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क्या था कर्नल पुरोहित का गुनाह?

हमारी सेना का एक कर्नल पिछले छह सालों से जेल काट रहा है। उसे क्यों फंसाया गया? यह कोई नहीं जानता। यूपीए सरकार के दिनों की यह घटना है। उस समय अनेक बातें सुनी गईं। जैसे यह कि ले.कर्नल पुरोहित नकली नोटों के सौदागरों की तह में पहुंच गए थे। खुलासा होता कि उन्हें नकली नोटों के काले कारोबारियों ने फंसा दिया। नरेन्द्र मोदी की सरकार के बनने पर यह तो उजागर हो रहा है कि ले.कर्नल पुरोहित पर अब तक चार्जशीट नहीं हुई है। यह क्या कम चौंकाने वाली बात है। खासतौर पर इसलिए भी कि उन्हें सेना वेतन भी दे रही है। साफ है कि सेना उन्हें निर्दोष मानती है। जो नए तथ्य आ रहे हैं, वे गहरी साजिश का संकेत तो दे रहे हैं, पर यह तो शुरुआत ही है। इसे ही बताती यह रिर्पोट है, जिसकी छानबीन जितेन्द्र चतुर्वेदी ने की है।

‘सबूत पुख्ता नहीं है, इसलिए जमानत पर विचार होना चाहिए।’ यह बात 15 अप्रैल, 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने कही। मामला मालेगांव बम विस्फोट के आरोपियों का था। लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित प्रसाद श्रीकांत भी इसमें एक आरोपी है। अन्य सभी आरोपियों की तरह उन पर भी मकोका (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून) लगा है। इसे हटाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया है। इसकी ठोस वजह है। मकोका को जारी रखने का कोई ठोस प्रमाण सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं रखा गया। ऐसी स्थिति में संभावना बनी हुई है कि ले.कर्नल पुरोहित को जमानत मिल जाए। वे पिछले छह सालों से जेल में हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने मालेगांव विस्फोट के लिए बम मुहैया कराया था।

हालांकि इस बाबत अबतक कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया जा सका है। सबूत की छोड़िए, उनके खिलाफ एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) अब तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं कर पाई है। इसकी क्या वजह हो सकती है? इस पर सरकार और जांच एजेंसियां कुछ बताने की बजाय चुप्पी साधे हुए हैं। क्या इसके पीछे षड्यंत्र है? कुछ दस्तावेज इसकी ओर संकेत भी कर रहे हैं। खैर, उस बात की चर्चा करने से पहले यह जानना उचित रहेगा कि लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को आखिर फंसाया क्यों गया?
सीएसडीएस की वरिष्ठ शोधार्थी मधु किश्वर लिखती हैं, ‘ले.कर्नल पुरोहित के सीने में कई राज हैं। उनमें कुछ ऐसे हैं जो देश के कई कद्दावर नेताओं को बेनकाब कर सकते हैं और उन नेताओं की घटिया राजनीति की पोल खोल सकते हैं। ये सारी जानकारी ले.कर्नल पुरोहित ने अपने कामकाज के दौरान हासिल की है’।

सीएसडीएस की वरिष्ठ शोधार्थी मधु किश्वर लिखती हैं, ‘ले.कर्नल पुरोहित के सीने में कई राज हैं। उनमें कुछ ऐसे हैं जो देश के कई कद्दावर नेताओं को बेनकाब कर सकते हैं और उन नेताओं की घटिया राजनीति की पोल खोल सकते हैं। ये सारी जानकारी ले.कर्नल पुरोहित ने अपने कामकाज के दौरान हासिल की है’।
नरेन्द्र मोदी की सरकार के बनने पर यह तो उजागर हो रहा है कि ले.कर्नल पुरोहित पर अब तक चार्जशीट नहीं हुई है। यह क्या कम चौंकाने वाली बात है। खासतौर पर इसलिए भी कि उन्हें सेना वेतन भी दे रही है। साफ है कि सेना उन्हें निर्दोष मानती है।

दरअसल, पुरोहित सेना के खुफिया विभाग में एक मिशन के तहत काम कर रहे थे। उस दौरान देश में सक्रिय कई धार्मिक संगठनों में उन्होंने अपनी पैठ बना ली थी। वहां से मिलने वाली सूचना वे लगातार सरकार को भेज रहे थे। उच्चस्त सूत्र बताते हैं, ‘इसी दौरान उन्हें पता चला कि जाली नोटों के व्यापार में देश के कुछ नामचीन नेता भी शामिल हैं। यदि यह बात सार्वजनिक हो जाती तो कई नेताओं का राजनीतिक जीवन बर्बाद हो जाता, क्योंकि मामला सीधा देशद्रोह का बनता।’

