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हर काम के लिए किसानों की जमीन ही क्यों छीनी जाती है

कई साल पहले का एक वाकया मुझे याद आता है। तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक वार्षिक कॉर्पोरेट पुरस्कार समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे। उनके संबोधन के बाद वक्त दर्शकों की ओर से सवाल उठाने का आया। उद्योगपति आनंद महिंद्रा खड़े हुए और उन्होंने एक सवाल पूछा। सवाल कुछ इस तरह था – मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, आईआईएम से स्नातक करने वाले एक युवा को आज के माहौल को किस तरह देखना चाहिए, खासकर यह जानते हुए कि मौजूदा माहौल व्यावसायिक जगत को आकर्षित करने वाला नहीं है? इस सवाल पर मनमोहन सिंह ने जो जवाब दिया, उसका सार यह था कि हम विशिष्ट जोन बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि युवा उद्यमियों को जरूरी लाभ और समर्थन मिल सके। विशेष आर्थिक जोन एक ऐसा विचार है, जिसका समय आ चुका है।

एसईजेड एक्ट 2005 में पारित किया गया था। तब इसको लेकर माहौल में इस कदर उत्साह था कि भूमि अधिग्रहण को लेकर सभी किसान आंदोलनों को बिना कुछ सोचे-विचारे खारिज कर दिया गया था। सात वर्ष बाद एसईजेड एक खराब विचार के रूप में सामने आया। अब एक आर्थिक प्रकाशन के अनुसार एसईजेड वह विचार है, जिसका समय कब का निकल चुका है। अपने देश में एसईजेड के नाम पर जो भूमि अधिग्रहीत की गई, उसका पचास प्रतिशत से अधिक हिस्सा इस्तेमाल ही नहीं किया जा सका। जो कुछ हुआ भी, उससे रोजगार सृजन अथवा निर्यात बढ़ाने की दिशा में कोई लाभ हासिल नहीं हुआ। जिन एसईजेड को मंजूरी दी गई, उनमें से ज्यादातर रियल एस्टेट के लिए स्वर्ग बन गए हैं। उन्होंने उत्पादन क्रांति की दिशा में कोई योगदान नहीं दिया। इनका इस्तेमाल आईटी कंपनियों ने किया, ताकि उन्हें टैक्स में छूट का लाभ मिल सके। इसके लिए उन्हें बस अपने दफ्तर एसईजेड में स्थापित करने थे।

जून 2007 में संसद की एक स्थायी समिति ने 2005 से 2010 के बीच टैक्स रियायतों के चलते 1.75 लाख करोड़ के राजस्व नुकसान का अनुमान लगाया था। 2007 से 2013 के बीच एसईजेड के कामकाज का विश्लेषण करने वाली कैग रिपोर्ट को पढ़ते ही पता चल जाता है कि एसईजेड घोटाला कितना बड़ा है। जिन 576 एसईजेड परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, उनमें से 392 ही अधिसूचित हुईं और उनमें भी केवल 170 में काम चल रहा है। मौजूदा एसईजेड में 48 प्रतिशत एसईजेड ही निर्यात गतिविधियों में लगे हुए हैं और 2013-14 में कुल निर्यात का केवल 3.8 प्रतिशत ही इन क्षेत्रों से आया।

एसईजेड के विकास के लिए कुल 45,635 हेक्टेयर जमीन अधिसूचित की गई, पर केवल 28,488 हेक्टेयर में ही वास्तविक कामकाज शुरू हुआ। इसका मतलब है कि 62 प्रतिशत जमीन का ही इस्तेमाल किया जा सका। कैग ने अपनी सख्त प्रतिक्रिया में कहा है कि सरकार द्वारा लोगों से जमीन का अधिग्रहण संपत्ति के ग्रामीण क्षेत्रों से कॉर्पोरेट दुनिया में स्थानांतरण का बड़ा जरिया बन रहा है। एक ओर पचास प्रतिशत अधिग्रहीत जमीन बिना इस्तेमाल के पड़ी हुई है तो दूसरी ओर तमाम डेवलपरों ने अन्य औद्योगिक गतिविधियों में जमीन का इस्तेमाल आरंभ कर दिया है या वे रियल एस्टेट हब बना रहे हैं। कहीं-कहीं तो उन्होंने पैसा जुटाने के लिए जमीन को गिरवी रख दिया है।

