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पानी और कूटनीति

ब्रह्मपुत्र की मुख्यधारा और अरुणाचल प्रदेश की लाइफलाइन समझी जाने वाली सियांग नदी का पानी काला हो जाने से समूचे नॉर्थ-ईस्ट में चिंता बढ़ गई है। पिछले दो महीनों से इस नदी के पानी में मिट्टी, रेत और थोड़ी सीमेंट भी देखने को मिल रही है। इंसान इसे आश्चर्य से देख रहे हैं लेकिन मछलियों के लिए यह जानलेवा साबित हो रहा है। इस पर्यावरणीय आपदा को एक कूटनीतिक संकट के रूप में भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इसके पीछे चीन का हाथ है। संभवत: चीन में नदी की धारा के साथ कोई शरारत की जा रही है, या इसके ऊपरी इलाकों में कोई बड़ा निर्माण कार्य हो रहा है।

इस संबंध में सांसद नोनिंग एरिंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। गौरतलब है कि सियांग नदी तिब्बत से बहती हुई आती है, जहां वह यारलुंग त्सांगपो कहलाती है। अरुणाचल से निकल कर असम में पहुंचने के बाद यह ब्रह्मपुत्र बन जाती है। चर्चा यह है कि तिब्बत में ही चीन 1000 किलोमीटर लंबी (दुनिया की सबसे लंबी) सुरंग बनाकर इस नदी का पानी अपने सुदूर पश्चिमी सूखे प्रांत शिनच्यांग तक पहुंचाना चाहता है। हालांकि चीन ऐसी किसी योजना से इनकार करता रहा है। संभव है, वह अपनी इस योजना को गुपचुप अंजाम दे रहा हो।

डोकलाम विवाद के बाद कई विशेषज्ञों ने आशंका जताई थी कि चीन अपने जल संसाधनों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ हथियार के तौर पर कर सकता है। हम इसे चुपचाप देखते नहीं रह सकते। नदी प्रवाह से जुड़ी सूचनाओं की साझीदारी हर हाल में की जानी चाहिए और अभी पानी की जांच में अगर ऊपर किसी निर्माण कार्य की पुष्टि होती है तो हमें चीन के सामने इसे मजबूती से उठाना चाहिए। इससे बात न बने तो हमें इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाना होगा। बिल्कुल संभव है कि चीन अंतरराष्ट्रीय जल संसाधन के गैर-नौवहन उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के नियमों का उल्लंघन करता हुआ पाया जाए। इसके अनुच्छेद-11 के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय जल संसाधन का साझा करने वाले दो देशों में सूचनाओं की साझेदारी आवश्यक है। लेकिन भारत और चीन में यह संवाद न के बराबर है।

दुनिया के कई देशों में लड़ाई के दौरान भी यह संवाद खत्म नहीं हुआ, पर चीन को अपने हितों के आगे किसी की परवाह नहीं है। वह ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों पर 10 बांध बना चुका है और तीन बांध निर्माणाधीन हैं। इसी क्षेत्र में चीन 7 और बांध बनाने पर विचार कर रहा है। ऐसे में जरूरी है कि हम अपने उपग्रहों द्वारा चीन के बांधों और उसके जल संग्रहण की सूचनाएं जुटाएं और ब्रह्मपुत्र के मामले में बांग्लादेश को साथ लेकर चीन को नियम-कायदे से चलने के लिए बाध्य करें।

http://duniyabharki.blogspot.in/ से
साभार-

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