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मुंबई के डब्बा वालों की धाक क्यों पूरी दुनिया में जमी हुई है, एक मजेदार रिपोर्ट

मैनेजमेंट और प्रबंधन को लेकर आए दिन भारी भरकरम कार्यक्रम होते रहते हैं जिसमें महंगे सूट, टाई और ब्रांडेड जूते पहने कान्वेंटिये विदेशी कंपनियों और विदेशियों के कामों का गुणगन करते हुए देश के लोगों को सिखाते हैं कि गुलामी मानसिकता मे जीकर वे कैसे बेहतरीन प्रबंध गुरु बन सकते हैं। लेकिन हमारे देश में दुनिया का श्रेष्ठतम प्रबंधन मॉडल है जिसे देश के लोगों ने तब पहचाना जब विदेशियों ने इनके प्रबंधकौशल व चमत्कार को दुनिया का आठवाँ आश्चर्य माना। मुंबई के कांदिवली पूर्व में स्थित इंजीनियरिंग कालेज के छात्रों ने बोनांज़ा समूह के श्री एसपी गोयल के सहयोग से एक अलग तरह का आयोजन कर उन लोगों को आमंत्रित किया जिनसे प्रबंधन के गुर सीखे जा सकते हैं। इसी कड़ी में मुंबई के डब्बा वाले सुभाष तालेकर ने जब डब्बा वालों के अपने काम के प्रति समर्पण और ईमानदारी को लेकर अपना वक्तव्य दिया तो प्रबंध कौशल की सैकड़ों उदाहरण उनके अनुभव और कामकाज के आगे बौने लगने लगे। प्रस्तुत है श्री सुभाष पालेकर के वक्तव्य के कुछ अंश….

सुभाष तालेकर यानी मुंबई के डब्बा वालों के नेता बोले जा रहे थे और कांदिवली पूर्व के ठाकुर कालेज के इंजीनियरिंग के छात्र ठहाके लगाते हुए उनकी हर बात पर खड़े होकर तालियाँ बजा रहे थे, सुभाष तालेकर कोई मिमिक्री नहीं कर रहे थे बल्कि वे मुंबई के डब्बा वालों के तिलस्मी काम और उनके हुनर के बारे में बता रहे थे, वे बता रहे थे कि अधिकांश डब्बा वाले पढ़-लिखे नहीं हैं मगर आज तक किसी डब्बा वाले ने कोई चूक नहीं की, समय से लेकर सही व्यक्ति को डब्बा पहुँचाने तक।

वे छात्रों को प्रबंधन के गुर बता रहे थे लेकिन साथ में उन्होंने यह भी कहा कि हम तो पिछले सौ सालों से अपना काम ऐसे ही जिम्मेदारी और निष्ठा से कर रहे हैं, ये प्रबंधन, मैनेजमेंट जैसे भारी भरकम शब्द तो हमको दुनिया भर के उन संस्थानों ने दिए हैं जो मैनेजमेंट पर काम करते हैं।

 

 

 

उन्होंने अपनी बात की शुरुआत करते हए कहा, अफसर के आगे और गधे के पीछे कभी नहीं चलना चाहिए। इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि डब्बा वालों के प्रतीक के रूप मेंएक प्रतिमा मुंबई में लगाई जानी थी तो मुंबई के महापालिका के आयुक्त ने मुझे उनके ऑफिस में बुलाया और कहा कि इस प्रतिमा के कपड़े अच्छे नहीं हैं और इसका कलर सोने का क्यों है, तो मैने उनको समझाया कि सोना तपता है तभी चमक आती है और रही कपड़े की बात तो मैने कहा कि डब्बे वाला चार पीढ़ियों से ऐसे ही कपड़े पहनकर डब्बा देता आ रहा है। इसके बाद अजय मेहता को मेरी बात समझ में आ गई और वो खुद इस प्रतिमा का लोकार्पण करने आए। सुभाष जी ने बताया कि मेरे हिसाब से तो मैनेजमेंट यही है कि विपरित स्थितियों में भी अपनी बात किस तरह से रखी जाए कि आपका काम हो जाए।

उन्होंने बताया कि 350 साल पहले शिवाजी की सेना के प्रमुख अंग थे मावल, मावलों ने छत्रपति शिवाजी के लिए कई लड़ाईयाँ लड़ी। पुणे से ये मावल मुंबई आए तो मुंबई में डब्बा वाला के रूप में मुंबई को खाना खिलाने का काम कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि 1890 से डब्बा वालों ने अपना काम शुरु किया । आज डब्बा वालों की चौथी पीढ़ी ये काम कर रही है। इसकी शुरुआत भी बहुत रोचक तरीके से हुई। सुभाषजी के दादाजी एक अंग्रेज अधिकारी के यहाँ काम करते थे। उस समय न तो होटल थे न वाहन थे। अंग्रेज अधिकारी विक्टोरिया में बैठकर ऑफिस से घर खाना खाने जाते थे।इसमें उक डेढ़ घंटा चला जाता था। मेरे दादाजी ने उस अँग्रेज अधिकारी को सुझाव दिया कि वो घर खाना खाने जाएँ इससे तो बेहर है कि मैं खुद आपका खाना घ से ला दिया करुंगा, इससे आपका समय भी बचेगा और आपको गरम खाना भी खाने को मिलेगा। इसके बाद उन्होंने कहा, हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर तो नहीं मगर डब्बा वाले जरुर हैं।

