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जहां शिव सुन्दरेश्वरर रूप में मीनाक्षी रूप में पार्वती से विवाह रचाने आए थे

भगवान शिव सुन्दरेश्वरर रूप में अपने गणों के साथ पांड्य राजा मलयध्वज की पुत्री राजकुमारी मीनाक्षी से विवाह रचाने मदुरई नगर में आये थे। इस पावन प्रसंग को लेकर मदुरई में बन गया मीनाक्षी मन्दिर,जिसे मीनाक्षी सुन्दरेश्वरर मन्दिर या मीनाक्षी अम्मां मन्दिर भी कहा जाता है। प्रचलित कथानक के अनुसार इस विवाह को विश्व की सबसे बडी़ घटना माना गया, जिसमें लगभग पूरी पृथ्वी के लोग मदुरई में एकत्र हुए थे। भगवान विष्णु स्वयं, अपने निवास बैकुण्ठ से इस विवाह का संचालन करने आये। ईश्वरीय लीला अनुसार इन्द्र के कारण उनको रास्ते में विलम्ब हो गया। इस बीच विवाह कार्य स्थानीय देवता कूडल अझघ्अर द्वारा संचालित किया गया। बाद में क्रोधित भगवान विष्णु आये और उन्होंने मदुरई शहर में कदापि ना आने की प्रतिज्ञा की और वे नगर की सीम से लगे एक सुन्दर पर्वत अलगार कोइल में बस गये। बाद में उन्हें अन्य देवताओं द्वारा मनाया गया, एवं उन्होंने मीनाक्षी-सुन्दरेश्वरर का पाणिग्रहण कराया। यह विवाह एवं भगवान विष्णु को शांत कर मनाना, दोनों को ही मदुरई के सबसे बडे़ त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, जिसे चितिरई तिरुविझा या अझकर तिरुविझा, यानि सुन्दर ईश्वर का त्यौहार कहा जाता है।

भारत के तमिलनाडु राज्य के मदुरई नगर में स्थित मीनाक्षी मन्दिर दक्षिण भारतीय स्थापत्य और मूर्ति शिल्प का बेमिसाल विस्मयकारक नमूना है। इस ऐतिहासिक मन्दिर को भगवान शिव एवं पार्वती को समर्पित है यह मन्दिर। यहां शिव को सुन्दरेश्वरर के रूप में एवं पार्वती को मीनाक्षी अर्थात मछली के आकार की आंख वाली देवी के रूप में माना जाता है। उल्लेखनीय है कि मछली पांड्य राजाओं का राजचिह्न था। इस मन्दिर को देवी पार्वती के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है।

वर्तमान मन्दिर का निर्माण सत्रहवीं शताब्दी के शुरू का बताया जाता है, परंतु पुराने समय से ही तमिल साहित्य में इस का वर्णन मिलता है। सम्पूर्ण मन्दिर का भवन समूह लगभग 45 एकड़ भूमि में बना है, जिसमें मुख्य मन्दिर की लम्बाई 254 मी टर एवं चौडा़ई 237 मीटर है। भव्य मंदिर इमारत समूह की चारदीवारी में विस्तृत रूप से शिल्पित 12 भव्य गोपुरम अर्थात प्रवेश द्वार बने हैं जिनकी सुंदर और बारीक चित्रकारी देखते ही बनती है। पूर्वी द्वार पर 1011, दक्षिणी द्वार पर 1511,पश्चिमी द्वार पर 1124 एवं उत्तरी द्वार पर सबसे कम मूर्तिशिल्प बने हैं और सभी द्वार 9 मंजिलें बने हैं। दक्षिण गोपुरम सबसे ऊंचा है।

मुख्य शिव मन्दिर समूह के मध्य में स्थित है शिल्प युक्त सहस्र स्तंभ। मन्दिर के गर्भ गृह में शिव की नटराज मुद्रा भी स्थापित है जिसमें वे अपना दांया पैर उठा है। यह भारी नटराज की मूर्ति, एक बडी़ चांदी की वेदी में बंद है, इसलिये इसे वेल्ली अम्बलम् (रजत आवासी) कहते हैं। इस गृह के बाहर बडे़ शिल्प आकृतियां हैं, जो कि एक ही पत्थर से बनी हैं। इसके साथ ही यहां एक वृहत गणेश मन्दिर भी है, जिसे मुकुरुनय विनायगर् कहते हैं। देवी का गर्भ गृह शिव के बांये में स्थित है। मीनाक्षी मन्दिर का पवित्र सरोवर(पुष्करिणी) 165 फ़ीट लम्बा एवं 120 फ़ीट चौड़ा है। भक्तगण मन्दिर में प्रवेश से पूर्व इसकी परिक्रमा करते हैं। मन्दिर का मंडप में कलात्मक शिल्प युक्त सहस्र स्तंभ हैं। मण्डप को जाती सीड़ियों के बगल में मुदलियार की अश्वारोही मूर्ति स्थित है। माना जाता है कि सभामंडप का निर्माण इसी ने करवाया था। इस मण्डप के बाहर ही पश्चिम की ओर संगीतमय स्तंभ स्थित हैं। इनमें प्रत्येक स्तंभ थाप देने पर भिन्न स्वर निकालता है। मंडप में मन्दिर का कला संग्रहालय भी स्थित है। इसमें मूर्तियाँ, चित्र, छायाचित्र एवं वित्रकारी, इत्यादि के द्वारा मन्दिर का इतिहास देख सकते हैं। स्तंभ मण्डप के दक्षिण में कल्याण मण्डप स्थित है, जहां प्रतिवर्ष मध्य अप्रैल में चैत्र मास में चितिरइ उत्सव मनाया जाता है। इसमें शिव – पार्वती विवाह का आयोजन किया जाता है। यह भव्य एवं विशाल ऐतिहासिक मन्दिर तमिलनाडु राज्य का एक महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल भी है।
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( लेखक अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार और पर्यटन विषय के विशेषज्ञ हैं)
कोटा,राजस्थान.

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