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वैदिक शिक्षा क्यों जरुरी है स्कूलों में एक सार्थक चर्चा

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’, दिल्ली मेंवेदों का बोध कराती किताब ‘वेदाज़- ए न्यू पर्सेप्शन’ की लॉन्चिंग हुई। डॉ. सत्यकाम भारद्वाज वैदिक रिसर्च फाउंडेशन की इस कॉफी टेबल बुक की लॉन्चिंग के अवसर पर पैनल डिस्कशन का आयोजन भी किया गया। पैनल डिस्कशन का विषय ‘स्कूलों में वैदिक शिक्षा को अनिवार्य किया जाना चाहिए या नहीं’, रखा गया था।

‘बिजनेसवर्ल्ड’ व एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ अनुराग बत्रा इस पैनल डिस्कशन के मॉडरेटर थे। पैनल डिस्कशन में सामाजिक कार्यकर्ता व पद्मश्री वीरेंद्र राज मेहता ने कहा कि यह सवाल बहुत ही प्रासंगिक है। जब बात होती है कि क्या वेद जीवन के लिए बहुत जरूरी है, तो मेरा मानना है कि ये सिर्फ हमारे देश कि लिए ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के लिए प्रासंगिक हैं। इसे स्कूलों में अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए।

CRIS (Center for Railway Information System) की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य विनीत गोयनका का कहना था कि वेदों का ज्ञान होना बहुत जरूरी है और इसे स्कूलों में अनिवार्य होना चाहिए।

‘द डिबेटिंग सोसायटी ऑफ इंडिया’ के फाउंडर व प्रेजिडेंट दीपक वर्मा का इस बारे में कहना था, ‘वैदिक शिक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम में जरूर शामिल करना चाहिए। बिना साहित्य व समाज के बच्चे कुछ नहीं कर सकते हैं। हमें भी ये समझना होगा कि पश्चिमी सभ्यता के कारण कई तरह की परेशानियां हो रही हैं। इसलिए वेदों से हमें काफी कुछ सीखने को मिलेगा।’

कार्यक्रम में पधारे आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु का कहना था, ‘वेद हमारी असली शक्ति हैं। ये विद यानी विदित, विद्वान धातु से बने हैं। मैं प्रख्यात दार्शनिक मैक्स मुलर के इस बयान से इत्तेफाक रखता हूं कि भारतीयों को यह पता ही नहीं है कि उनके पास कौन सा खजाना है। वेद ही साइंस हैं। इसमें 12000-13000 श्लोक सिर्फ श्लोक ही नहीं हैं, बल्कि विज्ञान का फॉर्मूला हैं। कहा जाता है कि भारत किसी जमाने में सोने की चिड़िया था, लेकिन मेरा मानना है कि वह बोध, ज्ञान और विद्या थी।’ ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैक्स मुलर’ ने कहा था कि भारतीयों के पास जरूर सोना बनाने का फॉर्मूला होगा। कहने का मतलब है कि वेद साइंस हैं।

पैनल डिस्कशन के दौरान वरिष्ठ पत्रकार भव्य श्रीवास्तव ने कहा, ‘वैदिक शिक्षा दरअसल नैतिक शिक्षा से संबंधित है। सरस्वती स्कूलों या सरकारी स्कूलों की बात करें तो हमारे सिस्टम में पहले से ही नैतिक शिक्षा का समावेश है। हमें ऐसा सिस्टम तलाशना होगा, जिससे बच्चों को नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ा सकें। आज की शिक्षा प्रणाली में वैदिक सिस्टम के लिए कुछ नई तरह से समझना होगा। समाज में नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है, गुरुकुल जैसी व्यवस्था तो आजकल संभव नहीं है, लेकिन मैं चाहता हूं कि नैतिक मूल्यों का पाठ जरूर पढ़ना चाहिए।‘

