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उत्तरदायी कौन प्रकाशक या रचनाकार

जब हर तरफ रचनाकारों का शौर है, हाहाकार मचा हुआ है हिन्दी के लेखकों का, कवियों की भरमार है, हजारों लघुकथाकार और कहानीकार है, रोज नया सृजन हो रहा है, सैकड़ों रचनाएँ रोज लिखी जा रही है, साहित्य की समृद्धता की ओर कदम दिन-प्रतिदिन बढ़ रहें है, प्रकाशन की क्रांति आई हुई है, प्रकाशकों की बाढ़ भी कही कम नहीं, हजारों ऑनलाइन मंच है जहाँ रचनाएँ प्रकाशित हो रही है, बीसियों संस्थाएं सक्रियता से हिन्दी के प्रति अपनी चिंता व्यक्त कर रही है, रोज सोशल मीडिया पर सम्मान बाँटने या कहें बेचनेवालों की भरमार है, किताब प्रकाशन पर सम्मान, रचना लिखने पर सम्मान, बड़े-बड़े नाम और हजारों काम, पांच सौ रुपये से लेकर पांच हजार तक में छपने वाले साझा संग्रह, आलेख सम्मिलित करने वालों के रोज आते विज्ञापन और रोज नई बनती हिन्दी विकास की संस्थाएं भी मिल कर हिन्दी के सृजनकर्ताओं की वास्तविक समस्याओं का निदान करने में खुद को निरीह मान रही है। इतना समृद्धशाली हिन्दी का समुदाय भी पाठक पैदा करने में खुद को असमर्थ ही पा रहा है। आखिर क्यों ?

निश्चित तौर पर फेसबुक, व्हाट्सअप और सोशल मीडिया के आ जाने से हिन्दी के सृजनकर्ताओं की संख्याओं में निरंतर बढ़ोतरी तो हुई है, इसमें कोई संशय नहीं किन्तु उसी रफ़्तार से हिन्दी ने अपना पाठक परिवार कमजोर किया है यह भी सत्य है। हिन्दी के लिए रोज बनती और कार्यरत संस्थाओं को आई हुई बाढ़ भी धरातल पर हिन्दी को उन्नत और सशक्त बनाने में कमजोर साबित हो रही है।

जिस तरह भारत में अभियंताओं (इंजीनियर्स) की बढ़ती बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार कुकुरमुत्ते की तरह खुलने वाले इंजीनियरिंग कालेज और गुणवत्ताहीन चयन मापदंड और स्तरहीन पाठ्यक्रम जिम्मेदार माना जाता है उसी तरह हिन्दी के पाठकों को दूर करने में हिन्दी के वो प्रकाशक जो सेल्फ पब्लिशिंग का नाम देकर स्तरहीन पाठ्य सामग्री परोसने का व्यापार कर रहे है, हिन्दी की वो संस्थाएँ जो आयोजन और सम्मान बाँटने का कार्य कर रही है, वो अंतरताने (वेब पोर्टल) जो केवल खानापूर्ति के लिए केवल रचनाकारों को जोड़कर संख्याबल तो बड़ा रहें है पर गुणवत्ता युक्त सामग्री के प्रचार प्रसार और पाठकों में वृद्धि करने के कार्य से कोसो दूर है, उन सब को जिम्मेदार माना जाना चाहिए।

