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सत्ता के मद में विवेक का अपहरण कब तक?

शिवसेना के सांसद रवींद्र गायकवाड़ द्वारा एयर इंडिया के एक 60 वर्षीय कर्मचारी से मारपीट करने, चप्पलों से पीटने एवं गाली-गलौच करने की घटना ने न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को शर्मसार किया है, बल्कि मानवीय मूल्यों को भी नजरअंदाज किया है। ऐसा लगता है कि सत्ता की ताकत एवं मद ने विवेक एवं संयम का अपहरण कर लिया है। समाज एवं राष्ट्र में संयमित व्यक्ति ही रेस्पेक्टेबल (सम्माननीय) है और वही एक्सेप्टेबल (स्वीकार्य) है। इसी पर लोकतंत्र की बुनियाद टिकी है। लेकिन गायकवाड ने अपने जन-प्रतिनिधि होने के सम्मान को ही गाली बना दिया है, मानवीयता की सारी हदें उन्होंने पार कर दी।

सांसद गायकवाड़ ने अपने घृणित, अमानवीय एवं बेहूदे व्यवहार से राजनीति की मर्यादा को धुंधलाया है, इससे उनकी मुश्किलें बढ़ने वाली हैं और बढ़नी भी चाहिए। एयर इंडिया ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया है। वहीं, भविष्य में उनके हवाई सफर करने पर भी बैन लगा दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक, यह प्रतिबंध फेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस की ओर से लगाया गया है। इस त्वरित कार्यवाही का स्वागत है, लेकिन लोकतांत्रिक संरचना में भी इस तरह की त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाओं पर तत्काल कठोर दण्ड का प्रावधान बनना ही चाहिए।
इस शर्मनाक घटना का वाकया इस प्रकार घटित हुआ। गायकवाड़ पुणे से दिल्ली के लिए एआई-852 विमान में सफर कर रहे थे, जो सुबह 9.35 बजे दिल्ली पहुंची। यही विमान गुरुवार की सुबह 10.55 बजे दिल्ली से गोवा के लिए उड़ान भरने वाली थी। दिल्ली पहुंचने के बाद विमान से सभी यात्री उतर गए, लेकिन गायकवाड़ नहीं उतरे। सांसद के पास ओपन बिजनस क्लास का टिकट था, लेकिन वह उसी विमान में सफर करना चाहते थे, जो नियमित तौर पर इकॉनमी क्लास की उड़ान ही भरती है। हालांकि, गायकवाड़ ने जब उसी विमान से उड़ान भरने पर जोर दिया तो उन्हें विमान की पहली रो में एक सम्मानजनक सीट उपलब्ध कराई गई, क्योंकि उस विमान में अलग से बिजनस क्लास है ही नहीं। नई दिल्ली हवाई अड्डे पर सांसद विमान से एक घंटे तक नहीं उतरे, जबकि गोवा जाने वाले 115 यात्री विमान के उड़ान भरने का इंतजार करते रहे। एयर इंडिया के कर्मचारियों ने जब गायकवाड़ से विमान से उतरने के लिए कहा तो वह गालियां देने लगे और एयर इंडिया के कर्मचारी को चप्पलों से मारने लगे और भी बहुत कुछ अभद्र एवं हिंसक बर्ताव उन्होंने किया। सरकारी कर्मचारी इस तरह पिटने एवं अपमानित होने के लिये तो कत्तई नहीं है।

सांसद महोदय को चाहिए कि वे अपनी गलती को स्वीकारें, स्वयं को देखे। लेकिन उनको अपने बर्ताव पर जरा-सा भी अफसोस नहीं है। उन्होंने कहा, ‘मैं माफी नहीं मांगूंगा, मैं क्यों मांगू? पहले उसे (पीड़ित) को कहो माफी मांगने के लिए, उसके बाद हम देखेंगे।’ सांसद ने तो दिल्ली पुलिस को चुनौती ही दे डाली कि अगर हिम्मत है तो वह उसे गिरफ्तार करके दिखाए। गायकवाड़ का व्यवहार अतिशयोक्तिपूर्ण है। गायकवाड़ के खिलाफ जो दो प्राथमिकी दिल्ली पुलिस में दर्ज हुई हैं उनमें पहली में आरोप है कि वे एयर इंडिया के कर्मचारी को विमान से बाहर धक्का देने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वहां मौजूद अन्य कर्मचारियों ने उन्हें बचाया। दूसरी प्राथमिकी गोवा जाने वाले 115 यात्रियों से भरे विमान को अपने बर्ताव के चलते उड़ान भरने में देरी करवाने के लिए दर्ज हुई है। इस घटना ने समूचे राष्ट्र को झकझोरा है। अनेक प्रश्न खड़े कर दिये हैं क्या सरकारी कर्मचारी होने का अर्थ राजनेताओं के पांव की जूती बन जाना है? सरकारी कर्मचारी ही नहीं बल्कि आम जनता तक उनकी बेहूदगी, बेरहमी एवं दुव्र्यवहार की शिकार होती है।

