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किसको मिल रहा है किसानों की कर्ज़ माफी का फायदा

आज की बात में एक अभिन्न मित्र जो बैंक अधिकारी है, बयां है उनकी व्यथा उन्हीं के शब्दों में-

हाल ही में कर्ज वसूली की टीम का हिस्सा बना। बैंकों का पैसा डूबना एक बड़ा सच है, दूसरा सबसे बड़ा सच लोगों का चारित्रिक पतन होना है। वर्चस्व की राजनीति में नेताओं को समर्थन जुटाने के लिए पैसे कबाड़ने नहीं पड़ते बैंक से कर्ज दिलवाओ और बोल दो कि तुम्हें नहीं चुकाना है, कर्ज माफी हो जायेगी। छीकडा बैंक वालों पर फोड़ दो कि गलत लोन दिया और पैसे डूब गए।
सच मानिए चूककर्त्ताओं के सामने मुझे अपना मोबाइल निकालने में शर्म आती थी, क्योंकि उनके पास चमचमाती मोटर सायकल, मंहगे मोबाइल, घर पर फ्रिज कूलर रंगीन टी वी और डी टी एच कनेक्शन वगैरह सब दिखे, घरों से कुकर की सीटी भी सुनने को मिली याने खाना भी पक़ रहा था मगर कर्ज चुकाने को पैसा नहीं था।

मै स्तब्ध हुआ जब एक चूककर्ता ने 150000 के कर्ज को 10000 में सेटल कर वन टाइम सेटलमेंट का प्रस्ताव दिया। उसकी दूकान/शो रूम शहर के व्यस्ततम चौक पर था। पता चला था कि उसने हमारे बैंक का तो डिफाल्ट किया ही एक दूसरे बैंक से भी दो लाख का नया कर्जा ले लिया। उसकी दुकान में तीन कर्मचारी काम कर रहे थे। सी सी टी वी कैमरा लगा था, कूलर और टी वी भी चल रहा था। बात चीत में पता चला कि बच्चे शहर के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ रहे हैं।
गुस्सा इतना आया कि पकड़ कर चौक में खड़ा करके इसे जलील किया जाए कि उधार के टुकड़ों पे मीनार खडी कर ली और चुकाने के नाम पर नीयत खराब है। हमने उससे यह तक कह दिया कि भाई तुमने हमें एक आफर दिया 10000 में 150000 के खाते को बंद करने का अब मेरा भी एक आफर सुन लो, हम तीन लोगों को 100 रूपये वाली तीन सेट चप्पल 10 रूपये प्रति सेट बेच दो बाकी तुम बट्टे खाते में डाल लेना। दांत निकाल दिए मगर कहीं कोई आत्मग्लानी उसके चेहरे पर नहीं दिखी।

बैंक बंद हो जायेंगे या चलेंगे मुझे नहीं पता, हमें हमारी बढी हुई तनख्वाह मिलेगी या नही हमें नहीं पता पर राजनीति ने इस देश के हर नागरिक का चरित्र बिगाड़ दिया। वह यह नही समझ पाया कि बैंकों में सरकार का नहीं आम जनता का पैसा होता है। कर्ज माफी की बुनियाद साल दर साल के बजटरी प्रोवीज्न्स होते हैं। सच मानिए यदि यह स्थिति जारी रही तो देश में पेट्रोल 150-200 रूपये तक बिकेगा क्योंकि लोग डायरेक्ट टेक्स देते नहीं लेकिन तफरी के लिए पेट्रोल जरूर खरीदेंगे और सरकार अपना रेवेन्यू जनरेट करती रहेगी। कर्ज माफ़ करती रहेगी। बैंकों पर गलत कर्ज बांटने का आरोप लगाती रहेगी। निजीकरण का खौफ दिखाकर अपना उल्लू सीधा करती रहेगी। मन बहुत बेचैन हुआ, हमारी मंजिल यह तो नहीं थी जहां हमें लाकर खडा कर दिया गया।

पढ़कर सोचिएगा जरूर कि क्या हमारा देश सही दिशा में जा रहा है???



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