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शायर-साहित्यकार हमारे नायक क्यों नहीं?

हम एक अजीब से शोर में रहते हैं। कभी आवाज इधर से उठती-सी लगती है, कभी उधर से। जब कुछ साफ-साफ समझ में आने को होता है, तभी कहीं और से कोई शोर उठ जाता है। इस शोर में हमें रखा जाता है और शोर हमें एक सुरंग में धकेलता जाता है, जहां सिर्फ अंधेरा होता है- अपना चेहरा भी खुद को नजर नहीं आता। यह शोर कई तरह का होता है, लेकिन उसकी मंशा एक ही होती है- हम फंसे रहें, भटके रहें। कभी घपले-घोटाले का शोर, कभी कूटने-पीटने का शोर, कभी जाति-मज़हब का शोर, कभी मंदिर-मस्जिद का शोर। इस शोर और लगातार अंधेरी सुरंग की तरफ हमें जाने से रोकने के लिये कुछ लोग तमाम परेशानियां-दुश्वारियां सहकर भी हमारे लिए आकाशदीप बनते हैं- रोशनी बिछाकर रास्ता दिखाते हैं। ये लोग कलम, कूची, हुनर के लोग हैं। शायर-कवि-कलाकार। मैं आज आपको रोज-रोज के शोर से बाहर खींचकर उन लोगों की तरफ ले चलना चाहता हूं जो सन्नाटे को भी आवाज देते हैं, समय की पीठ पर आज को टांकते हैं- दरअसल वे मुल्क को ज़ुबान और उसका लिबास देते हैं। लेकिन हम उनको क्या देते हैं ये एक बड़ा सवाल है।

जिंदगी भर ग़ज़लों और नज्मों की गठरी लिए दुनिया भर की महफिलों को आबाद करने वाले अज़ीम शायर ने मशरुफियत का वाकई वो दौर देखा हैं जब दिन रात की खबर नहीं रहती थी, महबूब को देखने और उससे मुलाकात की फुर्सत नहीं रहती थी, आज हमसफर के साये में जिंदगी बच्चे-सी हो गई है। जिसकी यादों में ग़जलों का काफिला चलता था उसे अब अपने ही मिसरे याद दिलाने पड़ते हैं। एक दौर था जब वे महफिल में जिधर मुखातिब होते दाद की बरसात शुरू हो जाया करती थी।

जिस शायर ने मोहब्बत में भी खुद्दारी की कीमत बनाए रखी, आज दुनिया की मोहब्बत उसके लिये कीमती होती जा रही है। अलबत्ता बशीर साहब की बीवी को इस बात का नाज़ हर पल रहता है कि उनके पास हिंदुस्तान की वो कीमती थाती है जिसने वक्त और सरहदों के दायरों बखूबी तोड़ा हैं।

उम्र पकती है ये सही है, हुनर हथियार डालने लगता है ये भी सही है, मसला ये है कि हमारे समाज और तहज़ीब मे जो लोग बेलबूटे लगाते हैं, हम जो हैं और हमें जो होना चाहिए उसका एहसास हमारे अंदर जिंदा रखते हैं। उनके थक जाने के बाद हम उनके हाथ नहीं थामते, याद नहीं करते, उनकी खातिर आवाज नहीं उठाते- वो आबाद मकान से किसी वीरान हवेली की तरह होते जाते हैं और वो फिर किसी विराट खंडहर की तरह कारवां गुज़र जाने के बाद का गुबार देखते रहते हैं, सिर्फ बशीर बद्र ही नहीं हिंदी के शिखर गीतकार नीरज भी।

अलीगढ़ के अपने मकान में नीरज का शरीर यूं ही अक्सर निढाल पड़ा रहता है। सरकारी पुरस्कार पद्म श्री और पद्मभूषण भी यहां पड़े रहते हैं, लेकिन सरकारी पूछ और समाज की नातेदारियां अब नज़र नहीं आती। बेटे-बहू अपनी जि़म्मेदारी निभाते हैं लेकिन नीरज की आवाज़ क्या लरजने लगी उनके गीतों पर निहाल होने वालों ने रास्ते ही बदल लिए। नीरज ने सरल शब्दों में ऊंची कविता के जरिए हिंदी की अद्भुत सेवा की। सिनेमाई दुनिया में भी ऊपर नीचे के फासले को फलसफाने अंदाज में रखा।

अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए। ये नीरज है- तन के तुलसी, मन के कबीर। संघर्षों से कभी हिले नहीं, उसूलों से कभी डिगे नहीं। आज जब कोई कैमरा जाता है या फिर कोई बड़ा कद्रदान भटकते हुए आ जाता है तो जैसे मौके मोहाल पर घरों की जैसे रंगाई-पुताई होती है, नीरज को कोई साफ-सफ्फाक कपड़े पहना देता है। हिंदी का समाज ऐसे आकाशदीपों की रोशनी तो ले लेता है, उनका रुतबा नहीं समझता, याद नहीं करता।

ऐसे धुरंधरों कवियों, उपन्यासकारों, कहानीकारों की चार पांच पीढियों को जो शख्स अपनी कसौटी पर कसता, आजमाता और तौलता रहा उनका नाम है डॉ. नामवर सिंह। आज हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष हैं। 90 साल से ऊपर की उम्र में भी हरदम पढ़ने लिखने में लगे रहते हैं। दिल्ली में एक फ्लैट के अंदर इस एकाकी जीवन में भी नामवर का जीवटपट बाकी है। अद्भुत प्रतिभा और स्मरण शक्ति के धनी नामवर सिंह की आलोचना प्रवृति को समझने के लिये थोड़ा पीछे चलना होगा।

हिंदी साहित्य के जिन लेखकों पर नामवर की कलम चली वो नामचीन हो गए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ. रामविलास शर्मा के बाद सर्वमान्य रूप से आलोचना के शिखर पुरुष हैं डॉ. नामवर सिंह का है। पिछले 6 दशकों से हिंदी साहित्य पर नामवर सिंह का दबदबा रहा है, सहचर या विरोध के स्वर का प्रस्थान विंदू वही रहे हैं। आज वे एक साहित्य योगी का जीवन जीते हैं। बशीर बद्र, नीरज और नामवर सिंह की तरह हिंदी उर्दू के कई ऐसे अक्षय रचनाकार हैं जिनकी कलम देश, काल और परिस्थियों को चुपचाप बुनती चलती है, समाज, राजनीति का दस्तावेज तैयार करती चलती है और हमें इसका अहसास ही नहीं होता। एक जिंदा मुल्क के लिए इनकी वही अहमियत है जैसी सांसो के लिए हवा की। इतिहास, देश की पैमाइश इस बात से करता है कि उसकी कला साहित्य संस्कृति कैसी रही। वो कितना समझदार, सलीकेदार और हुनरमंद रहा है।

एक मसखऱा कमर मटकाकर झोलियां भर ले जाता है, एक अदना नेता गलत-सही कतरब्योंत कर अटारियां खड़ा कर लेता है, एक कारोबारी पार्टियां-पैरवियां-परियां बिछाकर खज़ाने की अशर्फियां लूट जाता है, एक फर्जी फरेबी बाबा करोड़ों अरबों का आश्रम डेरा पीट लेता है- हमें सब मंज़ूर है, लेकिन उन लोगों को जानने-मानने और उनका एहतराम करने का शऊर नहीं सीख पाते जो अपनी जिंदगी हमारे लिए जीते हैं। देश के हुक्मरान जब कम में ज्यादा कहना चाहते हैं तो कलम की तरफ मुड़ते हैं जैसे हाल ही में संसद में मोदी बशीर साहब की तरफ मुड़े थे।

उर्दू के कुछ चुनिंदा शायरों को तो महफिलें नसीब हो जाती है और उनकी जेबें मोटी हो जाती हैं लेकिन ज्यादतर अदब की खिदमत और मुल्क के मयार की खातिर अपनी कलम की धार तेज रखते हैं। हिंदी साहित्य में भी यही बात है। हिंदी पट्टी में साहित्यकारों को नायक के तौर पर स्थापित करने और उनके हीरोइज्म पर रीझने का संस्कार नहीं है। हमने बहुत सारे रिवाज बनाए हैं, बहुत से छोड़े हैं- एक दफा कवियों शायरों साहित्यकारों के लिए अपनी समझ ठीक कर के देख लें। अब ये लरजते हैं, तुनकते हैं।

मैं ये नहीं कह रहा कि इन्हें अमिताभ बच्चन, शाहरुख और सलमान खान समझिए, या विराट, धोनी, तेंदुलकर समझिए। इन्हें उनके जैसा ही समझिए। देश की खातिर खेल और कला की दुनिया चमकदार हमने बनाई है, रचना का संसार रंगों से भरा हो ये हमसे ही संभव है। फिर सरकारें और सरकारी मदद तो खुद आ जाएंगे।

राणा यशवंत की ये विचारोत्तेजक रिपोर्ट देखिये इस लिंक पर

(लेखक इंडिया न्यूज़ के प्रबंध संपादक हैं)

साभार- http://samachar4media.com/ से



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