इससे बचने का एक ही रास्ता था। वह यह कि ले.कर्नल पुरोहित को बीच से हटाना। ‘रॉ’ के पूर्व अधिकारी आरएसएन. सिंह की बात पर गौर किया जाए तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती है। वे लिखते हैं, ‘देश में मौजूद सांप्रदायिक ताने-बाने को कमजोर करने और धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने के लिए एक व्यूह रचना की गई। ऐसा करने के पीछे एक ही वजह थी- ‘वोट बैंक की राजनीति।’ उसी के तहत ‘जेहादी आतंक’ की तर्ज पर ‘हिन्दू आतंक’ का तानाबाना बुना गया’।

वे आगे जानकारी देते हैं कि इसके बनते ही संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री अमेरिकी राजदूत से कहने लगे कि भारत के लिए चिंता का विषय ‘हिन्दू आतंक’ है, न कि ‘जेहादी आंतक’। सिंह का दावा है कि हिन्दू आतंक के प्रचार-प्रसार के लिए एक अंग्रेजी न्यूज चैनल और कुछ अंग्रेजी दैनिक अखबारों को लगाया गया।

अब अगला कदम इस नव निर्मित हिन्दू आतंक को साबित करना था। इसे ले.कर्नल पुरोहित के जरिए सहजता से सिद्ध किया जा सकता था, क्योंकि अपने काम-काज के दौरान उनका संपर्क हिन्दू संगठनों से भी था। इसी रणनीति के तहत उन्हें चुना गया।

इस तरह हिन्दू आतंक की मौजूदगी भी साबित हो गई और देशद्रोही नेताओं का भविष्य भी सुरक्षित रह गया। लेकिन, पूरे खेल में जिस तरह का घिनौना षड्यंत्र रचा गया, वह खासा चौंकाने वाला है। चकित करने वाली बात तो सप्रंग सरकार की भूमिका भी है, क्योंकि उसी की देख-रेख में पूरी साजिश रची गई। इसके प्रमाण मौजूद हैं। पहला प्रमाण ले.कर्नल श्रीकांत पुरोहित का पत्र है। दूसरा- सेना कोर्ट की सुनवाई। तीसरा- एमएसएचआरसी (महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग) को भेजी गई शिकायत। यह शिकायत कैप्टन नितिन दात्रे जोशी ने की थी।

ले. कर्नल पुरोहित का पत्र

ले.कर्नल पुरोहित प्रसाद श्रीकांत ने 31 मई, 2014 को प्रधानमंत्री के नाम चिट्ठी लिखी थी। 18 पृष्ठ की उस चिट्ठी में पूरी घटना का सिलसिलेवार जिक्र है। चिट्ठी में लिखा है कि एटीएस उन्हें मालेगांव बम विस्फोट में एक षड्यंत्र के तहत फंसा रही है। जब बम विस्फोट हुआ, तब वे पंचमढ़ी (मध्य प्रदेश) में थे। अरबी भाषा सीखने के लिए सेना के प्रशिक्षण स्कूल आए थे।

इसी दौरान 24 अक्टूबर, 2008 को कर्नल आरके. श्रीवास्तव को सेना ने पंचमढ़ी भेजा। जानकारी के मुताबिक सेना ने उन्हें आदेश दिया कि वे ले.कर्नल पुरोहित से मिलें और उन्हें मुंबई लेकर जाएं। ताकि महाराष्ट्र एटीएस उनसे बम विस्फोट के बारे में पूछताछ कर सके। कर्नल श्रीवास्तव से कहा गया था कि ले.कर्नल पुरोहित को मुंबई ले जाने से पहले दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय लाया जाए। यही वजह थी कि ले.कर्नल पुरोहित को दिल्ली जाने का मूवमेंट ऑर्डर मिला।

यह आदेश मिलते ही उनसे मोबाइल फोन जमा करने के लिए कहा गया। यह सुनकर पुरोहित चकित हुए, लेकिन कर्नल श्रीवास्तव का आदेश था। सेना की मर्यादा को देखते हुए वे नकार नहीं सकते थे।

