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पाकिस्तान प्रथम कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल को पाकिस्तान क्यों छोड़ना पड़ा?

पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल (Jogendra Nath Mandal) का जन्म पूर्वी बंगाल के बरीसल जिले के मइसकड़ी में हुआ था. वह पिछड़ी जाति से थे, इनकी माता का नाम संध्या और पिता का नाम रामदयाल मंडल था, जोगेन्द्र नाथ मंडल 6 भाई बहन थे और ये सबसे छोटे थे. जोगेंद्र ने सन 1924 में इंटर और सन 1929 में बी. ए. पास कर पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पहले ढाका और बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय से पूरी की. सन 1937 में उन्हें जिला काउन्सिल के लिए मनोनीत किया गया. इसी वर्ष उन्हें बंगाल लेजिस्लेटिव काउन्सिल का सदस्य चुना गया. 1939-40 में वे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के करीब आये लेकिन जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि कांग्रेस के एजेंडे में उनके समाज के लिए ज्यादा कुछ करने की इच्छा नहीं है, इसलिए बाद में वह मुस्लिम लीग से जुड़ गये और कुछ दिनों में ही वह जिन्ना के खास बन गए.

पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल का जन्म पूर्वी बंगाल के बिरिसल जिले में 1904 में हुआ था, जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है. वह नामसूद्र समुदाय के थे और बड़े होकर उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त जाति व्यवस्था और छुआछूत के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन शुरू किया, मंडल ने 1937 के प्रांतीय विधानसभा चुनाव में एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में अपना राजनीतिक कैरियर शुरू किया. उन्होंने बखरागंज उत्तर पूर्व क्षेत्र (पूर्वी बंगाल विधान, वर्तमान बांग्लादेश) से चुनाव लड़ा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जिला समिति के अध्यक्ष सरकल कुमार दत्ता को पराजित किया जो कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार दत्ता के भतीजे थे, सुभाष चंद्र बोस और शरतचंद्र बोस ने मंडल को बहुत प्रभावित किया था. जब बोस को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया था तब मंडल मुस्लिम लीग के साथ जुड़ गए और मुस्लिम लीग के मुख्यमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी के मंत्रिमंडल में मंत्री बने.

जोगेंद्र नाथ मंडल ने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के साथ मिलकर अनुसूचित जाति संघ को पूर्वी बंगाल में स्थापित किया. उस समय पूर्वी बंगाल की राजनीति में दलित और मुस्लिम समुदाय का वर्चस्व था. मंडल ने सांप्रदायिक मामलों पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच अत्यधिक राजनैतिक अंतर पाया. जब 1946 में सांप्रदायिक दंगे फैल गए तब जिन्ना के कहने पर उन्होंने पूर्वी बंगाल के सभी क्षेत्रों में यात्रा किया और दलितों को मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में भाग न लेने के लिए तैयार किया. उन्होंने दलितों को समझाया कि मुस्लिम लीग के साथ विवाद में कांग्रेस के लोग दलितों को इस्तेमाल कर रहे हैं.

भारत विभाजन के बाद मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के सदस्य और अस्थायी अध्यक्ष बने और पाकिस्तान के प्रथम कानून और श्रम मंत्री बने. 1947 से 1950 तक वह पाकिस्तान की तत्कालीन राजधानी कराची में रहे, 1950 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को अपना इस्तीफा देने के बाद मंडल वापस भारत लौट आये. अपने इस्तीफे में मंडल ने पाकिस्तानी प्रशासन के हिंदू विरोधी कार्यों का विस्तृत हवाला दिया. उन्होंने अपने त्याग पत्र में सामाजिक अन्याय और अल्पसंख्यकों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार से संबंधित घटनाओं का विस्तृत उल्लेख किया.

जब पाकिस्तान बना तो मंडल के कहने पर लाखों दलित पाकिस्तान चले गये क्योंकि मंडल को विश्वास था कि मुसलमान उनका साथ देंगे और उन्हें अपनाएंगे लेकिन उनके साथ क्या हुआ, इसे जानना और समझना बहुत जरूरी है, 1946 में अंतरिम सरकार बनी तो कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने अपने प्रतिनिधियों को मंत्रीपद के लिए चुना और मुस्लिम लीग ने जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम भेजा. पाकिस्तान बनने के बाद मंडल को कानून और श्रम मंत्री बनाया गया क्योंकि वह मुहम्मद अली जिन्ना के बहुत करीबी थे और असम के सयलहेट को पाकिस्तान में मिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया था. 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट को जनमत संग्रह से यह तय करना था कि वो पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का. उस इलाकें में हिंदू मुस्लिम की संख्या बराबर थी. जिन्ना ने उस इलाके में मंडल को भेजा और मंडल ने वहां दलितों का मत पाकिस्तान के पक्ष में झुका दिया जिसके बाद सयलहेट पाकिस्तान का हिस्सा बना जो आज बांग्लादेश में है.

