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कहाँ ले जाएगी बेशर्म हिन्दी फिल्मों की ये बेहयाई

हिन्दी फिल्मों के शुरूआती दौर में मोटे तौर पर धार्मिक, सामाजिक और मारधाड़ वाली फिल्मो के जॉनर प्रचलित रहे और शहर से लेकर कस्बों तक हर जॉनर का पर्याप्त दर्शक वर्ग मौजूद था. साठ के दशक तक भारत में सिनेमा हाल की सीटों के दर्जे दर्शकों की आर्थिक स्थिति और मनःस्थिति के मुताबिक बंटे हुए थे. पर्दा प्रथा के चलते कई सिनेमाघरों में महिलाओं के बैठने की पृथक व्यवस्था रहती थी. फिल्म सेंसर बोर्ड से गाहे बगाहे कोई फिल्म ‘केवल वयस्कों के लिये’ ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ पारित की जाती थी तो नई उगी दाढ़ी मूंछ वाले छोटे कद के युवाओं को भी मुस्टंडे गेटकीपर हाल में घुसने नहीं देते थे. खाकसार को उज्जैन में सत्तर के दशक की शुरुआत में बी आर इशारा की ‘चेतना’ के अलावा फ़िरोज़ चिनॉय की ‘दोराहा’ और रामसे बंधुओं की ‘दो गज ज़मीन के नीचे’ इसी चक्कर में न देख पाने का मलाल आज भी सालता है.

बहरहाल इस शुक्रवार कोई नई हिन्दी फिल्म रिलीज़ न होने से नाचीज़ को इस कॉलम में हिन्दी फिल्मो की बदलती दशा और दिशा जैसे मुद्दे को उठाने का अवसर मिल ही गया. एक जून को चेन्नई के भव्य फोरम विजया मॉल में एक दर्जन स्क्रीन वाले ‘पलाज़ो’ मूवी पैलेस में ‘वीरे दी वेडिंग’ का पहला शो दर्शकों से खचाखच भरा था. स्वाभाविक रूप से ज्यादातर संख्या उन हिन्दी भाषी परिवारों की थी जो अपने बच्चों के नौकरी-धंधे के चलते वहां कुछ अरसा रहने या छुट्टियाँ बिताने पहुँचते हैं. फिल्म के ट्रेलर/टीज़र और धुंआधार प्रचार से लगने लगा था कि ‘ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा’ का यह महिला संस्करण ज़रूर लीक से हटकर होगा.
अंदेशा यह भी था कि फिल्म में ‘चरम सुख’ जैसे हिन्दी के शालीन शब्द का मजाक उड़ाती अल्ट्रा मॉडर्न नारी पात्रों के मुँह से वो तकिया कलामनुमा गालियाँ सुनने को मिल सकती हैं जो प्रायः पुरुषों द्वारा उत्तेजना में बकी जाती हैं. लेकिन गालियों से भी ज्यादा सन्न रह जाने वाले आपत्तिजनक दृश्यों की भरमार ने परिवार के साथ फिल्म देखने की सहज पेशकश को शर्मसार कर के रख दिया. असल में निर्माताओं ने बड़ी चतुराई से फिल्म के टाइटल ‘वीरे दी वेडिंग’ से आम दर्शकों को भरमाने का प्रयास किया. सामान्य दर्शकों को लगा कि डेविड धवन मार्का फिल्म में उन्हें किसी वैवाहिक प्रसंग में बरसों बाद मिली चार सहेलियों के धमाल की सिचुएशनल कॉमेडी देखने को मिलेगी. उन्हें क्या पता था कि लम्पट दुकानदार जाने-अनजाने में चाकलेट के रैपर में कंडोम थमाकर उनकी बुरी तरह भद पिटवाएगा.

कहा जा सकता है कि जब फिल्म केवल वयस्कों के देखने योग्य थी तो इतना हंगामा क्यूँ खड़ा किया जा रहा है. वह भी उस युग में जो करोड़ों भारतीयों की हथेली में समाये मनोरंजन पटल पर ‘सब कुछ’ देखने की निजता के ‘अच्छे दिन’ लेकर आया है. ऐसे में फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिये सेंसर बोर्ड द्वारा विभिन्न श्रेणियों के सर्टिफिकेट जारी करने की कवायद मौजूदा दौर में बेमानी सी लगने लगती है. मगर यहाँ मुद्दा सेंसर बोर्ड की प्रासंगिकता या उसके औचित्य पर पश्न चिन्ह लगाने का नहीं है. विचारणीय बिंदु यह है कि जिस फिल्म को देखने में परिवार तो दूर पति-पत्नी को भी शर्म महसूस हो उसे बनाने वालों और उसमे काम करनेवालों को शर्मिंदगी का अहसास क्यूँ नहीं..?

