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विदुषी माता मैत्रेयी

भारत ऋषियों की पुण्य भूमि है । इस भूमि पर अनेक प्रकार की विद्याओं से सम्पन्न ऋषियों ने जन्म लिया । एसे ही ऋषियों में याज्ञवल्क्य एक हुए हैं जो अत्यन्त प्रतिभाशाली ऋषि थे । कात्यायनी तथा मैत्रेयी नाम से इन की दो पत्नियां थीं । दोनों पत्नियां यज्ञवल्क्य के दो भिन्न – भिन्न कार्य सम्भालती थीं । कात्यायनी घर का सब कार्यभार बडी कुशलता से सम्भालती थी जब कि मैत्रेयी उनके पठन – पाठन तथा अध्ययन सम्बन्धी सब कार्य की व्यवस्था में उनका हाथ बंटाती थी । इस प्रकार इन दोनों

में एक गृहस्थ का कार्य करती थी तो दूसरी सरस्वती के प्रसार के कार्य में लगी थी । दोनों उचित रीति से एक दूसरे का सहयोग कर रहीं थीं । इस कारण इस ऋषि की गृहस्थी बडे सुन्दर ढंग से चलते हुए संसार के सामने अपने आदर्श का एक उदाहरण प्रस्तुत कर रही थी । दोनों पत्नियों के बेजोड मेल के कारण इस परिवार में आनन्द व सुख की वर्षा हो रही थी ।

यह दोनों महिलाएं अपने पति की निरन्तर सेवा में तत्पर थीं तथा पति को प्राणों से भी अधिक मानती थीं । यह आपस में भी एक – दूसरी की सहायता में कभी पीछे न हटती थीं । किसी दिन कात्यायनी रसोई कार्य के लिए उपयुक्त न होती तो इस कार्य को मैत्रेयी सम्भाल लेती थी । इस प्रकार हुए परिवर्तन को ऋषि भी तत्काल जान लेते थे तथा कह उठते थे कि आज भोजन का रस कुछ अलग है । कात्यायनी क्या बात है आज भोजन तुम्हारे हाथ का नहीं है । परिणाम – स्वरुप कात्यायनी को अपनी सफ़ायी देनी पडती ।

मैत्रेयी ऋषि के चिन्तन कार्य में निरन्तर सहायता करती रहती । यज्ञवल्क्य के विचारों के प्रतिपादन में मैत्रेयी आधा भाग थी अर्थात् यज्ञवल्क्य का चिन्तन कार्य तब तक पूर्ण नहीं हो पाता था जब तक कि वह इस विषय में मैत्रेयी के विचार जान कर तद्नुरूप अपने विचारों में सुधार न कर लेते । यह ही कारण था कि जब तक वह मैत्रेयी से शास्त्र चर्चा न कर लेते तब तक उन्हें सुख अनुभव नहीं होता था । वह दिन भर मैत्रेयी से शास्त्र चर्चा करते रहते । जब भी कभी मैत्रेयी व यज्ञवल्क्य शास्त्र चर्चा में लीन होते तो कात्यायनी निकट बैठकर दोनों की चर्चा को बडे ध्यान से सुना करती थी । इस प्रकार की चर्चा करते हुए वह दोनों कात्यायनी को बडे ही अच्छे लगते थे । इस प्रकार दोनों ऋषि पत्नियों के आपसी सहयोग के परिणाम स्वरुप यज्ञवल्क्य की गृहस्थी बडे ही उत्तम ढंग
से चल रही थी ।

जीवन की सांध्यवेला में ऋषि याज्ञवल्क्य की संन्यास आश्रम में जाने की इच्छा हुई । इस पर विचार – विमर्श के लिए उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों, कात्यायनी तथा मैत्रेयी को अपने पास बुला कर बडे आदर के साथ अपने मन की इच्छा दोनों के सामने रखी । इससे पूर्व ही वह दोनों के मन को तैयार कर चुके थे । दोनों जानती थीं कि उनके पति किसी भी समय संन्यास ले सकते हैं । तिस पर भी इस समय को आया जान कर दोनों का हृदय द्रवित सा हो उठा तथा इस भावुकता के कारण दोनों की आंखें नम हो गईं ।

याज्ञवल्क्य ने कात्यायनी को सम्बोधित किया । किसी गहरी सोच में निमग्न ऋषि कात्यायनी की मनोदशा को न भांप सके । कात्यायनी ने झटपट अपने आप को सम्भाला तथा तत्काल स्वस्थ हो प्रत्युत्तर में बोली ‘ कहिये स्वामी जी ‍! याज्ञवल्क्य बोले‘ मैं जानता हूं कि तुम दोनों सख्यभाव से रहने वाली हो , किन्तु मेरी इच्छा है कि इस घर को तथा इस के अन्दर पडी सब छोटी बडी सामग्री को संन्यास से पूर्व दो भागों में बांट कर तुम दोनों को दे दूं ताकि मेरे संन्यास लेने के बाद कहीं यह चर्चा न हो कि मेरी पत्नियों में घर की सम्पत्ति को लेकर विवाद उठ खडा हुआ है । तुम्हें इसमें कोई आपत्ति तो नहीं है ।‘ कात्यायनी ने तत्काल उत्तर दिया कि मुझे कैसी आपत्ति । आप जो भी करेंगे मुझे स्वीकार होगा ।

