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पांच राज्यों में चुनाव का ऊंट किस करवट बैठेगा

तो चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के चुनाव का बिगुल बजा दिया। नोटों का वापसी के बाद यह पहला चुनाव है। इसलिए भी इसका महत्व है, क्योंकि कुछ लोग इसे नोटवापसी पर जनता की राय के रूप में देखेंगे। देश के करीब 16 करोड़ मतदाता कुल 690 विधानसभा चुनावों के लिए मतदान करने वाले हैं। इस तरह देखा जाए तो यह देश के कुल मतदाताओं के करीब 21-22 प्रतिशत की भागीदारी वाला चुनाव है। लोकसभा की दृष्टि से देखा जाए तो 102 लोकसभा क्षेत्र इसमें आते हैं। भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के लिए इसका महत्व इस मायने में समझा जा सकता है कि इसमें से अकेले उसके पास 80 तथा सहयोगियों को मिलाकर 86 सीटे हैं। यानी 102 में से विपक्ष के पास केवल 16 सीटें हैं। नरेन्द्र मोदी सरकार ढाई साल से ज्यादा समय तक सत्ता में रह चुकी हैं। यानी केन्द्र सरकार की आधी समय सीमा पूरी होने के बाद चुनाव हो रहा है। जाहिर है, इस चुनाव में भाजपा और साथी दलों के प्रदर्शन को लोग केन्द्र सरकार के प्रदर्शन के संदर्भ में जनता की संतुष्टि-असंतुष्टि से जोड़कर देखेंगे। तो भाजपा के लिए इस चुनाव का महत्व साफ है।

देश की दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस के लिए भी ये चुनाव इस मायने में महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि 2013 से उसकी पराजय का सिलसिला रुका नहीं है। बिहार चुनाव में उसकी 27 सीटों को गठजोड़ का परिणाम माना गया। अगर उसका प्रदर्शन बेहतर नहीं हुआ तो फिर ये माना जाएगा कि कांग्रेस की पुनर्वापसी की अभी शुरुआत नहीं हुई है। अगर उसने अच्छा प्रदर्शन किया तो उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा और कांग्रेस ज्यादा आक्रामकता से भाजपा को घेरने की कोशिश करेगी। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के लिए तो यही चुनाव है जिसमंें वह अपनी शक्ति दिखा सकती है। आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनाव के बाद पहली बार गोवा और पंजाब में अपनी शक्ति का आकलन कर रही है। इस चुनाव से इसका परीक्षण भी हो जाएगा कि आम आदमी पार्टी का दिल्ली के बाहर विस्तार की संभावना कितनी है। इसमें उसकी सफलता अन्य राज्यों में भी उसे चुनाव लड़ने के लिए उत्साहित करेगा और सफलता नहीं मिली तो फिर उसे अपने बारे में पुनर्विचार करना होगा।

इस प्रकार पांच राज्यों के चुनाव का महत्व समझा जा सकता हैं। स्वाभाविक ही 403 विधानसभा तथा 80 लोकसभा क्षेत्रों वाले उत्तर प्रदेश का महत्व सबसे ज्यादा है। सत्तारुढ़ सपा की आपसी कलह ने उसके वर्तमान चुनावी भविष्य पर तत्काल प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया है। हालांकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के समर्थक उनकी छवि, विकास के उनके दावे, संगठन पर उनकी पकड़ एवं परंपरागत सामाजिक समीकरणों के आधार पर चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद जता रहे हैं। कानून व्यवस्था के स्तर पर लचर प्रदर्शन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी रही है। परिवार के झगड़े ने यह छवि बनाई है कि सपा वास्तव में समाजवाद के नाम पर एक परिवार के अंदर सिमटी हुई पार्टी है जिसके लिए केवल सत्ता का महत्व है। अगर विपक्षी पार्टियां इसे मुद्दा बनातीं हैं और जनता के मन में उतारती हैं तो इसका प्रतिकूल असर उस पर पड़ सकता है।