एक समय था जब देश में इंजीनियरिंग कालेजों को उँगलियों पर ही गिना जा सकता था, कठिन प्रवेश परीक्षा के माध्यम से उच्चस्तरीय विद्यार्थियों का चयन किया जाता था, सटीक पाठ्यक्रम और स्तरीय शिक्षकों के माध्यम से उन विद्यार्थियों को तराश कर उद्योगों के लिए उपयुक्त कार्य करने वाले खरे सोने के रूप में तैयार किया जाता था, तब उद्योग भी उन महाविद्यालयों से विद्यार्थियों का चयन कर उन्हें नौकरी उपलब्ध करवाते थे और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में लोग भी कम प्रवेश लेते थे और बेरोजगारी नगण्य थी। किन्तु बीते दशकों में देश में इंजीनियरिंग कालेजों की बाढ़ आ गई है, सीट अधिक और विद्यार्थी प्रवेश परीक्षाओं के माध्यम से कम होने लगे तो सरकारों ने प्रवेश परीक्षा महज औपचारिकता कर दी, 12वी कक्षा में चयनित विषय में उत्तीर्ण होने को आधार बना कर महाविद्यालयों में प्रवेश देना आरम्भ कर दिया। उसी का आज दुष्परिणाम यह है कि औद्योगिक इकाइयों को गुणवत्ता युक्त छात्र या कर्मचारी भी प्राप्त नहीं हो रहें, न ही महाविद्यालयों से उत्तीर्ण बच्चों को नौकरी मिल रही है। अब शेष बेरोजगार इंजिनियर खुद का व्यापार भी नहीं कर पाते क्योंकि अध्ययन और पाठ्यक्रम में स्वरोजगार जैसी अवधारणाएं पढाई ही नहीं जाती, वो वही देश में बेरोजगारी की चिल्ल पो मचाते रहते है और देश के लिए भी कारगार सिद्ध नहीं हो पा रहे है। यही हाल हिन्दी की रचनाधर्मिता और पाठक परंपरा के साथ घटित हो रहा है।

लाखों की तादाद में रचनाकार उपलब्ध है, हजारों की तादाद में प्रकाशन और पोर्टल है, फिर भी पाठक कहाँ? पहले रचना की गुणवत्ता के आधार पर पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशन हेतु चयन होता था, चयनित रचनाओं पर मानदेय दिया जाता था, क्योंकि पाठक भी किताबें खरीद कर पढ़ता था, और यदि किताबें प्रकाशित भी होती थी तो उच्चस्तरीय प्रकाशक अपने सम्पादकीय मंडल और विपणन (मार्केटिंग) विभाग के सामंजस्य से चयनित पांडुलिपियों का चयन कर गुणवत्तायुक्त किताबों का प्रकाशन करते थे जिससे पाठकों तक स्तरीय सामग्री पहुँचती थी। तब लेखक बेरोजगार कम और स्वाभिमानी अधिक थे। किन्तु आज के दौर में हिन्दी की रचनाधर्मिता अपने हाथ में अफ़सोस की मशाल थामें देश में हाहाकार ही मचा रही है। बिना चयन के केवल खानापूर्ति के लिए साहित्य अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं में छपने लग चुका है, कीमत अदा करके कुछ भी किताबों की शक्ल में छपवाया जा सकता है। और किताब के लिखते ही साहित्यकारों की जमात में शामिल होकर 100 रूपये से लेकर 5000रूपये, 10000 रुपये देकर संस्थाओं से सम्मान भी ख़रीदे जा सकते है। रोज फेसबुक/ व्हाट्सअप पर खोखली वाह-वाही लूटने के उद्देश्य से सम्मानों की ख़बरों को साझा किया जा रहा है। इससे आख़िरकार देश में बेरोजगार और गरियाने वाली साहित्यिक जमात ही बन रही है जो भविष्य में हिन्दी भाषा की अवनति का कारक भी बनेगी। और भविष्य उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा क्योंकि इसी दौर के कारण कल हिन्दी के गिरते स्तर पर परिचर्चा होगी और हिन्दी गिरेगी।

बहरहाल एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि इस स्थिति को कैसे काबू में करें? प्रकाशकों और दुकानदार संस्थाओं का काम तो व्यापार है उन्हें व्यापार से मतलब है इसलिए वो तो कभी इस दिशा में बात भी नहीं करेंगे किन्तु क्या रचनाकार का दायित्व नहीं की वो हिन्दी के उत्थान के लिए कार्य करें? मेरा प्रश्न यह भी है कि कितने ऐसे प्रकाशक या रचनाकार है जिन्होंने अपने जीवनकाल में 100 ऐसे पाठक तैयार करें जो कभी पुस्तक या हिन्दी साहित्य नहीं पढ़ते थे किन्तु उनकी प्रेरणा से अब वो हिन्दी के पाठकों में शामिल हो गए। सैकड़ों प्रकाशक, पत्र -पत्रिकाएँ और वेबसाइटें तो रचनाकार तैयार कर रही है किन्तु पाठक कौन पैदा कर रहा है?