लेखिका विनीता बख्शी का कहना था, ‘मुझे लगता है कि आधुनिक भारतीय समाज में काफी बदलाव हो रहे हैं। हमें ये सोचना होगा कि कि वैदिक सिस्टम होने के बाद भी आखिर अवसाद के मामले क्यों बढ़ रहे हैं। हम बच्चों को इसलिए भेजते हैं, ताकि वहां उनका सर्वांगीण विकास हो सके। हमारा वैदिक सिस्टम इसमें काफी अहम भूमिका निभा सकता है। हालांकि मेरा मानना है कि यह अनिवार्य नहीं बल्कि वैकल्पिक होना चाहिए।’

इस दौरान साध्वी जया भारती का कहना था कि जब हम वैदिक शिक्षा की बात करते हैं तो उसका अर्थ सिर्फ वेदों से नहीं है। उन्होंने कहा, ‘समर्थ गुरु रामदास का कहना था कि शेरों का दूध सोने के पात्र में ही ठहरता है। कहने का मतलब है कि वेद अपने आप में सिस्टम हैं।’ साध्वी जया भारती का कहना था, ‘हमें ये समझने की जरूरत है कि आखिर वेद क्या हैं। यह वैदिक सिस्टम है। यह स्कूलों में अनिवार्य या वैकल्पिक करने का सवाल नहीं है, बल्कि इससे हमें अपनी मूलभूत पहचान दिलाने में मदद मिलती है। जब वेद लिखे गए थे, उस समय हिंदू नहीं, बल्कि सनातन धर्म था। हमें सिर्फ स्कूलों में ही नहीं, बल्कि सभी तरह से युवाओं को इस बारे में बताने की जरूरत है।’

श्रुति फाउंडेशन की फाउंडर डॉ. श्रुति नदा पोद्दार ने ऋग्वेद के श्लोक से अपनी बात शुरू करते हुए कहा, ‘वेद सिर्फ नॉलेज नहीं हैं, बल्कि ये सभ्यता व संस्कृति के बारे में सिखाने का तरीका है। हमें सिर्फ ऑप्शनल नहीं बल्कि इस बारे में स्कूल-कॉलेजों में जरूर बताना चाहिए।’

पैनल डिस्कशन में शामिल वरिष्ठ पत्रकार व भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष वेद प्रताप वैदिक का कहना था, ‘मैं दुनिया भर में घूमा हूं, लेकिन वेदों के बारे में इतने कम शब्दों में इतनी अधिक राय कहीं सुनने को नहीं मिली है। आज पहली बार अपने देश में देखने को मिल रहा है कि डार्बिन तक को चुनौती देने वाले मंत्री भी यहां बैठकर सुन रहे हैं।’

डॉ. वैदिक का कहना था, ‘मैं यही कहना चाहता हूं कि हमें सारी दुनिया को यह बताना चाहिए कि वेदों का किसी धर्म या संप्रदाय से कोई मतलब नहीं है। मनुष्य की सबसे पहली उपलब्धि वेद हैं। सिर्फ आस्तिक ही नहीं, बल्कि नास्तिकों को भी इनका पालन करना चाहिए। ये सिर्फ चार ग्रंथ, उपनिशद अथवा दर्शन ही नहीं हैं, बल्कि इन्हें मिलाकर वैदिक शिक्षा बनती है।’

उनका कहना था, ’अनिवार्यता का मतलब कमजोरी होता है, हमारा जीवन कंपल्शन से नहीं चलता है। कंपल्शन यानी कानून और कानून यानी कंपल्शन होता है। हालांकि कानून भी जरूरी होता है, लेकिन इस बारे में स्वेच्छा व सहमति से काम होना चाहिए। डॉ. वैदिक के अनुसार, ‘मेरा मानना है कि यदि हम वेदों का ठीक ढंग से प्रचार कर सकें और इन्हें फैला सकें तो यह अपने आप कंपल्शरी हो जाएगा।’

इस दौरान, ‘डॉ. सत्यकाम भारद्वाज वैदिक रिसर्च फाउंडेशन’ के फाउंडर दक्ष भारद्वाज का कहना था कि वेद सिर्फ धर्म से संबंधित नहीं हैं, यह उन सबसे परे हैं। दरअसल वेद विद्या हैं, जो आपको सभी कष्टों से मुक्त करती है।

साभार- http://www.samachar4media.com से



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