में भारत में भयंकर अकाल पड़ा तो वीरचन्द ने लोगों से सहयोग प्राप्त करके अमेरिका से चालीस हजार रुपये और एक जहाज भरकर अनाज भिजवाया। जब उन्हें पता चला कि सम्मेद शिखर में सुअर मारने का कत्लखाना खोला गया है तो वीरचन्द ने लोगों के सहयोग से कत्लखाना बन्द करवाया। जब भाषा की अड़चन आई तो उन्होंने कलकत्ता जाकर बंगाली भाषा सीखी। पालीताना जैन तीर्थ पर तीर्थयात्रियों से व्यक्तिगत कर-वसूला जाता था। वीरचन्द ने बहुत संघर्ष करके वह व्यक्तिगत तीर्थयात्रा कर (टैक्स) बन्द करवाया। 1890 में जब उनके पिता राघवजी का देहान्त हुआ तो वीरचन्द ने विलाप करने तथा छाती पीटकर रोने की प्रथा का विरोध किया।

बहुआयामी प्रतिभा के धनी वीरचन्द का कहना था कि सिर्फ प्राकृत और संस्कृत भाषा का ज्ञान हो जाने मात्र से धर्म, दर्शन और संस्कृति को समग्र रूप में नहीं समझा जा सकता है। इतिहास, परम्परा और अन्य बातों का ज्ञान भी आवश्यक है।

अक्टूबर-1893 में शिकागो में उन्होंने विश्व अचल संपत्ति सम्मेलन में भी भाग लिया और भारत में अचल सम्पत्ति कानून विषय पर प्रभावी व्याख्यान दिया। इसी प्रकार अक्टूबर-1899 में अमेरिका में हुए तीसरे अन्तर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक सम्मेलन में भाग लेने वाले वे अकेले भारतीय थे। वहाँ उन्होंने ‘अमेरिका और भारत के व्यापारिक सम्बन्ध’ विषय पर व्याख्यान दिया और छाप छोड़ी। देशभक्त वीरचन्द के मन में भारत को पूर्ण स्वतंत्र देखने की गहरी भावना थी। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से भी जुड़े।

25 अगस्त 1864 में गुजरात के भावनगर जिले के महुवा में जन्मे श्री वीरचन्द बचपन से ही मेधावी थे। उनके पिता जी राघवजी तेजपालजी गाँधी, महुवा नगर के प्रतिष्ठित नगरसेठ थे व उनका हीरे मोती व जवाहरात का व्यापार था। १८७९ में वीरचंद जी का जीवी बेन से विवाह हुआ। वीरचंद गाँधी ने मैट्रिक की परीक्षा में सम्पूर्ण राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त बीए (आनर्स) मुम्बई के एल्फिंस्टन कॉलेज से किया। तब तक वे १४ भाषाओं के ज्ञाता व सर्व धर्म ग्रंथो के विद्वान् बन चुके थे। वे लंदन में कानून की सर्वोच्च डिग्री बार—एट—ला पास करके बैरिस्टर बने। २१ वर्ष की आयु में वे भारत के जैन संघ के सचिव नियुक्त किये गए। पलिताना दर्शन के लिए वहां के ठाकुर (राजा ) को प्रति व्यक्ति को जो कर देना पड़ता था उसे अपनी जान पर खेलकर व अंग्रेजो से मिलकर वीरचंद गाँधी ने इस कर को रद्द कराया। इसी तरह कोलकाता जाकर बंगाली सीख कर उन्होंने कोर्ट में अपने द्वारा दस्तावेज देकर सम्मेद शिखरजी के प्रांगण में एक अंग्रेज व्यापारी द्वारा बनाए गए सूअर के कत्ल खाने को बंद कराया।

