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तो लद्दाख और जम्मू की सुध कौैन और कब लेगा?

अपने नेता श्रीनगर से खाली हाथ लौट आए। इन्हें मालूम हुआ कि घाटी के जिन आंदोलनकारियों से संवाद करने, उनके लिए सियासी समाधान निकालने की बात कर रहे थे वे न तो कश्मीरियत वाले है, न इंसानियत वाले है और न जम्हूरियतपरस्त हैं। लेफ्ट के सीताराम येचुरी, डी राजा, जनता दल यू के शरद यादव आदि ने हुर्रियत नेताओं से मिलने की जब पहल की तो उन्हें भी टका सा जवाब मिला। अब जब ऐसा है तो क्या येचुरी,डी राजा, शरद यादव या गृह मंत्री राजनाथ सिंह को लेह जा कर क्या यह नहीं पूछना चाहिए कि घाटी के पांच जिले अमन नहीं चाहते। विकास नहीं चाहते तो ऐसे में वे क्या चाहते हैं? जाहिर है तब लद्दाख और जम्मू क्षेत्र का दो टूक फैसला होगा कि उन्हें तब घाटी के साथ नहीं रहना। उन्हंे अलग राज्य बनाएं। केंद्र शासित प्रदेश बनाए या नहीं तो कम से कम यह तो हो कि गौरखालैंड जैसी स्वायत्त परिषद् बना कर श्रीनगर के सचिवालय के लकवे से उन्हें मुक्ति दिलाएं।

मगर बीस पार्टियों के 25 नेताओं, सांसदों में से एक को भी यह सुध नहीं हुई कि श्रीनगर आए हं तो लेह भी चला जाए और वहां की बौद्व आबादी से पूछे कि वे क्या चाहते हंै? कहते हैं लद्दाख के एक जनप्रतिनिधी ने पिछले ही सप्ताह यह सवाल किया, पूछा कि जब हम हथियार उठाएंगे, हिंसा करेंगे तभी क्या हमारी सुध लेंगे?

हां, लद्दाख और जम्मू क्षेत्र के लोग अर्से से श्रीनगर की प्रशासनिक अव्यवस्था के मारे हैं। नेशनल कांफ्रेस का राज हो या कांग्रेस का या पीडीपी का, सभी का राज कश्मीर घाटी केंद्रीत रहा है। घाटी को संभालने, वहीं सब कुछ लुटा देने पर ही केंद्र सरकार का पैसा जाया होता है। ताकत जाया होती है। घाटी के उग्रवादियों, अलगाववादियों, हुर्रियत नेताओं और अब इस्लामी स्टेट के जिहादियों, आंतकवादियों से निपटने, उन्हें संभालने में जम्मू-कश्मीर राज्य के प्रशासन की 75-80 प्रतिशत ताकत, ऊर्जा, खर्च जाया होते है।

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जैसा मैंने पहले लिखा है कि राज्य के 22 जिलों में से घाटी के चार-पांच जिले हैं जिससे अशांति होती है। प्रदेश की कुल सवा करोड़ आबादी में से कश्मीर घाटी की 20 से 25 लाख वह आबादी है जिनके घर-परिवारों में से इस्लामी स्टेट, इस्लामियत के बीज फूटे हैं। इन्ही में से पिछले साल कोई 33 नौजवान हिजबुल मुजाहिदीन, लश्करे तैयबा जैसे संगठनों के लड़ाके बने। यही के 4-5 जिलों में बुरहान वानी ने अपना हल्ला बनवाया। पाकिस्तान, इस्लामी स्टेट के झंडे दिखलाए। यही यह जुनून है कि पत्थरबाजी से भारत राष्ट्र-राज्य को झुका देंगे।

