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कश्मीर में हिंसा और वार्ता नहीं चल सकते एक साथ

बड़ा सवाल है कि क्या हिंसा और बातचीत साथ-साथ चल सकती है? कश्मीर में पत्थरबाज़ उपद्रवियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल प्रतिबंधित नहीं करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का जवाब दे दिया है कि हिंसा और वार्ता एक साथ नहीं हो सकते। जम्मू कश्मीर बार एसोसिएशन की पैलेट गन के ख़िलाफ़ अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि घाटी के लोग पत्थरबाज़ी बंद कर दें, तो सरकार को पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं करने का आदेश दिया जा सकता है। इससे पहले जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट भी पैलेट गन पर पाबंदी लगाने से इनकार कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फ़ैसले को ही चुनौती दी गई थी।

जानने लायक बात यह है कि जम्मू कश्मीर बार एसोसिएशन ने घाटी के युवाओं से कभी ऐसी अपील नहीं की, कि वे पत्थरबाज़ी नहीं करें। एक और दिलचस्प बात यह है कि अलगाववादियों के समर्थक ज़्यादातर कश्मीरी मीडिया में जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट को अक्सर कश्मीर हाईकोर्ट ही लिखा जाता है। कश्मीर को छोड़कर बाक़ी जम्मू कश्मीर राज्य की वकील बिरादरी के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर बार एसोसिएशन को अलगाववादियों की क़ानूनी आवाज़ के तौर पर ही लेती है। सुरक्षा बलों का कार्रवाई, केंद्र और राज्य सरकार के क़दमों का जिस तरह ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता रोज़ाना विरोध करते हैं, उसी तर्ज़ पर जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन भी बाक़ायदा रोज़ ही मीडिया को बयान जारी करती है और उन बयानों को तवज्जो भी मिलती है। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि भारत के शेष राज्यों की हाईकोर्टों के वकीलों के संगठन केवल अपने हितों से जुड़े बयान ही कभी-कभार जारी करते हैं, लेकिन जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के साथ ऐसा नहीं है। वह अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए सियासी मुद्दों पर लगातार बयानबाज़ी करती है।

जम्मू और लेह-लद्दाख में रहने वाले वकीलों की अपनी अलग बार एसोसिएशन है, जिसका कश्मीर की बार एसोसिएशनों से कोई लेना-देना नहीं है। भारत के अटॉर्नी जनरल बार एसोसिएशन के रुख़ को अलगाववादियों के पक्ष में होने की बात सुप्रीम कोर्ट में कही भी है। उनके मुताबिक़ बार एसोसिएशन के हलफ़नामे में जम्मू कश्मीर के भारत में विलय को ‘विवादास्पद’ कहा गया है। बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन से कहा है कि वह सभी स्टेकहोल्डरों से बातचीत कर घाटी में हिंसा रोकने का रोडमैप बताए।

आम भारतीय को लगता है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का घाटी पर काफ़ी असर है, लेकिन हक़ीक़त में ऐसा है नहीं। आम भारतीय के सामने जब कश्मीर समस्या की बात आती है, तो उसके ज़ेहन में घाटी में सियासी दल, अलगाववादी, आतंकवादी और सुरक्षा बलों की ही तस्वीर उभरती है। लेकिन जब हम सभी स्टेकहोल्डरों की बात करते हैं, तब पता चलता है कि केवल इतने पक्ष नहीं, बल्कि बहुत से पक्ष हैं, जिनकी बात मुख्यधारा के मीडिया में नहीं की जाती। ये पक्ष वे हैं, जो कश्मीर घाटी की ज़िंदगी को धड़काते हैं। मसलन वहां के स्कूलों की एसोसिएशन, व्यापार मंडल, पर्यटन व्यवसाय से जुड़े होटल, ट्रांसपोर्ट कारोबारियों के समूह, वहां काम कर रहे एनजीओ, साहित्यकार, संगीतकार, कलाकार और बुद्धिजीवी, शिक्षकों के संगठन, मोहल्ला कमेटियां, किसान-मंडियों के संगठन, खिलाड़ी वगैरह-वगैरह। इनमें से कोई नहीं चाहता कि घाटी में अशांति हो, क्योंकि इससे उनके कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इन सभी वर्गों के प्रतिनिधियों से अगर हिंसा रोकने पर गंभीरता से चर्चा की जाए, तो कई ठोस उपाय सामने आ सकते हैं।