महात्मा गांधी खुद वीरचंद गाँधी से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने वीरचन्द को आपना भाई स्वरूप मित्र माना। गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में भी वीरचन्द का गौरवपूर्ण उल्लेख किया। वीरचन्द स्वामी विवेकानन्द के भी मित्र थे। जूनागढ़ के दीवान हरिदास देसाई को विवेकानन्द ने अमेरिका से एक पत्र में लिखा था – ‘‘अब यहाँ वीरचन्द गांधी है। एक जैन जिसे आप बाँबे से जानते हैं। वे इस भयंकर ठण्डी में भी शाकाहारी भाजी और तरकारी के सिवाय कुछ नहीं खाते हैं। इनके नख व दाँत हमेशा देश व धर्म की सुरक्षा के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

आपने दो वर्षों तक अमेरिका में ५३५ मधुर भाषणों के द्वारा जैन धर्म—तत्व—दर्शन ज्ञान की अमृत वर्षा की। भारत की संस्कृति की पूर्ण सुरक्षा करने वाले इस महापुरुष ने बंगाल में दुर्भिक्ष से पीड़ित स्वदेश वासियों के लिए एक समुद्री जहाज अन्न से भरकर तथा ४० हजार रूपये नकद सरकार को भिजवाए। आपके सम्मान में अमेरिका में गांधी फिलोसोफीकल सोसायटी की स्थापना हुई। सन् १८९५ में आप इंग्लैण्ड, फ्रांस व जर्मनी आदि देशों में जिनशासन की विजय पताका फहराते हुए भारत पधारे और पू. गुरूदेव श्री आत्मारामजी म.सा. के पावन चरणों में अंबाला में उपस्थित होकर गौरव गाथाएँ सुनायी और गुरूदेव का आशीर्वाद प्राप्त किया। सन् १८९५ में बंबई में सेठ प्रेमचंद की अध्यक्षता में हजारों श्रद्धालुओं ने आपका नागरिक अभिनंदन किया। सन् १८९८ में जस्टिस महादेव रानाडे की अध्यक्षता में आपका विशेष अभिनन्दन किया गया।

गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी) ने वीरचन्द राघवजी के सम्बन्ध में बोलते हुए कहा था कि वीरचन्द राघवजी बड़े विद्वान थे। उन्होंने कई वर्षों तक अमेरिका में रहकर भारतीय संस्कृति का प्रचार किया। इतिहास के ऐसे पन्नों के उजागर होने से प्रेरणा मिलती है। श्री मोदी ने इसे दुःखद संयोग बताया कि स्वामी विवेकानन्द का मात्र 39 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया तो वीरचन्द राघवजी का मात्र 37 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया।

7 अगस्त 1901 को दिवंगत होने से पूर्व अपने अल्प जीवनकाल में भी वीरचन्द राघवजी गांधी ने जैन धर्म, भारतीय समाज और संस्कृति के लिए अद्भुत प्रेरक कार्य किये। देश के इस महान सपूत के सम्मान में 8 नवम्बर 2009 को भारत सरकार ने पाँच रुपये मूल्यवर्ग का बहुरंगी डाक टिकट जारी किया।

स्वामी विवेकानंद ने श्री वीरंचद गांधी को अपना परम सहयोगी व मित्र माना। स्वामी विवेकानन्द ने जूनागढ़ के दीवान को जो पत्र लिखा वह इस प्रकार है—‘‘ यह गांधी व्यक्ति कठोर शीतल जल—वायु में भी शाक—सब्जी छोड़कर कुछ दूसरा ग्रहण नहीं करता, अपने धर्म और राष्ट्र की रक्षा में इसका रोम—रोम समर्पित है। अमेरिका के लोग भी इसे बहुत प्यार करते हैं लेकिन जिन्होंने इन्हें यहाँ भेजा वो उन्हें जाति बहिष्कृत करते हैं तो बहुत बड़ा पाप करते हैं। ७ अगस्त, १९०१ को बंबई में आपका मात्र ३७ वर्ष की अल्पायु में निधन हो गया, इस हृदय विदारक समाचार पर सारा अमेरिका व जैन समाज रो उठा। देश में स्थान—स्थान पर शोक सभाएं हुई व बंबई में तो ५ दिनों तक कारोबार बन्द रख कर शोक प्रकट किया गया।



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