पाकिस्तान निर्माण के कुछ वक्त बाद ही गैर मुस्लिमो को निशाना बनाया जाने लगा. हिन्दुओ के साथ लूटमार, बलात्कार की घटनाएँ सामने आने लगी. मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई खत लिखे लेकिन सरकार ने उनकी एक न सुनी. जोगेंद्र नाथ मंडल को बाहर करने के लिये उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा. मंडल को इस बात का एहसास हुआ कि जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था अब वह उनके रहने लायक नहीं है. मंडल बहुत आहात हुए क्योंकि उन्हें विश्वास था पाकिस्तान में दलितों के साथ अन्याय नहीं होगा. लगभग दो साल में ही दलित-मुस्लिम एकता का मंडल का ख्बाब टूट गया. जिन्ना की मौत के बाद मंडल 8 अक्टूबर, 1950 को लियाकत अली खां के मंत्री मंडल से त्याग पत्र देकर भारत आ गये.

जोगेंद्र नाथ मंडल ने अपने खत में मुस्लिम लीग से जुड़ने और अपने इस्तीफे की वजह को स्पष्ट किया. मंडल ने अपने खत में लिखा, “बंगाल में मुस्लिम और दलितों की एक जैसी हालात थी, दोनों ही पिछड़े और अशिक्षित थे . मुझे आश्वस्त किया गया था मुस्लिम लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा और हम सब मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे जिससे साम्प्रदायिक शांति और सौहादर्य बढ़ेगा. इन्ही कारणों से मैंने मुस्लिम लीग का साथ दिया. 1946 में पाकिस्तान के निर्माण के लिये मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाया था. जिसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए. कलकत्ता के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत कई हिन्दुओ की हत्याएं हुई, सैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया. हिंदू महिलाओं का बलात्कार, अपहरण किया गया. इसके बाद मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया. मैने हिन्दुओ के भयानक दुःख देखे फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा.

14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने के बाद मुझे मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. मैंने ख्वाजा नजीममुद्दीन से बात कर ईस्ट बंगाल की कैबिनेट में दो पिछड़ी जाति के लोगो को शामिल करने का अनुरोध किया. उन्होंने मुझसे ऐसा करने का वादा भी किया लेकिन इसे टाल दिया गया जिससे मै बहुत हताश हुआ.

मंडल ने अपने खत में पाकिस्तान में दलितों पर हुए अत्याचार की कई घटनाओं जिक्र किया उन्होंने लिखा, “गोपालगंज के पास दीघरकुल में एक मुस्लिम की झूठी शिकायत पर स्थानीय नामशूद्र परिवारों के साथ क्रूर अत्याचार किया गया. पुलिस के साथ मिलकर स्थानीय मुसलमानों ने नामसूद्र समाज के लोगो को पीटा और घरों को लूटा. एक गर्भवती महिला की इतनी बेरहमी से पिटाई की गयी कि उसका मौके पर ही गर्भपात हो गया, निर्दोष हिन्दुओ विशेष रूप से पिछड़े समुदाय के लोगो पर सेना और पुलिस ने हिंसा को बढ़ावा दिया. सयलहेट जिले के हबीबगढ़ में निर्दोष हिंदू पुरुषो और महिलाओं को पीटा गया. सेना ने न केवल निर्दोष हिंदुओं को बेरहमी से मारा बल्कि उनकी महिलाओं को सैन्य शिविरों में भेजने के लिए मजबूर किया ताकि वो सेना की कामुक इच्छाओं को पूरा कर सके. मैं इस मामले को आपके संज्ञान में लाया था, मुझे इस मामले में रिपोर्ट के लिये आश्वस्त किया गया लेकिन रिपोर्ट नहीं आई”.

मंडल आगे लिखते हैं, “खुलना जिले के कलशैरा में सशस्त्र पुलिस, सेना और स्थानीय लोगो ने निर्दयता से हिंदुओं के पूरे गाँव पर हमला किया. कई महिलाओं का पुलिस, सेना और स्थानीय लोगो द्वारा बलात्कार किया गया. मैने 28 फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास के गांवों का दौरा किया. जब मैं कलशैरा में गया तो देखा वह स्थान खंडहर में बदल चुका है. लगभग 350 घरों को ध्वस्त कर दिया गया था, मैंने तथ्यों के साथ आपको यह सूचना दिया.