फोन जमा करने के बाद पुरोहित कर्नल श्रीवास्तव के साथ नई दिल्ली मुख्यालय के लिए रवाना हुए, क्योंकि उनके पास मूवमेंट ऑर्डर नई दिल्ली जाने का था।

यहां मूवमेंट आर्डर को अच्छी तरह समझना जरूरी है, क्योंकि यह एक अहम दस्तावेज है। इसे तब जारी किया जाता है, जब सेना का कोई अधिकारी अस्थाई रूप से अपने ड्यूटी स्टेशन से बाहर रहता है। सेना में मूवमेंट ऑर्डर का उल्लंघन अपराध है। यह अपराध कर्नल श्रीवास्तव ने किया, क्योंकि वे ले.कर्नल पुरोहित को पहले दिल्ली लेकर नहीं आए, जैसा कि आदेश था। कर्नल श्रीवास्तव आश्चर्यजनक तरीके से ले. कर्नल पुरोहित को लेकर मुंबई पहुंचे। वहां उन्होंने ले. कर्नल पुरोहित को महाराष्ट्र एटीएस के हवाले कर दिया।

चिट्ठी के मुताबिक यह घटना 29 अक्टूबर, 2008 की है। एटीएस उन्हें खंडाला लेकर गई। जहां उन्हें बंगले में ठहराया गया। वहां उन्हें 4 नवबंर, 2008 तक अवैध तरीके से हिरासत में रखा गया। 5 नवंबर, 2008 को एटीएस ने उनकी औपचारिक गिरफ्तारी की घोषणा की। इस दौरान यानी 29 अक्टूबर से 5 नवंबर, 2008 तक उनकी गिनती लापता लोगों में हो रही थी, क्योंकि तब पुरोहित के बारे में किसी के पास कोई जानकारी नहीं थी।

ले.कर्नल पुरोहित के अनुसार इस दौरान किसी से संपर्क करना उनके लिए संभव नहीं था, क्योंकि उनका गंतव्य बदल दिया गया और इसकी सूचना दिल्ली नहीं भेजी गई। वे चिट्ठी में बताते हैं कि इसके पीछे गहरी साजिश थी। खंडवा में उन्हें खूब प्रताड़ित किया गया। इस बात के लिए दबाव बनाया गया कि वे मालेगांव बम विस्फोट की जिम्मेदारी लें। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो उनकी बहन, पत्नी और मां को उनके सामने निर्वस्त्र किया जाएगा। एटीएस ने इसे अंतिम हथकंड़े के रूप में अपनाया। इसके बावजूद पुरोहित नहीं टूटे। वे किसी भी कीमत पर झूठे आरोप को स्वीकारने को तैयार नहीं थे।

दस्तावेजों के अनुसार इतने के बाद महाराष्ट्र एटीएस ने गवाह तैयार करने की साजिश रची। इसके लिए कैप्टन नितिन दात्रे जोशी और सुधाकर चतुर्वेदी को निशाना बनाया गया। कैप्टन से बयान बंदूक की नोक पर दिलवाया गया और सुधाकर के घर साक्ष्य रखवाए गए। दोनों बातें सामने आ चुकी हैं।

कैप्टन नितिन दात्रे जोशी की शिकायत

कैप्टन नितिन दात्रे जोशी उन गवाहों में एक हैं, जिनकी गवाही के आधार पर ले.कर्नल पुरोहित को आरोपी बनाया गया। बाद में वे अपने बयान से पलट गए। उन्होंने एटीएस पर आरोप लगाया कि ले.कर्नल पुरोहित को फंसाने के लिए उनसे जबरन बयान दिलवाया गया था। इस बाबत 5 सितंबर, 2009 को कैप्टन जोशी ने एमएसएचआरसी में शिकायत भेजी। उसमें जो दावा किया गया है, वह पुरोहित की बेगुनाही और महाराष्ट्र एटीएस की साजिश को उजागर करती है।