लेकिन अलगाववादियों के सुरों में सुर मिलाने वाला कोई निकाय अगर ऐसी कोशिश करेगा, तो वह कितना गंभीर होगा? यह बड़ा सवाल है। यह बिल्कुल वैसा ही होगा, जैसे किसी कौव्वे को दूध की रखवाली का ज़िम्मा सौंपना। लेकिन ऐसी ईमानदार कोशिशें कश्मीर की फिज़ा बदल सकती हैं, यह ज़रूर कहा जा सकता है। ऐसी ही एक कोशिश केंद्र सरकार के युवा मामलों के मंत्रालय और नेहरू युवा केंद्र संगठन यानी एनवाईकेएस ने दिल्ली में की, जिसका सकारात्मक असर देखने को मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह थी कि कश्मीर से बाहर रह रहे कश्मीरी युवाओं से बातचीत की जाए। इसके तहत दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में रह रहे कश्मीरी युवाओं से संवाद स्थापित किया गया। मुझे यह देख-सुन कर अच्छा लगा कि समारोह में आए बहुत से कश्मीरी युवाओं ने खुलकर कहा कि वे सरकार से बात करने को तैयार हैं। सरकार को उनसे बात करनी चाहिए।

एनवाईकेएस के उपाध्यक्ष दिनेश सिंह के मुताबिक़ इस आयोजन के क्रम में उन्हें पता चला कि एनसीआर में 12 से 15 हज़ार कश्मीरी युवा पढ़ाई या दूसरी वजहों से रहते हैं। सर्दियों में उनकी संख्या बढ़ जाती है। ज़ाहिर है कि देश के दूसरे महानगरों में भी कश्मीरी युवाओं की अच्छी-ख़ासी संख्या रहती है। अगर इन हज़ारों युवाओं को सही तथ्यों की जानकारी दी जाए, उनसे लगातार सकारात्मक संवाद क़ायम किए जाएं, तो ये युवा कश्मीर में भारत के शांति दूत साबित हो सकते हैं। इन युवाओं को सकारात्मक बनाना इसलिए आसान होगा, क्योंकि ये विकास की मुख्यधारा में हैं। इन्हें पता है कि कश्मीर घाटी के पत्थर चला रहे या नहीं चला रहे युवाओं के मुक़ाबले ये कितने सुखी हैं। ये शांति और हिंसा का फ़र्क़ महसूस कर चुके हैं। अलगाववादी और हिंसक तत्व इन्हें लगातार बरगला नहीं सकते। लेकिन केवल इतने भर से काम नहीं चलेगा। घाटी के युवाओं को भी मुख्यधारी की ओर मोड़ने के लिए बहुत कुछ करना होगा।

प्रसंगवश बताता चलूं कि इसी साल फ़रवरी में केंद्रीय युवा और खेल मंत्रालय और एनवाईकेएस की ओर से राष्ट्रीयता और राष्ट्र निर्माण विषय पर आयोजित अखिल भारतीय भाषण प्रतियोगिता में दो लाख रुपए के पहले इनाम की विजेता एक कश्मीरी छात्रा रही थी। प्रतियोगिता में 25 राज्यों के नुमाइंदे शामिल हुए थे। आठ निर्णायकों में मैं भी शामिल था। सोशल मीडिया पर कश्मीरी आतंकी युवाओं की हथियारबंद तस्वीरें भी आजकल लगातार देखने को मिल रही हैं। प्रिंट मीडिया में भी इसका ज़िक्र बढ़ा-चढ़ा कर किया जा रहा है। अप्रैल के आख़िरी हफ़्ते में ऐसे दो वीडियो सामने आए हैं।