ढाका में नौ दिनों के प्रवास के दौरान मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया. नारायणगंज और चंटगाँव के बीच रेल पटरियों पर निर्दोष हिन्दुओ की हत्याओं ने मुझे अंदर से झकझोर दिया. मैंने पूर्वी बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाकात कर दंगा रोकने के लिये जरूरी कदमों को उठाने का आग्रह किया. 20 फरवरी 1950 को मैं बरिसाल पहुंचा. यहाँ की घटनाओं के बारे में जानकर में चकित था. बड़ी संख्या में हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया और महिलाओं से बलात्कार किया गया. मैंने जिले के सभी दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया, मधापाशा के जमींदार के घर में 200 लोगो की मौत हुई और 40 घायल थे. मुलादी में एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि वहां 300 हिंदुओं का कत्लेआम हुआ. मैंने खुद वहां नर कंकाल देखे जिन्हें गिद्ध और कुत्ते खा रहे थे. वहां पुरुषो की हत्याओं के बाद लड़कियों को आपस में बाँट लिया गया. राजापुर में 60 लोग मारे गये. बाबूगंज में हिंदुओं की सभी दुकानों को लूटकर आग लगा दिया गया. पूर्वी बंगाल के दंगे में 10,000 से अधिक हिंदुओं की हत्याएं हुई. अपने आसपास महिलाओं और बच्चो को विलाप करते हुए देख मेरा दिल पिघल गया और मैंने अपने आपसे पूछा, ‘क्या मै इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था”.

मंडल ने अपने खत में आगे लिखा, “पूर्वी बंगाल में आज क्या हालात हैं ? विभाजन के बाद 5 लाख हिंदुओं ने देश छोड़ दिया है. मुसलमानों द्वारा हिंदू वकीलों, हिंदू डॉक्टरों, हिंदू व्यापारियों, हिंदू दुकानदारों के बहिष्कार के बाद उन्हें आजीविका के लिये पलायन करने के लिये मजबूर करना पड़ा. मुझे मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की बच्चियों के साथ बलात्कार की लगातार जानकारी मिल रही है. हिंदुओं द्वारा बेचे गये सामान की मुसलमान पूरी कीमत नहीं दे रहे हैं. पाकिस्तान में इस समय न कोई न्याय है, न कानून का राज, इसीलिए हिंदू अत्यधिक चिंतित हैं. पूर्वी पाकिस्तान के अलावा पश्चिमी पाकिस्तान में भी ऐसे ही हालात हैं. विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब में 1 लाख पिछड़ी जाति के लोग थे उनमे से बड़ी संख्या को बलपूर्वक इस्लाम में परिवर्तित किया गया है. मुझे एक लिस्ट मिली है जिसमे 363 मंदिरों और गुरूद्वारे मुस्लिमों के कब्जे में हैं .इनमे से कुछ को मोची की दुकान, कसाईखाना और होटलों में तब्दील कर दिया है मुझे जानकारी मिली है सिंध में रहने वाली पिछड़ी जाति की बड़ी संख्या को जबरन मुसलमान बनाया गया है. इन सबका कारण एक ही है. हिंदू धर्म को मानने के अलावा इनकी कोई गलती नहीं है”.

जोगेंद्र नाथ मंडल ने अंत में लिखा, “पाकिस्तान की पूर्ण तस्वीर तथा उस निर्दयी एवं कठोर अन्याय को एक तरफ रखते हुए मेरा अपना अनुभव भी कम दुखदायी और पीड़ादायक नहीं है. आपने प्रधानमंत्री और संसदीय पार्टी के पद का उपयोग करते हुए मुझसे एक वक्तव्य जारी करवाया था, जो मैंने 8 सितम्बर को दिया था. आप जानतें हैं मेरी ऐसी मंशा नहीं थी कि मैं ऐसा असत्य और असत्य से भी बुरा अर्धसत्य वक्तव्य जारी करूं. जब तक मै मंत्री के रूप में आपके साथ और आपके नेतृत्व में काम कर रहा था मेरे लिये आपके आग्रह को ठुकरा देना मुमकिन नहीं था, पर अब मैं और अधिक झूठ दिखावा तथा असत्य को अपनी अंतरात्मा पर नहीं थोप सकता. मैंने अब निश्चय किया कि मंत्री के तौर पर अपना इस्तीफा दूँ. मुझे उम्मीद है आप बिना किसी देरी के इसे स्वीकार करेंगे. आप इस्लामिक स्टेट के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए अब इस पद को किसी को भी देने के लिये स्वतंत्र हैं”.

पाकिस्तान में मंत्रिमंडल से इस्तीफे के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल भारत आ गये. कुछ वर्ष गुमनामी की जिन्दगी जीने के बाद 5 अक्टूबर, 1968 को पश्चिम बंगाल में उन्होंने अंतिम सांस ली.

साभार –https://breakingtube.com/ से

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