उन्होंने बताया कि हम आज मुंबई में 2 लाख डिब्बे लोगों तक पहुँचाते हैं और यही दो लाख डिब्बे वापस लाकर घरों में पहुँचाते हैं। दुनिया भर के मैनेजमेंट संस्थानों ने हमारे कामकाज पर शोध किए हैं और ये माना है कि हमारे कामकाज में 1.60 लाख में मुश्किल से एक गल्ती होती है। दुनिया में दूसरा कोई ऐसा काम या संस्थान नहीं है जहाँ इतने बड़े स्तर पर ऐसा काम होता हो और कोई गल्ती ना होती हो। आज हमारा टर्न ओवर 5 से 60 करोड़ का है और मजे की त ये है कि हमारे यहाँ न तो कोई एकाउंटेट है न चार्टर्ड एकाउंटेंट। डब्बा वालों को वेतन देने से लेकर सारा लेनदेन बगैर लिखा पढ़ी के होता है। फिर भी न कोई शिकायत होती है न कोई गड़बड़ी।

उन्होंने डब्बा वालों को मिले 6 सिगमा प्रमाणपत्र मिलने का रोचक किस्सा बताते हुए कहा। एक बार दिल्ली से कुछ छात्र हमारे अँधेरी पूर्व में स्थित छोटे से ऑफिस में आ। उन्होंने बताया कि हमें सीके प्रल्हाद ने आपके पास भेजा है। वो मैनेजमेंट गुरु हैं। वो आपके काम पर सर्वे करना चाहते हैं। मैने कहा भाई हमारे पास तो हमारे कामकाज के कोई कागजात नहीं है। हमने कहा भाई रिसर्च और सर्वे कहना है तो हमारे साथ खुद आकर देखो। वो महीना भर हमारे साथ ट्रेन में, ऑफिसों में और घरों में घूमे और अपनी रिपोर्ट तैयार करते रहे। इसके बाद टाईम्स ऑफ इंडिया में खबर छपी कि हमें 6 सिगमा प्रमाणपत्र दिया गया है। हमको तो पता ही नहीं है कि ये 6 सिगमा क्या बला है। अब हम किससे पूछें- राष्ट्रपति से पूछें कि सीके प्रल्हाद से। दोनों से हमारा कोई कनेक्शन नहीं था।

इसके 20 दिन बाद दिल्ली से दो छात्र आए उन्होंने फोन पर बताया कि हम आपके लिए 6 सिगमा लेके आए हैं। हमने कहा कि भाई आप कहाँ हो, हम वहीं आ जाते हैंतो उन्होंने एअरपोर्ट के पास अदिति होटल का पता बताया। हम ऑफिस में 8 लोग थे हमने कहा कि भाई 6 सिगमा लेने जाना है तो 8 लोग चलते हैं, आपस में बाँट लेंगे। हम दो रिक्षा करके उनके पास पहुँचे तो उन्होंने हमको एक प्रमाणपत्र पकड़ा दिया। हमने कहा, ये क्या है- उन्होंने कहा कि ये 6 सिगमा का प्रमाण पत्र। हमने सिर पीट लिया भाई ये कागज देने के लिए तुमने इतना कंफ्यूजन पैदा किया। हम तो समझे कि 6 जनों के लिए कछ होगा तो हम रिक्षा करके 8 लोग चले आए कि चलो आपस में बाँट लेंगे। तुमने इस कागज के लिए हमारे तीन रिक्षा का भाड़ा फोकट में खर्च करवा दिया। उन्होंने जिस मासूमियत और सहजता से इस किस्से को बयान किया उसे सुनकर सभी छात्र हैरत में थे और तालियों की गड़गड़ाहट से छात्रों ने उनके इस अंदाज़ को जमकर दाद दी।

सुभाष जी बताते हैं 128 साल से डब्बा वालों का काम चल रहा है मगर आज तक हमने हड़ताल नहीं की।

उन्होंने बताया कि मुंबई में मजदूरों की हड़ताल से 64 मिलों के 2.5 लाख मजदूर बेरोजगार हो गए थे। तब हमने तय किया कि हम अपने कामगार को ही मालिक बना देंगे ताकि कभी हड़ताल का झंझट ही न रहे। उन्होंने कहा कि अगर यही फैसला मिल वालों ने लिया होता तो आज सभी मिल चालू होते और मजदूरों को हड़ताल भी नहीं करना पड़ती।