बसपा ने सबसे पहले अपने उम्मीदवारों की घोषणा की। बसपा प्रमुख मायावती ने चुनाव की घोषणा तक सबसे ज्यादा बड़ी सभाएं की हैं। पिछले दो चुनावों में दलितों और ब्राह्मणों का सामाजिक समीकरण बनाने की जगह इस बार उन्होेंने आरंभ में दलितों और मुसलमानों का समीकरण बनाने की कोशिश की। अभी भी वे इसी पर जोर दे रहीं हैं। हालांकि धीरे-धीरे उनके अंदर असमंजस पैदा हुआ और वे फिर से ब्राह्मणों और पिछड़े वर्ग की उन जातियों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हैं जिन्होंने पहले उनका साथ दिया था। इसमंे वे कितना सफल होंगी देखना होगा। लेकिन पार्टी से बड़े नेताओं का निकलकर भाजपा में जाना उनके लिए बड़ा धक्का है और यह उनकी चुनावी नियति को निश्चय ही प्रभावित करेगा।

कांग्रेस ने आरंभ से जोड़ लगया, प्रशांत किशोर की कंपनी को भाड़े पर लिया, राहुल गांधी की एक महीने यात्रा हुई, खाट सभाएं हुईं, शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तथा राज बब्बर को अध्यक्ष बनाकर ब्राह्मणों और पिछड़ों का समीकरण साधने की कोशिश हुई। बावजूद इसके उसकी स्थिति 2012 से बेहतर होने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। भाजपा ने मुख्यमंत्री के रुप में किसी का चेहरा सामने नहीं रखा है। जाहिर है, उनका मुख्य चेहरा नरेन्द्र मोदी ही हैं। वह परिवर्तन का नारा दे रही है। लोकसभा चुनाव में रिकॉर्ड प्रदर्शन केे बाद उनके लिए यह दूसरा परीक्षण है। बसपा, सपा और कांग्रेस सभी दलों से नेता उसके पाले में आए हैं। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष रीता बहुगुणा ही भाजपा में शामिल हो गईं। लोकसभा चुनाव में लोगों ने जातीय सीमाओं को तोड़कर उसे मत दिया था। तभी उसे 42.30 प्रतिशत मत आए। लेकिन वह मोदी लहर का परिणाम था। वैसा लहर इस बार नहीं है। यहां ध्यान रखने की बात है कि 2007 एवं 2012 में भाजपा बहुत कम जगह पर लड़ाई में थी। इसलिए चुनाव मुख्यतः सपा बनाम बसपा ही हो गया था। इस बाद वह लड़ाई में है और उसके पक्ष में भी एक व्यापक समीकरण है। अगर मुसलमानों ने उसके खिलाफ एकपक्षीय रणनीतिक मतदान किया तो प्रतिक्रिया में दूसरे पक्ष भी ऐसा कर सकते हैं।

उत्तराखंड की ओर आएं तो वहां मुख्य लड़ाई भाजपा एवं कांग्रेस के बीच हमेशा रही है। पिछली बार भी किसी को बहुमत नहीं था और दोनों पार्टियों में केवल एक सीट का ही अंतर था। इस बार कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री हरीश रावत के रुप में एक चेहरा है। उनकी निजी लोकप्रियता जनता के बीच है। हालांकि कांग्रेस में उनकी शैली के विरुद्ध विद्रोह हुआ और 10 विधायकों ने पाला बदला। 70 विधानसभा वाले राज्य में जहां एक-एक विधायक का महत्व है। 10 बहुत बड़ी संख्या होती है। यद्यपि उनकी सरकार कायम है, पर विद्रोही भाजपा के पाले में हैं और चुनाव में वे अपना रंग दिखाएंगे। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी हैं।