तत्पश्चात् यज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से भी यही प्रश्न किया । इस पर मैत्रेयी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि हां ! , इस पर मुझे कुछ आपत्ति है , कुछ शंका है । मैत्रेयी का उत्तर सुनकर ऋषि को अपने ही कानों पर विश्वास न हो रहा था । वह चकित थे कि जिस मैत्रेयी से उन्होंने इतनी आशाएं बांध रखी थी , उस मैत्रेयी को ही उसके इस निर्णय पर आपत्ति है । इस का क्या कारण हो सकता है ?

मैत्रेयी के उत्तर से अभी ऋषि किसी निर्णय पर पहुंचते इससे पूर्व ही मैत्रेयी ने अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा ‘ भगवन् ! मुझे आप कुछ स्पष्टीकरण देंगे तब ही मैं अपना विचार दे सकूंगी । इस पर यज्ञवल्क्य ने उसे अपनी शंका नि:संकोच स्पष्ट करने के लिए कहा ।

मैत्रेयी ने कहा की ‘मैं जानना चाहती हूं कि आप किस लक्ष्य के आधार पर इस धन सम्पत्ति का परित्याग करना चाहते हैं ? यज्ञवल्क्य बोले भगवते ! मैंने अमर पद की प्राप्ति के लिए घर छोडने का निर्णय लिया है । मैत्रेयी ने फ़िर पूछा कि क्या यह धन सम्पत्ति आप को अमर पद नहीं दिला सकती ? ऋषि ने उतर दिया , नहीं ! यह धन सम्पत्ति अमरत्व तक नहीं ले जा सकती ।‘

इस उत्तर को सुनकर मैत्रेयी ने फ़िर से प्रश्न किया – और आप मुझे धन – धान्य से पूर्ण यह सारी पृथ्वी भी दे जाएं तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूं ? इस उत्तम प्रश्न को सुनकर यज्ञवल्क्य ने कहा ,‘ तुम्हारा प्रश्न बहुत अच्छा है । सच्चाई तो यह है कि लालसा में फ़ंसे व्यक्ति की जैसी स्थिति होती है , ठीक वैसी ही तुम्हारी स्थिति होगी, उससे अच्छी नहीं ।”

मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से अपने दूसरे प्रश्न का उतर सुनकर फ़िर कहा , ‘जिससे मेरा मरना न छूटे , उस वस्तु को लेकर क्या करुंगी ? हे भगवान् ! आप जो जानते हैं ( जिस परम धन के सामने आपको यह घर बार तुच्छ प्रतीत होता है और बडी प्रसन्नता से आप सब का त्याग कर रहे हैं ) वही परम धन मुझको बतलाईये ।‘

मैत्रेयी की इस इच्छा को पूर्ण करते हुए यज्ञवल्क्य ने उतर दिया , ‘मैत्रेयी ! पहले भी तूं मुझे बडी प्यारी थी , तेरे इन वाक्यों से वह प्रेम और भी बढ गया है । तूं मेरे पास आ कर बैठ , मै तुझे अमृत्व का उपदेश करुंगा । मेरी बातों को भली – भान्ति सुनकर मनन कर |” इतना कह कर महर्षि यज्ञवल्क्य ने प्रियतम रुप से आत्मा का वर्णन आरम्भ किया ।

उन्होंने कहा , ‘ मैत्रेयी ! (स्त्री को ) पति , पति के प्रयोजन के लिए प्रिय नहीं होता , परन्तु आत्मा के प्रयोजन के लिए पति प्रिय होता है ।‘इसके अतिरिक्त भी यज्ञवल्क्य ने उसके लिए बहुत सा उपदेश किया । इस उपदेश को सुनकर मैत्रेयी उनकी कृतज्ञ हुई । फ़िर क्या था ? यज्ञवल्क्य ने अपनी पूरी की पूरी सम्पत्ति कात्यायनी को दे दी तथा स्वयं सांसारिक सुखों को , सांसारिक मोह माया को छोडकर वन की और प्रस्थान कर गये ।

ज्यों ही यज्ञवल्क्य वन को जाने लगे तो मैत्रेयी भी उनके पीछे हो ली । उस ने भी सांसारिक सुखों को त्याग कर वन को ही अपना निवास बनाने का निश्चय किया । वह भी अब वनों में रहते हुए प्रभु प्रार्थना में आगामी जीवन बिताने का निर्णय ले चुकी थी । इस प्रकार जिस ने भी मैत्रेयी को अपने पति का अनुगमन करते देखा उस के विरह की व्याकुलता के साथ ही साथ उसका हृदय एक विचित्र प्रकार के आनन्द से भर उठा ।

डा.अशोक आर्य
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