एक में 30 और दूसरे में 14 युवा हथियारों के साथ दिखाई दे रहे हैं। पहले वीडियो से लगता है कि कई आतंकी संगठनों ने हाथ मिला लिए हैं और दूसरे वीडियो में लड़कों का सरगना उन्हें देश के ख़िलाफ़ भड़काता दिख रहा है। इस तरह के वीडियो को लेकर देश की मुख्यधारा का मीडिया ख़बरों में लिख रहा है कि इसे देखकर सुरक्षा बलों के होश उड़ गए हैं। मीडिया का ऐसा लिखना दिमाग़ी दीवालिएपन के सिवा कुछ और नहीं है। देश पर मर-मिटने का जज़्बा रखने वाली गौरवशाली भारतीय सेना, अर्धसैनिक बल और जम्मू कश्मीर पुलिस का मनोबल क्या 30 या 14 हथियारबंद युवकों की तस्वीरें देखकर गिर सकता है? मीडिया को लोगों को डराने की प्रवृत्ति से बाज़ आकर घाटी में युवाओं से जुड़ी सकारात्मक ख़बरें प्रसारित-प्रकाशित करनी चाहिए। मसलन, सिपाहियों के पांच हज़ार पदों के लिए एक लाख 18 हज़ार आवेदन आए हैं, जिनमें से 48 हज़ार अकेले कश्मीर ज़ोन से हैं। अखिल भारतीय रिजर्व महिला बटालियन में कश्मीरी महिलाओं की भर्ती की जानी है। अखिल भारतीय रिजर्व महिला बटालियन में कश्मीरी महिलाओं की भर्ती की जानी है। कुछ जगहों पर पत्थरबाज़ी के लिए छात्राएं भी आगे आ रही हैं, लिहाज़ा तय किया गया है कि उनसे निपटने के लिए विशेष महिला बटालियन बनाई जाए। भर्ती के लिए बड़ी संख्या में युवा महिलाओं ने आवेदन किए हैं। हाथ में पत्थर उठाने वाले नकारात्मक छात्र-छात्राओं की संख्या सुरक्षा बलों में भर्ती होने के इच्छुक युवा लड़के-लड़कियों के मुक़ाबले नगण्य है। मीडिया को इस तरह की ख़बरों का संज्ञान प्रमुखता से लेना चाहिए, जिससे कि देश-विदेश में कश्मीरी युवाओं की सोच के प्रति सकारात्मक माहौल बने। भ्रम की स्थितियां दूर हों।

बहरहाल, पैलेट गन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भारत सरकार ने फिर से यह साफ़ कर दिया है कि वह कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की मांग करने वाले या कश्मीर को अलग देश बनाने की मांग करने वाले अलगाववादियों से किसी हालत में बात नहीं करेगी। गठन के बाद से अभी तक हुर्रियत केnकट्टरपंथी धड़े ने कभी अपनी मांगों में नर्मी के संकेत नहीं दिए हैं। ऐसे में कोई नतीजा जब निकलेगा ही नहीं, तो फिर बात करने से क्या फ़ायदा? केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर के सियासी दलों से बातचीत को तैयार है, लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस के वटवृक्ष फ़ारूक़ अब्दुल्ला आजकल जो सुर बोल रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि उनके साथ भी बातचीत बेनतीजा ही रहेगी। यह बात और है कि अब्दुल्ला इससे पहले अलगाववादियों और हिंसा का समर्थन करने वालों के ख़ेमे में खड़े नहीं दिखाई दिए। ऐसे में बातचीत के ज़रिए उन्हें सही रास्ते या कहें कि कम से कम उनके पुराने रास्ते पर लाया जा सकता है, इसकी उम्मीद की जा सकती है। इसी महीने प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के बाद जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कश्मीर में सख़्ती, संयम और वार्ता का तीन सूत्री फॉर्मूला पेश किया है। वे चाहती हैं कि आतंकियों से सख़्ती से निपटा जाए, लेकिन पत्थरबाज़ों से नर्मी से पेश आया जाए और अलगाववादियों से वार्ता हरहाल में हो। अब सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के रुख़ के बाद महबूबा क्या क़दम उठाएंगी, यह देखने वाली बात होगी। वार्ता की मांग पर अड़ी मुख्यमंत्री इस्तीफ़े तक की चेतावनी बीजेपी को दे चुकी हैं।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं और 28 वर्षों तक मुख्यधारा की सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं। कई प्रमुख अख़बारों और टीवी न्यूज़ चैनलों का लंबा अनुभव है)



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