प्रश्न है कि क्यों शापित हैं हम सब यह बेहूदगी को झेलने को? एक आम इंसान जो कदम-कदम पर नियमांे की पालना करते हुए अपनी जिंदगी चलाता है, वो ऐसे दुव्र्यवहार को क्यों झेले? जनप्रतिनिधि होने के नाम पर क्या ये हमें खरीद लेते हैं? क्यों हमारे साथ इस तरह के अमानवीय दुव्र्यवहार किये जाते हैं। लोकतंत्र में इस तरह की गुंडागर्दी को क्यांे जगह मिल रही है? एयर इंडिया के जिस कर्मचारी के साथ यह मारपीट एवं गुंडागर्दी हुई है, असल में उस एयर इंडिया के कर्मचारी में हमें आम आदमी दिखाई देता है। इसलिए ये बेहूदगी किसी एक इंसान के साथ नहीं हुई है बल्कि मानवीयता के साथ हुई है, भारतीयता के साथ हुई है, हम सबके साथ हुई है। उनके चेहरे में हम अपना चेहरा देखें।

अफसोस की बात यह है कि राजनीति के मद ने गायकवाड़ को इतना मद में डूबो दिया है कि उनके लिए हर आम इंसान बेचारा है, जो अपमान झेलने, इनकी मार खाने, इनकी जली-कटी सुनने, इनकी जी-हुजूरी करने और इन्हें सलाम करने को ही दुनिया में आया है। ऐसे क्रूर, बेदर्द और बेहूदांे के खिलाफ कार्रवाई होना बहुत जरूरी है। क्योंकि जनप्रतिनिधि को इस तरह के कार्य शोभा नहीं देते। उनके इस व्यवहार की जितनी निंदा की जाए, कम ही होगी। बेहद शर्मनाक है इस तरह सरकारी कर्मचारी को अपने पांव की जूती समझना। इस तरह की घटनाओं को देखते हुए यह अपेक्षित हो जाता है कि जनप्रतिनिधियों के लिए उनके अपराध, उनके बदतमीजियों के लिए कठोर कानून बनने चाहिए और तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रश्न यह भी है कि जनता के द्वारा, जनता के हितों के लिये चुना जाने वाला सांसद कैसे सत्ता के मद में चूर हर किसी को अपमानित करने का अधिकारी हो जाता है? जनमत एवं जन-विश्वास तो दिव्य शक्ति है। उसका उपयोग आदर्शों, सिद्धांतों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए हो। जनता की सुविधा का सृजन करने या उनकी बदहाली को दूर करने के संकल्प के साथ सत्ता पर काबिज होने वाला सांसद के लिये उम्दा क्लास न मिलना कैसे इतना आक्रामक विषय बन जाता है, त्याग एवं संयम का उनका संकल्प कहां लुप्त हो गया? उम्दा क्लास के सीट कब्जा को लेकर ही एयर इंडिया के कर्मचारी से मारपीट पर उतारू हो जाते हैं क्या यही आपका काम रह गया है? मगर जिस तरह आप संसद होने के निम्न स्तर की हरकत करते हुए कर्मचारी को पिटाई करने एवं उसे अपमानित करने का कार्य किया वह कहीं से भी आपके गरिमामय संसद पद के अनुकूल नहीं है, ऐसी किसी कार्य की तो किसी साधारण आदमी से भी उम्मीद ही नहीं की जा सकती फिर आप तो संवैधानिक पद पर बैठे हुए जिम्मेदार नागरिक एवं जनप्रतिनिधि हैं।

आप स्वयं ही कानून को ठेंगा ठिगा रहे हैं इससे बड़ी विडंबना की बात और क्या होगी? आप ऐसा करते हुए नियम और नीति की बात कर रहे हैं जबकि खुद उसी का पालन नहीं कर रहे हैं। नीति और नियम को इस तरह ताक पर रखना आपको शोभा नहीं देता। उसकी ईमानदारी से निर्वाह करने की अनभिज्ञता संसार में जितनी क्रूर है, उतनी क्रूर मृत्यु भी नहीं होती। मनुष्य हर स्थिति में मनुष्य रहे। अच्छी स्थिति में मनुष्य मनुष्य रहे और बुरी स्थिति में वह मनुष्य नहीं रहे, यह मनुष्यता नहीं, परिस्थिति की गुलामी है। इस गुलामी से मुक्ति के लिये ही जनता कुछ आदर्श चेहरों को चुनकर भेजती है कि वे उनका भला सोचेंगे, भला करेंगे।

गायकवाड जैसे हमारे कर्णधार पद की श्रेष्ठता और दायित्व की ईमानदारी को व्यक्तिगत अहम् से ऊपर समझने की प्रवृत्ति को विकसित कर मर्यादित व्यवहार करना सीखें अन्यथा शतरंज की इस बिसात में यदि प्यादा वज़ीर को पीट ले तो आश्चर्य नहीं। गायकवाडजी आपको लोगों के विश्वास का उपभोक्ता नहीं अपितु संरक्षक बनना है। आप जैसे लोगों के लिये भी आचार संहिता बननी चाहिए।

आज हम अगर दायित्व स्वीकारने वाले समूह के लिए या सामूहिक तौर पर एक संहिता का निर्माण कर सकें, तो निश्चय ही प्रजातांत्रिक ढांचे को कायम रखते हुए एक मजबूत, शुद्ध व्यवस्था संचालन की प्रक्रिया बना सकते हैं। ताकि सबसे ऊपर अनुशासन और आचार संहिता स्थापित हो सके अन्यथा अगर आदर्श ऊपर से नहीं आया तो क्रांति नीचे से होगी। जो व्यवस्था अनुशासन आधारित संहिता से नहीं बंधती, वह विघटन की सीढ़ियों से नीचे उतर जाती है। काम कम हो, माफ किया जा सकता है, पर आचारहीनता तो सोची समझी गलती है- उसे माफ नहीं किया जा सकता।
प्रेषक:
(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई0पी0 एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोन: 22727486ए मोबाईल: 9811051133



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