हरीश रावत अपनी छवि से उनके प्रभाव को कितना रोक पाएंगे इसी पर कांग्रेस की चुनावी नियति तय होगी। भाजपा ने यहां भी किसी चेहरे को सामने नहीं रखा है। वह हरीश रावत सरकार पर भ्रष्टाचार और अविकास का आरोप लगाकर चुनाव में उतरी है। भाजपा में अभी तक कलह और फूट नहीं दिखाई दिया है। हालांकि टिकट बंटने के बाद क्या होगा नहीं कहा जा सकता है। किंतु इस समय पार्टी एकजुट दिख रही है। पिछले चुनाव में बसपा ने 3 सीटें जीतकर चुनाव का रुख बदला था। इस बार वहां उसका क्या प्रदर्शन होता है देखना होगा। लेकिन बसपा के मत काटने का असर दोनों मुख्य दलों पर होगा। वैसे तो उत्तराखंड क्रांति दल भी मैदान में है, पर उसका असर 3-4 सीटों तक ही सीमित है।

पंजाब एक ऐसा राज्य है जहां उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा घमासान देखने को मिल रहा है। 10 वर्षों से सत्तारुढ़ अकाली और भाजपा के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान की बात है। कांग्रेस ज्यादा उत्साह में है। भाजपा से नवजोत सिंह सिद्धू दंपति का आना उसे महत्वपूर्ण लगता है। पिछले विधानसभा चुनाव में भी वोटों के बहुत कम अंतर से फैसला हुआ था।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भले 13 में से केवल 3 सीटें आईं लेकिन उसे मत अकाली भाजपा से ज्यादा आया। आम आदमी पार्टी ने 30 प्रतिशत मत एवं 4 लोकसभा स्थान पाकर पहली बार प्रदेश में अपने जनाधार का प्रमाण दिया। उसे दलित मतों पर भरोसा है जिसका बहुत ज्यादा संख्या पंजाब में है। हालांकि आप अंतर्कलह और टूट का शिकार हो चुकी है। इस कारण उसके चुनाव प्रदर्शन को विश्लेषक बहुत उम्मीद से नहीं देख पा रहे हैं। एक आकलन यह है कि वह जितना मत काटेगी वह सत्ता विरोधी रुझान वाला मत ही होगा। तो क्या वह कांग्रेस के हिस्से आने वाला मत काटेगी? अगर आप मैदान में नहीं होती तो ये सारे वोट संभवतः कांग्रेस के खाते में आते। कांग्रेस और आप दोनों ने अकाली भाजपा के विरुद्ध मादक द्रव्यों को बढ़ावा देने, भ्रष्टाचार, हथियारों की तस्करी, बेरोजगारी, विकास न करने आदि का आरोप लगया है। मादक द्रव्यों का अवैध व्यापार पंजाब में बहुत बड़ा मुद्दा है, क्योंकि इसने पंजाब के समाज को बुरी तरह प्रभावित किया है।

गोवा और मणिपुर छोटे राज्य हैं। गोवा बचाना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है। वह वहां कलह का शिकार है। संघ के पुराने कार्यकर्ता सुभाष वेलेंकर अलग दल बना चुके हैं और भाजपा से काफी संख्या में लोग उनकी ओर गए हैं। महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी के सुधीर धवलीकर तक अलग ताल ठांेक रहे हैं। आम आदमी पार्टी यहां भी किस्मत आजमा रही है। नरेन्द्र मोदी ने मनोहर पर्रीकर को केन्द्र मंे लाकर एक जोखिम लिया था। लक्ष्मीकांत पार्सेकर की छवि पर्रीकर जैसी नहीं है। इसका खामियाजा उसको कितना भुगतना होगा कहना कठिन है। मणिपुर अभी तक कांग्रेस का गढ़ रहा है। विधानसभा चुनाव में बहुमत के बाद लोकसभा चुनाव में भी वहां की दोनों सीटें कांग्रेस ने ही जीती थी। इस बार नगा पीपुल्स फ्रंट और भाजपा का गठजोड़ उसे चुनौती दे रहा है। मणिपुर में हाल की हिंसा और अशांति के कारण मतों का ध्रुवीकरण होने की संभावना बताई जा रही है। भाजपा असम की विजय तथा अरुणाचल में दल बदल से बनी सरकार के बाद से काफी उत्साह में है। वह मणिपुर को अपने झंडे तले लाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। कांग्रेस को यहां अपनी सरकार बचाने के लिए काफी कुछ करने की जरुरत है।

अवधेश कुमार, ई:30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092,दूरभाषः 01122483408, 9811027208



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