बात 12 नवंबर, 2008 की है। नितिन दात्रे जोशी को काला चौकी पुलिस स्टेशन पर लाया गया। यह मुंबई एटीएस का कार्यालय है। जब जोशी वहां पहुंचे तो एटीएस अधिकारी दिलीप श्रीराव मौजूद थे। उन्होंने जोशी से कहा कि तुम ऐसा बयान दो, जिससे कर्नल पुरोहित को मालेगांव बम विस्फोट का आरोपी बनाया जा सके। यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो मानकर चलो कि तुम्हें 15 साल तक जेल में सड़ना पड़ेगा। जोशी को एटीएस वहां लेकर गई, जहां ले.कर्नल पुरोहित को डिटेंन किया गया था।
कैप्टन नितिन दात्रे जोशी उन गवाहों में एक हैं, जिनकी गवाही के आधार पर ले.कर्नल पुरोहित को आरोपी बनाया गया। बाद में वे अपने बयान से पलट गए। उन्होंने एटीएस पर आरोप लगाया कि ले.कर्नल पुरोहित को फंसाने के लिए उनसे जबरन बयान दिलवाया गया था।

पुरोहित की ओर इशारा करते हुए एटीएस अधिकारी ने कहा- इसकी हालत ठीक से देख लो। यदि तुमने एटीएस के मुताबिक बयान नहीं दिया तो तुम्हारा हाल भी पुरोहित की तरह होगा। तुम इतना तो समझ ही सकते हो कि जब हमने एक कर्नल को फंसा दिया, तो तुम्हें फंसाने में एटीएस को कोई दिक्कत नहीं होगी।

यह सब देखने-सुनने के बाद कैप्टन जोशी सहम गए। उन्होंने एटीएस की बात मान ली। इसके बाद एटीएस अधिकारी मोहन कुलकर्णी ने कैप्टन जोशी का बयान खुद बोलकर लिखवाया। वह बयान इस प्रकार है- ‘ले.कर्नल पुरोहित ने उन्हें 2006 में कुछ हथियार अपने घर में रखने के लिए दिया। जोशी ने पुरोहित के घर में आरडीएक्स देखा। ले.कर्नल पुरोहित ने कैप्टन जोशी को बताया कि समझौता एक्सप्रेस में बम विस्फोट के लिए आरडीएक्स उन्होंने ही भेजा था।’ कैप्टन जोशी के बयान को दिलीप श्रीराव ने एटीएस के मुखिया हेमंत करकरे की सलाह पर अंतिम रूप दिया।

एमएसएचआरसी की भेजी गई शिकायत में कैप्टन जोशी आगे लिखते हैं, ‘उन्हें कोर्ट के सामने पेश किए जाने से पहले एटीएस अधिकारी मोहन कुलकर्णी ने उन्हें धमकाया। साथ ही गोली से भरी पिस्तौल दिखाई और कहा कि यदि तुमने कोर्ट में अपना बयान बदला तो तुम्हारे सिर में एक गोली उतार दी जाएगी।’ डर के इस माहौल में कैप्टन जोशी ने कोर्ट में वही कहा जो एटीएस चाहती थी।

दिलचस्प बात यह है कि उनके रिकार्डेड बयान को सील बंद नहीं किया गया। उसे साधारण तरीके से लिफाफे में रखकर स्टेपल कर दिया गया। हालांकि, नियम यह है कि गवाह के बयान को सील-बंद किया जाए। आखिर एटीएस ने ऐसा क्यों नहीं किया? यह सवाल उनसे पूछा जाना चाहिए। कहीं इसकी वजह बयान में मन-मुताबिक फेरबदल करने की तो नहीं थी। कैप्टन जोशी ने जो पत्र में लिखा है, उससे यही संकेत मिलते हैं। उन्हें तो बयान देने के बाद भी धमकाया गया था। कैप्टन जोशी ने पत्र में ऐसा ही दावा किया है। उनके मुताबिक एटीएस अधिकारियों ने उनसे कहा कि यदि वे अपने बयान से पलटे तो उनके परिवार को इसका खमियाजा भुगतना पड़ेगा। शायद यही वजह रही कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं जारी किया। लेकिन एमएसएचआरसी की शिकायत में उन्होंने अपनी बात खुलकर रखी है।
सेना ले.कर्नल पुरोहित को निर्दोष मानती है। सेना ने ले.कर्नल पुरोहित को निलंबित तक नहीं किया है। पिछले छह साल से उन्हें वेतन दे रही है। वह भी तब, जबकि पुरोहित जेल में हैं। उन पर आंतकवादी होने का आरोप लगा है।