क्या इनकी चिंता में खो कर भारत राष्ट्र-राज्य़ को जम्मू क्षेत्र और लद्दाख की चिंता नहीं करनी चाहिए? यह मैं फिर बता रहा हूं कि जम्मू-कश्मीर राज्य का 59 प्रतिशत इलाका लद्दाख का है और 26 प्रतिशत श्रेत्र जम्मू का। कश्मीर घाटी सिर्फ 15 प्रतिशत क्षेत्रफल लिए हुए है। जम्मू में कोई 64 प्रतिशत हिंदू है। उधर लद्दाख बौद्व बहुल है। मौटे तौर पर हिंदू, बौद्व, शिया, पहाड़ी, गुर्जर आदि के 14 धर्मसमूह व नस्लीय ग्रुप कुल आबादी में ऐसे हैं जो पत्थर फेंकने वालों, पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगाने वालों उग्रवादी- अलगाववादी संगठनों से न केवल दूर हैं बल्कि उनसे खुन्नस रखते हैं। उनसे नफरत करते हैं।

अब जब ऐसा है तो इतनी बड़ी आबादी को क्यों घाटी की अशांति का शिकार होने दिया जाए? प्रदेश की राजधानी श्रीनगर है। श्रीनगर में ही सचिवालय है। सचिवालय की सरकारी नौकरियों में घाटी के सुन्नी लोग भरे हुए हैं। इन्हंे न जम्मू के विकास की चिंता है और न लद्दाख के विकास की। ये दोनों इलाकों में भ्रष्टाचार की मनमानी करते हंै। गनीमत है जो अभी तक जम्मू और लद्दाख में लोगों ने इस बात पर अपना पत्थर फेंको आंदोलन शुरू नहीं किया कि उन्हें घाटी की जोर-जबरस्ती, हिंसा से आजादी मिले। कहते हंै लद्दाख में यह चिंगारी सुलग रही है कि केंद्र सरकार कब तक हमारी अनदेखी करेगी? लेह के भाजपा सांसद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिल कर उन्हंे चेताया है कि लद्दाख पर ध्यान दें नहीं तो हालात संभले नहीं संभलंगें।

यह स्वभाविक है। इसलिए कि लद्दाख या जम्मू के लोग कब तक घाटी के उपद्रव की कीमत चुकाते रहेंगे? श्रीनगर और उसके सचिवालय में क्योंकि सब ठप्प है तो जम्मू और लद्दाख में प्रशासन कैसे चुस्त हो सकता है या वहां से कैसे विकास होगा? दोनों विकास की संभावनाओं से भरे पूरे इलाके हंै। यदि लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश हो जाए तो अकेले पर्यटन में वह वैश्विक नक्शे में होगा। मगर क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर की अशांति के साथ नत्थी है तो पर्यटक वहां जाने से पहले दस बार सोचता है। ऐसे ही जम्मू क्षेत्र की विकास संभावनाएं हिमाचल प्रदेश से अधिक बेहतर है बेशर्ते वह श्रीनगर के सुन्नी बहुल प्रशासन से मुक्त हो।

कुल मिलाकर मसला यह है कि केंद्र सरकार और भारत के राजनैतिक दलों को अब घाटी के साथ समानांतर स्तर पर जम्मू और लद्दाख की भी चिंता करनी चाहिए। इसके दस तरह के प्रमाण है कि घाटी के पांच जिलों की अशांति ने पूरे प्रदेश व जम्मू और लद्दाख का जीना हराम किया हुआ है। केंद्र सरकार को खुद पहल करके मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती से यह सहमति बनवानी चाहिए कि जो अमन से जी रहे हैं वे घाटी की अशांति का खामियाजा न भुगते। यदि मेहबूबा यह स्टेंड ले कि पांच प्रतिशत उपद्रवियों की हिंसा को बरदास्त नहीं करेंगे। जम्मू व लद्दाख क्षेत्र के लिए नई स्वायत्त या प्रशासनिक व्यवस्था बनेगी। यह प्रयोग हिम्मत के साथ होना चाहिए। इससे एक तो उग्रवादियों, हुर्रियत नेताओं के होश उड़ेंगे। फिर यह इसलिए भी ठीक होगा कि लद्दाख और जम्मू को नए किस्म की स्वायतत्ता मिली तो वह कश्मीर घाटी के लिए आगे म़ॉडल बनेगा।

वक्त ऐसे नए, साहसी प्रयोग का है। भाजपा और मोदी सरकार कुछ तो नया और साहसी कर दिखाए।

साभार- http://www.nayaindia.com/ से

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