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महर्षि दयानंद और विरजानंद जी जैसे गुरु कहाँ मिलेंगे

महर्षि दयानन्द जी ने गुरू विरजाननद जी से वेदों का अध्ययन पूर्ण किया और जब गुरू दक्षिणा का समय आया तो महर्षि दयानंद के पास दक्षिणा में देने को कुछ भी न था तो कुछ लोंग दक्षिणा के रूप में गुरू जी को प्रस्तुत किए। गुरू विरजाननद ने भी अध्ययन काल में ही शिष्य दयानंद की योग्यता को परख लिया था । उन्होंने दयानंद से कहा मैं तेरी तुझ भेंट से सन्तुष्ट नहीं हो सकता मुझे कुछ और चाहिए । दयानंद ने सिर झुका कर गुरू से कहा आज्ञा दो गुरूदेव मैं आप की आज्ञा को दक्षिणा स्वरूप अवश्य पूर्ण करूँगा ।

गुरू विरजाननद ने महर्षि दयानंद से कहा कि विश्व में वेदों का प्रकाश लुप्त होने को है और धरती पर धर्म के नाम पर बहुत से मत मतान्तर फैल रहे हैं और ईश्वर के स्थान जड़ पदार्थ की तथा मनुष्य पुजा फैल रही है तथा पाखण्ड अज्ञानता अंध विश्वास में मनुष्य धन समय मानसिक शांति को गँवा रहा है । जिस कारण धर्म के स्थान अधर्म फैल रहा है । मैं तुझ से तेरा जीवन चाहता हूँ कि तुम धरती से अज्ञानता को दूर करो और ईशवरिय ज्ञान वेद को प्रचारित करो ताकि वैदिक धर्म पुनः धरती पर स्थापित हो सके ।

महर्षि दयानंद ने कहा जो आज्ञा गुरू देव ऐसा ही होगा और मैं प्रण करता हूँ कि मैं जीवन भर वेदों का प्रचार करूँगा और पखणड अन्ध विश्वास को मिटाऊँगा ।
इतिहास गवाह है ऋषि दयानंद ने अपना पूर्ण जीवन वेदों के प्रचार और अंधविश्वास व समाजिक कुरीतियाँ को मिटाने में लगाया । धन्य है शिष्य दयानंद !

जब पखणडीयों की दुकानें हिलने लगी जब अधर्मी दयानंद के तर्क व ज्ञान के सामने टिक न पाये तो उन्होंने लोगों को भड़काया सैकड़ों बार दयानंद को पत्थरों से घायल किया , 16 बार ज़हर देकर मारने की कोशिश की लेकिन वे अपने सत्य धर्म के प्रचार से विचलित न हुए । उन्होंने कहा अगर मेरी उँगलियों को मोम बती की तरह जला दोगे तब भी मैं सत्य का प्रचार करूँगा इस कार्य से मुझे कोई विमुख नहीं कर सकता ।

उन्होंने कहा वेदों को छोड़ कर कोई अन्य धर्मग्रन्थ प्रमाण नहीं है – इस सत्य का प्रचार करने के लिए स्वामी जी ने सारे देश का दौरा करना प्रारंभ किया और जहां-जहां वे गये प्राचीन परंपरा के पंडित और विद्वान उनसे हार मानते गये।

उन्होंने ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रन्थों का भली-भांति अध्ययन-मन्थन किया था। अतएव अकेले ही उन्होंने तीन-तीन मोर्चों पर संघर्ष आरंभ कर दिया। दो मोर्चे तो ईसाइयत और इस्लाम के थे किंतु तीसरा मोर्चा सनातनधर्मी हिंदुओं का था, जिनसे जूझने में स्वामी जी को अनेक अपमान, कलंक और कष्ट झेलने पड़े। वे जो कुछ
कह रहे थे, उसका उत्तर न तो मुसलमान दे सकते थे, न ईसाई, न पुराणों पर पलने वाले हिन्दू पण्डित और विद्वान।

स्वामीजी प्रचलित धर्मों में व्याप्त बुराइयों का कड़ा खण्डन करते थे चाहे वह सनातन धर्म हो या इस्लाम हो या ईसाई धर्म हो।

स्वामी दयानंद जी ने आर्य समाज की स्थापना की ताकी उनके बाद भी यह संस्था अधर्म अंध विश्वास अज्ञानता के विरूद्ध अपनी अवाज़ बुलंद रखे तथा ईशवरिय ज्ञान वेदों का प्रचार करती रहे ।

महर्षि ने भी अपने शिष्यों से गुरू दक्षिणा माँगी है । जिसे उन्होंने आर्य समाज के नियमों में लिखा ” वेदों का पढ़ना पढ़ाना -सुनना सुनाना सभी आर्यों का परम धर्म है ” अब देखना यह है की उनके शिष्य -अनुयायी अपने गुरू को दक्षिणा देने में खरे उतरते है या नही । महर्षि दयानंद ने तो अपने गुरू को दक्षिणा में अपना जीवन दे दिया था । हम अपने गुरू देव दयानंद को किस प्रकार गुरू दक्षिणा देते है ये आर्यों के आत्म चिन्तन का विष्य है जिसे हर आर्य सत्यार्थ प्रकाश और अन्य वैदिक साहित्य बाँट कर या अन्यों को आर्य समाज से जोड़ कर या वेद प्रचारार्थ दान देकर पूरा कर सकता है।

धन्य है तुझको ऐ ऋषि तूने हमें जगा दिया ,
सो सो कर लुट रहे थे हम तूने हमें बचा दिया ।

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