मान लीजिये यदि हिन्दी के 50000 रचनाकार मिलकर केवल 100-100 नए पाठक भी तैयार करेंगे तो आगामी कुछ वर्षों में हिन्दी के पाठकों की संख्या में लाखों का इजाफा होगा। यकीन मानिए आने वाली पीढ़ी आप सक्रीय योद्धाओं के योगदान से जीवित और संचालित होगी और निश्चित तौर पर हिन्दी की असल उन्नति दिखने लगेगी।

यदि हिन्दी की संस्थाएँ, प्रकाशक, पत्र -पत्रिकाएं, संपादक, पत्रकार, अंतरताने, हिन्दीयोद्धा मिलकर केवल यह संकल्प ले लें कि अपने जीवन काल में हम कम से कम 100 ऐसे नए लोग तैयार करेंगे जो पुस्तक पढ़ना तो जानते है पर पढ़ते नहीं है, उन्हें पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरणा देंगे, अनिवार्यतः उनसे पुस्तकों, रचनाओं के लेकर चर्चा करेंगे, प्रतिक्रिया प्राप्त करेंगे, प्रेरित करेंगे, पुस्तकों का महत्व समझा कर उन्हें जागरूक करेंगे, कुल मिलकर उनके मार्गदर्शक बनकर उन्हें अच्छा पाठक बनाएंगे और हिन्दी की असल उन्नति के खुद भी कारक बनेंगे।

यक़ीनन ऐसा यदि प्रत्येक रचनाकार करने लग जाए तो उन रचनाकारों को भी सस्ते प्रकाशकों और पत्र पत्रिकाओं की आवश्यकता ही नहीं होगी, जो पैसे लेकर केवल किताब छापते और सम्मान बाँटते है, बदले में रचनाकार की प्रसिद्धि की तरफ सोचते भी नहीं, बहाने या कहें योजना बना-बना कर लेखकों से कभी संग्रह तो कभी पुस्तक प्रकाशन के नाम पर पैसे ऐंठते रहते है, न ही उन संस्थाओं की जरूरत होगी जो हिन्दी की मशाल उठाने का दम भर रही है या रोज नई खुल रही हिन्दी प्रेमी संस्थाएं जो खोखले दिखावे और आयोजनों तक ही सीमित है। हिन्दी का अपना पाठक समुदाय होगा, जो धरातल पर कार्य करेगा, लेखकों की असल पूछपरख होगी, न की ख़रीदे हुए सम्मान के कारण खोखली आमद। पाठक बढ़ेंगे तो किताबें भी बिकेगी, लेखकों को भी रोजगार या आमदनी मिलेगी, और जब दाने पानी का बंदोबस्त होगा तो गुणवत्तायुक्त सामग्री भी पढ़ने को मिलेगी, खोखली और स्तरहीन सामग्री पाठकों के द्वारा खुद-बखुद ख़ारिज हो जाएगी और इसी से राष्ट्र को मौलिक और सशक्त चिंतन मिलेगा, क्योंकि ‘पढ़ेगा भारत तभी तो बढ़ेगा भारत’।

डॉ अर्पण जैन ‘अविचल’
पत्रकार एवं स्तंभकार
संपर्क: 09406653005
अणुडाक: [email protected]
अंतरताना:www.arpanjain.com

[लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान,भाषा समन्वयआदि का संचालन कर रहे हैं ]



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