खासकर तब, जब उसके निर्माताओं में बॉलीवुड के दो प्रतिष्ठित परिवारों की माँ-बेटी (शोभा कपूर व एकता कपूर) और बाप-बेटी (अनिल कपूर व रिया कपूर) का नाम जुड़ा हो. असल ज़िन्दगी में माँ, बहन और बीवी के रिश्तों का परम सुख उठा चुकीं करीना कपूर खान के लिये ‘वीरे दी वेडिंग’ में काम करना क्या वाकई सुखद अनुभूति माना जा सकता है..! क्यूँ कर्तव्यपरायण ‘नीरजा’ की दिलेरी को आत्मसात कर राष्ट्रीय नारी गौरव बढाने वाली सोनम कपूर की जुबान हलकट अंदाज़ में गालियाँ बकते हुए जरा भी नहीं लड़खड़ाई..? नौसेना के रिटायर्ड कमोडोर की सुशिक्षित बेटी और भावप्रवण अभिनय से शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल और दीप्ति नवल की याद दिलाने वाली स्वरा भास्कर ने अति उत्साह में हस्त मैथुन का जो सर्वाधिक लजाने वाला सीन किया है, क्या वह अर्जित प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने वाला आत्मघाती कदम नहीं है..!
दरअसल फिल्म के विवादास्पद ट्रीटमेंट, आपत्तिजनक दृश्यों और अश्लील संवादों को लेकर सोशल मीडिया में मचे बवाल से फिल्म को और अधिक पब्लिसिटी मिली. ऐसे में निर्देशक शशांक घोष का धनपशुओं द्वारा शादी में अनाप-शनाप खर्च और पानी की तरह पैसा बहाकर दिखावे की प्रवृत्ति, तथाकथित उच्च वर्ग के संभ्रांत परिवारों में नशाखोरी के बढ़ते चलन और नारी स्वातंत्र्य के नाम पर विवाह जैसे धार्मिक संस्कारों और रिश्ते-नातों को खोखला बनाते किरदारों के माध्यम से सामाजिक विकृतियों पर चोट करने का सदाशय हाशिये पर चला गया.

वो अभागी संजय लीला भंसाली की मनोयोग से बनायीं गई फिल्म ही थी जिसे रिलीज़ होने के पहले ही समाज के एक धड़े की अस्मिता, ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ और कानून व्यवस्था बिगड़ने के नाम पर प्रबल विरोध का सामना कर ‘पद्मावती’ से ‘पद्मावत’ हो जाना पड़ा. वर्ना ‘वीरे दी वेडिंग’ में एक नहीं बल्कि चार चार महिलाओं ने नारी अस्मिता को तार-तार करने की जो होड़ दिखाई है, उस पर न किसी रणबांकुरे सामाजिक संगठन का खून खौला.. न सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हुए.. न किसी सिनेमाघर में तोड़-फोड़ की गई. यहाँ तक कि खुद महिलाओं के मुखर संगठन भी मौन धारण किये रहे.

आखिर हमारे दोहरे सामाजिक चरित्र और गैर जिम्मेदाराना रवैये से कला के नाम पर धन बटोरने वाले निर्माताओं के हौसले और बुलंद क्यूँ न होंगे..! तो फिर आने वाले समय में बदलते समय के साथ बदलती बेशर्म हिन्दी फिल्मों में और अधिक बेहयाई झेलने अथवा उसके मज़े लेने के लिये तैयार रहिये. क्योंकि तमाम छीछालेदार और लानत मलामत के बावजूद सितारा नायक विहीन ‘वीरे दी वेडिंग’ ने बॉक्स ऑफिस पर तीन हफ्ते में 80 करोड़ रूपये से अधिक की कमाई कर समाज के दोहरे मापदंडों का खुलासा कर दिया है. सुनने में आ रहा है कि फिल्म की अपार सफलता से आत्ममुग्ध निर्माता मंडली इसका सीक्वल बनाने पर विचार कर रही है. बताया जा रहा है कि अबकी बार निर्देशन की जिम्मेदारी ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ फेम अलंकृता श्रीवास्तव को सौंपी जा सकती है. अगर ऐसा हुआ तो फिल्म का कंटेंट और टाइटल कितना बोल्ड होगा इसका अनुमान वे लोग आसानी से लगा सकते हैं जिन्होंने‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ में अलग अलग उम्र के नारी चरित्रों में दबी छुपी यौन इच्छाओं का ‘कुशल’ चित्रण देखा है.

(लेखक वरिष्ठ फिल्म समीक्षक हैं और आकाशवाणी-दूरदर्शन में रीजनल न्यूज़ हेड रह चुके हैं)
ई-मेल: vinodnagar56@gmail.com मोबाइल: 9425437902



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