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हम महर्षि मनु पर अभिमान क्यों न करें ?

आज यह बात तो लोक में प्रसिद्ध हैं कि आर्य-दर्शन संसारभर के दर्शन में सर्वोच्च हैं । परन्तु हमारे आचार-शास्त्र के विषय में यह प्रशंसा के वाक्य नहीं किये जाते ।
हम भी इसी में मस्त हो रहते हैं कि हमने विचार में उन्नति की हैं और आचार में ???

यह क्षेत्र हमारा नहीं । हम यह भूल जाते हैं कि धर्म नाम ही अचार का हैं। जैसे संसार की समस्या सुलझाने में ऋषियों का मस्तिष्क संसारभर का नेता रहा हैं और जहाँ तक धर्म का सम्बंध आत्मा-परमात्मा की गहन ग्रन्थियों के सुलझाने से हैं, हम विचारक संसार के जाने-माने गुरु हैं, उसी प्रकार आचार-शास्त्र में भी हमारा स्थान किसी से पीछे नहीं ।

हम इस विषय में “अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनना” अपने तथा अपनी जाति के लिए श्रेयस्कर नहीं समझते, किन्तु जर्मनी के प्रसिद्ध विचारक नीत्शे जो जर्मनी के वर्तमान शक्तियुग का प्रवर्तक हैं और जो राजनीति को कपट की दलदल से निकाल कर सूधी – खरी बातों पर आश्रित करना चाहता हैं, के पुस्तक The Twilight of Idols से उद्धरण प्रस्तुत करते हैं-:
“One breathes more freely after stepping out of the Christian atmosphere of hospital and poisons into this more salubrious, loftier and more spacious world. What a wretched thing the New Testament is beside Manu, what an evil odour hangs around it !

अर्थात् ईसाई मत की रोगीशालाओं और विषों के वायुमण्डल से निकलकर मनुष्य इस (मनु के ) स्वास्थ्यप्रद, उच्च तथा विशाल जगत् में श्वास लेता हैं । मनु के सामने नया नियम (बाइबल) क्षुद्र वस्तु हैं । इस पर दुर्गन्धि छाई हैं ।

एक और पुस्तक The Will to Power में यही महाशय लिखते हैं –
Manu’s words again are simple and dignified. Virtue could hardly rely on her own strength alone. Really it is only the fear of punishment that keeps men in their limits and leaves every one in peaceful possession of his own.

अर्थात् मनु के शब्द खरे और आत्म-प्रतिष्ठायुक्त हैं । पूण्य केवल अपने बल पर आश्रित नहीं रह सकता । दण्ड के भय से ही मनुष्य अपनी सीमा में रहते हैं और प्रत्येक को शान्तिपूर्वक अपना-अपना स्वत्व भोगने देते हैं ।

इन्हीं महाशय नीत्शे की एक और पुस्तक Antichrist में यह वाक्य पाए जाते हैं -:
The fact that in Christianity ‘holy’ ends are entirely absent, constitutes my objection to the means it employes ……….. My feelings are quite the reverse when I read the Law – book of Manu ……….an incomparably intellectual and superior work …..It is replete with noble values, it is filled with a feeling of perfection, with a saying of yea to life, and a triumphant sense of well-being in regard to itself and life. The sun shines upon the whole book. All those things which Christianity smothers, with its bottomless vulgarity-procreation, woman, marriage, are here treated with earnestness, with rever-ence, with love and confidence

अर्थात् ईसाई मत में ‘पवित्र’ उद्द्येश्यों का सर्वथा अभाव हैं । यहीं उसके प्रयुक्त किये साधनों पर मेरा आक्षेप हैं ।……. परन्तु जब मैं मनु का धर्मशास्त्र पढ़ता हूं तो मेरे हृदय के भाव इसके सर्वथा विपरीत हो जाते हैं ।…… यह पुस्तक विचारपूर्ण और उच्चतम पुस्तक हैं ।…… यह श्रेष्ठ परखों से पूर्ण हैं । पूर्णता के भाव से भरा पड़ा हैं । जीवन को हाँ कहता हैं । जीवन के सम्बन्ध में इसका भाव स्वस्थता का विजयात्मक भाव हैं । जिन विषयों को ईसाईँ मत अपने अथाह गँवारूपन से दबा छोड़ता हैं, जैसे संतानोत्पत्ति, स्त्री, विवाह, उन पर (मनु के शास्त्र में) उत्साह, पूजा, प्रेम और विश्वासपूर्वक विचार किया गया हैं ।

इसी पुस्तक से एक और उद्धरण देकर हम इस लेख को समाप्त करेंगे ।
नीत्शे लिखते हैं -:
I know of no book in which so many delicate and kindly things are to woman, as in the Law book of Manu,these old grey beards and saints have a manner of being gallant to woman which perhaps cannot be surpassed.

अर्थात् मुझे किसी और पुस्तक का ध्यान नहीं जिसमें स्त्रियों के प्रति इतने मृदु, दयापूर्ण भाव प्रकट किये गए हो । जितने मनु के धर्मशास्त्र में है। यह भूरी दाढ़ी सन्तजन स्त्रियों के प्रति ऐसे ढंग से (सत्कार) दर्शाते हैं कि उससे आगे स्यात् असम्भव हैं ।

पाठकों ने देख लिया कि भारत का धर्मशास्त्र भी आज जगत् का वैसा ही प्रशंसा-पात्र बन रहा हैं, जैसा कभी भारतीय दर्शन था । समाज का आधार धर्मशास्त्र हैं । उसके पढ़ने, समझने और उस पर आचरण करने की सारे मानव समाज को आवश्यकता हैं ।

अब पाठक समझ गए होंगे कि ऋषि दयानन्द ने मनु को क्यों इतना सराहा हैं !ईसाई मत के पक्षपात से जो विचारक, चाहे वह पाश्चात्य हो या प्राच्य, मुक्त होता जाएगा, वही मनु के गुण गाएगा । आजकल की शिक्षा के ईसाई रंग में रंगे जाने के कारण मनु के नियम लोगों की आँखों मे नहीं जँचते । परन्तु वास्तव में मानव प्रकृति के अनुकरण योग्य यदि कोई धर्मशास्त्र है तो वह हैं मनु का । इसमें काल्पनिक सिद्धान्त नहीं, क्रियात्मक सच्चाइयाँ हैं ।

(पण्डित चमूपति, यह लेख “आर्य” पत्र में प्रकाशित हुआ था । तद्नुसार- स्थान- लाहौर- तिथि- वैशाख १९७९ तदनुसार मई १९२३ (अंक १) )

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