कितना विचित्र है कि वाणिज्य मंत्रालय ने इस कुप्रबंधन और एसईजेड एक्ट के दुरुपयोग पर आंखें फेर ली हैं। मंत्रालय अब इस पर विचार कर रहा है कि डेवलपरों को भवन, स्कूल और अस्पताल उन लोगों को बेचने की अनुमति दे दी जाए, जो इन विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों से बाहर रहते हैं। जमीन का इस्तेमाल रिहायशी परिसरों के निर्माण के लिए भी किया जा रहा है अथवा ऐसी अन्य औद्योगिक गतिविधियों में, जिनकी एसईजेड एक्ट में अनुमति नहीं दी गई है।

सभी तरह की कर रियायतों का क्या मतलब है, इसका अंदाजा लगाने के लिए कुछ बातों को जान लेना जरूरी है। एसईजेड को पूरी तरह एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी, सेल्स टैक्स, मंडी टैक्स, टर्नओवर टैक्स से छूट दी गई। दस वर्ष के लिए आयकर से भी छूट दी गई। सौ फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए प्रावधान बनाए गए और इंफ्रास्ट्रक्टर कैपिटल फंड तथा व्यक्तिगत निवेश पर आयकर से छूट दी गई। साथ ही कंपनियों को चौबीसों घंटे बिजली-पानी आपूर्ति का आश्वासन भी दिया गया। एसईजेड प्रमोटरों को पर्यावरण प्रभाव आकलन न कराने की सुविधा भी प्रदान कर दी गई। यह समझ पाना मुश्किल है कि टैक्स रियायत में इतनी दरियादिली और भूमि का अंबार होने के बावजूद एसईजेड काम क्यों नहीं कर सके? यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि एक नया भूमि अधिग्रहण कानून केवल इस कारण लाया जा रहा है कि उद्योगों के लिए भूमि हासिल करने में जरूरत से ज्यादा देरी हो रही है।

अगर 45635 हेक्टेयर जमीन उपलब्ध होने और उस पर कर चुकाने की बाध्यता न होने के बावजूद उद्योग नाकाम साबित हुए तो क्या गारंटी है कि उद्योगों के लिए और जमीन जुटा लेने से उत्पादन के मामले में कोई क्रांति हो जाएगी? जिस हड़बड़ी में एसईजेड एक्ट पारित किया गया और जितनी सुगमता से वाणिज्य मंत्रालय ने नियम तैयार कर इसका क्रियान्वयन शुरू कर दिया, उसकी मिसाल मिलना कठिन है।

इससे पता चल जाता है कि आर्थिक नीतियां कैसे बनती हैं और उन पर अमल के लिए किस तरह जल्दबाजी में ढांचा तैयार कर लिया जाता है। इस तरह का घोटाला दोबारा न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए मेरे पास दो सुझाव हैं। सबसे पहले तो उस समय के वाणिज्य मंत्री और संबंधित अधिकारियों को एसईजेड स्कैंडल के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। दूसरे, गड़बड़ी करने वाली कंपनियों को काम सही तरह न कर पाने के लिए दंडित किया जाना चाहिए। उनसे जमीन और दूसरे संसाधनों की वसूली जुर्माने के साथ की जानी चाहिए। उद्योग जगत को अहसास कराया जाना चाहिए कि मुफ्त में उन्हें कुछ नहीं दिया जा सकता। इस तरह के सही संदेश से ही उद्योग जगत को सबक मिलेगा।

-लेखक कृषि व खाद्य मामलों के विशेषज्ञ हैं।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से 

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