जहां तक बात सुधाकर चतुर्वेदी की है, तो वे ले.कर्नल पुरोहित के साथ काम करते थे। एटीएस को संदेह था कि सुधाकर भी षड्यंत्र में शामिल है। इसलिए 25 नवंबर, 2008 को उनके घर की तलाशी हुई। वहां आरडीएक्स मिला। एटीएस ने आरडीएक्स के उन नमूनों को मालेगांव विस्फोट में प्रयोग किए गए आरडीएक्स के नमूनों से मिलाया। दोनों एक-दूसरे से मेल खा रहे थे। इससे साबित हो रहा था कि सुधाकर भी इसमें शामिल है।

इन्हीं तथ्यों के आधार पर सुधाकर को आरोपी बनाया गया। लेकिन सैन्य न्यायालय में इस बाबत जो गवाही (2009 अप्रैल से 2009 अगस्त के बीच) हुई, उससे नया पहलू सामने आया। वह खासा चौंकाने वाला है, क्योंकि उससे यह बात साबित हो जाती है कि एटीएस झूठे दावे कर रही है। मालेगांव बम विस्फोट से न तो ले.कर्नल पुरोहित का कोई लेना-देना है। न सुधाकर चतुर्वेदी का। सैन्य न्यायालय में मेजर प्रवीण खंजोडे और सूबेदार केशव आर. पवार ने जो बयान दिए, उससे यही सिद्ध होता है।

बात ले.कर्नल पुरोहित की औपचारिक गिरफ्तारी से दो दिन पहले यानी 3 नवंबर, 2008 की है। एटीएस के शेखर बागडे ने सूबेदार पवार के पास फोन किया। वे सुधाकर चतुर्वेदी के घर का पता चाहते थे। पता बताने से पहले सूबेदार पवार ने इसकी सूचना मेजर प्रवीण को दी। मेजर प्रवीण ने सूबेदार पवार से कहा कि वह शेखर बागड़े की मदद करें। तब सूबेदार ने बागड़े को फोन किया तो बागड़े ने कहा कि उन्हें पते की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि किसी वरिष्ठ अधिकारी का फोन आने पर वे वापस नासिक जा रहे थे।

बागड़े से हुई बातचीत के बारे में सूबेदार पवार ने मेजर प्रवीण को बताया। मेजर प्रवीण ने कहा कि मैं आता हूं। फिर चलकर देखते हैं कि मामला क्या है। करीब चार बजे के आसपास सूबेदार पवार और मेजर प्रवीण सुधाकर चतुर्वेदी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि सुधाकर के घर का दरवाजा का खुला है। जब वे अंदर घुसे तो शेखर बागड़े को पाया। वे वहां पर झूठे साक्ष्य (इविडेंस प्लांट) रख रहे थे। वह भी तब जब सुधाकर के घर पर कोई नहीं था। बागड़े वहां अकेले थे। कानूनन यदि बागड़े सुधाकर के घर की तलाशी ले रहे थे, तो उनके साथ कोई दूसरा व्यक्ति भी होना चाहिए था।

चूंकि वे गलत इरादे से गए थे, इसलिए किसी को साथ लेकर नहीं गए थे। यही वजह है कि बागड़े मेजर प्रवीण और सूबेदार पवार को वहां देखकर चौंक गए और इन दोनों के आगे हाथ-पांव जोड़ने लगे। उन्होंने मेजर और सूबेदार से कहा कि वे इस घटना का जिक्र किसी से न करें। यदि ऐसा करेंगे तो उसे (बागड़े को) नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। मेजर प्रवीण और सूबेदार पवार का यह बयान सैन्य न्यायालय के रिकार्ड में दर्ज है। यही वजह है कि सेना ले.कर्नल पुरोहित को निर्दोष मानती है।

सेना ने ले.कर्नल पुरोहित को निलंबित तक नहीं किया है। पिछले छह साल से उन्हें वेतन दे रही है। वह भी तब, जबकि पुरोहित जेल में हैं। उन पर आंतकवादी होने का आरोप लगा है। लेकिन अपनी जांच-पड़ताल के बाद सेना ने उन्हें निर्दोष पाया।

यह रहस्य की बात है कि सरकार ने सेना से यह जानने की कोशिश नहीं की कि ले.कर्नल पुरोहित को किस आधार पर वेतन दिया जा रहा है? वजह सीधी है। जो दिखाई दे रहा है, उससे कहीं बड़ा सच छुपा है। कुछ बड़े राजनेताओं को बचाने के लिए सरकार की एजेंसियों का दुरुपयोग किया गया।

साभार- यथावत.कॉम  से

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