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जब हम चिड़िया की बात करते हैं

जब हम चिड़िया की बात करते हैं तो हम उम्मीद और प्यार की गर्माहट भरी दुनिया की बात करते हैं। जब हम चिड़िया की बात करते हैं तो एक छोटी और नन्ही उड़ान की बात करते हैं। इस दुनिया में चिड़िया गायब होने लगे तो दुनिया में जरूर एसा कुछ चल रहा है जो इस चिड़िया के लिए मुफीद नहीं है। चिड़ियों का चहचहाना और पेड़ पर उनका कलरव स्मृति के हिस्से हो चले हैं। जब नन्ही चिड़िया को दुनिया जीने नहीं दे रही है तो इंसानों के लिए यह किसी संकट की ही चेतावनी है।

'जब हम चिड़िया की बात करते हैं' पंक्ति मैने कवि विनीत तिवारी की कविता 'जब हम चिड़िया की बात करते हैं' से उधार ली है।

नन्ही गौरेया की किसी भी वातावरण में जीवित बने रहने की अकूत क्षमता होती है। गौरेया का लुप्त होना पर्यावरण के ह्रास और मानव जीवन के लिए खतरे का संकेत है। गौरेया के लुप्त होने के बारे में कई कयास हैं, लेकिन तथ्य यही है कि शहरी इलाकों में मनुष्य के रहन-सहन की बदलती जीवन शैली गौरेया के अनुकूल नहीं है। गौरेया की खास बात यही है कि वह दूसरे पक्षियों की तरह पेड़ के कोटरों के बजाय मानव बसाहटों में अपने लिए घोंसला बनाती है। यही कारण है कि गौरेया अन्य पक्षियों की तुलना में मनुष्य के अधिक नजदीक है। आधुनिक बिल्डिंगों में उन्हें भोजन के लिए छोटे कीड़े-मकोड़े नहीं मिलते हैं। मच्छरनाशक द्रव्यों के अधिक इस्तेमाल से ये कीड़े समाप्त हो चुके हैं, इसी के साथ गौरेया भी कम होती जा रही है। इमारतों में गौरेया के आने-जाने की कोई जगह नहीं होती। खिड़कियों पर एसी लगाकर उन्हें बंद किया जा चुका है। शहरों में गौरेया अक्सर घरों में पंखों, विद्युत मीटर और ट्यूबलाइट के पास अपना घोंसला बनातीं थीं। आज के आधुनिक घरों में उनके घोंसला बनाने की कोई जगह नहीं है। सड़कों पर वाहनों से होने वाला ध्वनि प्रदूषण और उनसे निकलने वाली विषाक्त गैसों (कार्बन मोनोआक्साइड) ने उन्हें शहरों से दर-बदर कर दिया है। मोबाइल और इंटरनेट की तरंगों के संजाल के कारण भी गौरेया शहरी इलाकों का रुख नहीं करतीं। इंटरनेट को हम पर्यावरण मित्र कहते हैं। आज सभी फेसबुक और व्हाट्सऐप की आभासी दुनिया में इस कदर गाफिल हैं कि उन्होंने इस असल दुनिया के भीतर एक अपनी दुनिया बना ली है। यह दुनिया जिस इलेक्ट्रो मैग्नेटिक तरंगों से चल रही है वही इस चिड़िया की उड़ान में बाधा बन रही है। नतीजतन सालों से मनुष्य के करीब रहती आई गौरेया ने शहर के शोरशराबे से दूर-दराज के इलाकों की ओर रुख कर लिया है।

पिछले 60 साल में जैवविविधता बड़ी तेजी से खत्म हुई है। नन्ही गौरैया का लुप्त होना इसी का सबूत है। घास के बीज गौरेया का प्रमुख भोजन है। बड़े शहरों में घास के मैदान खत्म हो गए तो गौरेया को भोजन मिलना बंद हो गया, जिससे उसने ग्रामीण इलाकों में अपना घर बना लिया। शहरों में बच्चों के लिए घास वाले खेल के मैदान का लुप्त होना और गौरेया का खत्म होना एक ही परिघटना है।

वैसे सेल फोन के आगमन से बहुत पहले ही गौरैया का लुप्त होना शुरू हो गया था। रसैल कारसन ने 1962 में अपनी बहुपठित किताब साइलेंट स्प्रिंग में चेतावनी दे दी थी कि हमारा सभ्य समाज 1939 के बाद से कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग कर रहा है जिससे हम जैव विविधता को नष्ट कर रहे हैं। इससे न केवल नन्हे कीट खत्म हो रहे हैं, पारिस्थितकीय तंत्र की खाद्य श्रृंखला प्रभावित हो रही है।

गौरेया मोटे किस्म का अनाज, कई प्रकार के फल, घास के फूल-बीज आदि खाती है। इस प्रक्रिया में वह इनके बीज को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है इस प्रकार प्रकृति में तमाम स्थानों पर बीज पहुंचते हैं और जैवविविधता और पर्यावरण संतुलन बना रहता है। गौरेया फसलों और पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कई प्रकार के कीड़ों, कृमियों और इल्लियों को भी अपना भोजन बनाती है, इस प्रकार फसलों और पेड़ पौधों का प्राकृतिक कीट नियंत्रण करती है। पारिस्थितिक तंत्र को स्वस्थ्य रखने में गौरेया की अहम भूमिका होती है। खाद्य श्रृंखला में गौरेया, बाज, गिद्ध और कुछ बड़े पक्षियों समेत सांप का प्रमुख भोजन होती है। इस प्रकार से यह खाद्यश्रंखला में दूसरे पायदान पर होती है। यानी यह बीज, फल, कीड़ो आदि को खाकर फिर बड़े पक्षियों का भोजन बनती है इस प्रकार खाद्य श्रंखला की महत्वपूर्ण कड़ी बनती है। यदि गौरेया कम होंगी तो बड़े पक्षियों और सांप को उनका भोजन नहीं मिलेगा और खाद्य श्रृंखला बिगड़ेगी प्राकृतिक असंतुलन पैदा होगा। गौरेया के साथ ही गिद्धों की संख्या में कमी का कारण गौरेया और गिद्ध में यह अंतर्सबंध भी हो सकता है। गौरैया की संख्या में तेजी से गिरावट आई है जिससे और परोक्ष अपरोक्ष रूप से मानव जीवन का अस्तिव भी संकट में है। नन्ही गौरेया का अस्तित्व एक मानवीय और सभ्य दुनिया की आश्वस्ति है, जिसे हर हाल में बचाए रखने की जरूरत है।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से

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