सुभाषजी ने कहा कि एक डब्बा वाले को हर महीने 15 हजार रु. तनख्वाह मिलती है। दिवाली पर उसे एक एक्स्ट्रा पगार दी जाती है।

उन्होंने बहुत ही मजेदार अंदाज़ में बताया कि डब्बा वाला अपना काम कैसे करता है। जब मुंबई में कोई नई नवेली बहू अपने पति को डब्बा भेजने के लिए कहती है तो डब्बा वाला कहता है मैं ठीक 8.55 पर आपके घर डब्बा लेने आ जाउंगा। अगर 8.55 पर डब्बा नहीं मिला तो मैं वापस चला जाउंगा क्योंकि उसे हर हालत में डिब्बा ऑफिस में दोपहर 12.25 तक पहुँचाना ही होता है, लेकिन जब डब्बा वाला घऱ पहुंचता है तो बहूरानी कहती हे दो मिनट रुको, पहले दिन तो डब्बा वाला दो मिनट रुकता है मगर दूरे दिन एक मिनट भी नहीं रुकता है। इसका नतीजा ये होता है कि साहब दिन भर भूखे रहते है …फिर शाम को दोनों पति-पत्नी में जाने क्या होता है कि दूसरे दिन से 8.55 पर डिब्बा घर के दरवाजे पर मिलने लगता है। उन्होंने बताया कि एक डिब्बा वाला दिन भर में 40 घरों से डिब्बे इकठ्ठा करता है और 40 ऑफिसों में देने जाता है। फिर वापस 40 ऑफिसों से खाली डिब्बे इकठ्ठे कर वापस 40 घरों में देने जाता है। इसमें आज तक किसी ने कोई चूक नहीं की।

सुभाषजी बताते हैं कि डिब्बा वला सुबह अपने घर से निकलने से लेकर डिब्बा पहुँचाने तक मशीन की तरह काम करता है। अगरी इसी बी उसे कोई जरुरी फोन या घर परिवार के किसी सदस्य की मौत की भी खबर आ जाए तो भी वह अपन काम बीच में नहीं छोड़ता।

उन्होंने अपने प्रबंध तंत्र की मजबूती का रोचक किस्सा बताते हुए कहा, कई बार डिब्बों पर जो कोड नंबर लिखे होते हैं वो मिट जाते हैं इसके बावजूद डिब्बा सही व्यक्ति तक कैसे पहउँचता है उसका भी एक अलग मैनेजमेंट है। डिब्बे वाला जिस लोकल ट्रैन में डिब्बा लेकर पहँचता है वहाँ हमारा एक मुकादम होता है जो हर डिब्बे की जाँच करता है और फिर उस पर अपनी याददाश्त से सही कोड लिखता है। ठहाकों के बीच वो बताते हैं मुकादम यानी मुक्का मारने वाला। अगर डिब्बे पर सही कोड न लिखा होगा तो जैन को शाकाहारी खाने की जगह मांसाहरी खाना पहुँच जाएगा तो फिर वो जैन डिब्बे वाले का क्या हाल करेगा…आप खुद अंदाज लगा लो।

उन्होंने बताया कि हमारे दादाजी के जमाने में कोडिंग के नाम पर डिब्बों पर लाल, हरा, पीला धागा बाँदा जाता था, तब डिब्बे कम होते थे। लेकिन जैसे जैसे डिब्बों की संख्या बढ़ी हमने अपनी खुद की कोडिंग शुरु की।

कोडिंग कितनी रोचक व सरल होती है उसका उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया- कि गोराई से नरीमन प्वाईंट की किसी बिल्डिंग में 8वीं मंजिल में अगर किसी डिब्बे को पहुँचाना है तो सबसे पहले अँग्रेजी अक्षर जी फिर बोरिवली स्टशन जहाँ से डिब्बा वाला ट्रैन में चढ़ेगा उसका बीओ फिर जहाँ डिब्बा पहुँचना है उस एरियाका पिन कोड और फिर बिल्डिंग का नाम और जिस मंजिल पर पहुँचाना है उसका नंबर।

उन्होंने कहा कि हमको तो नहीं मालूम मगर दुनिया के कई देशों के मैनेजमेंट संस्थानों ने रिसर्च औ सर्वे करके हमें बताया है कि हम दुनियाकी सबसे तेज और विश्वसनीय सप्लाई चैन के रूप में जाने जाते हैं। दुनिया मेंइतनी बड़ी सप्लाई चैन कहीं भी नहीं हैं जहाँ इतने लोग इतनी जल्दी अपना काम करते हैं, वो भी बगैर किसी चूक के।

उन्होंने बताया कि मुंबई की लोकल ट्रैन और साईकिल के दम पर ही हम येकाम कर पाते हैं। हमे कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि हम साईकिल की जगह मोर साईकिल का उपयोग करें तो ये प्रयोग फैल हो गया क्योकि साईकिल तो फुटपाथ से लेकर लाल बत्ती होने पर भी चला सकते हैं लेकिन मोर साइकल को तो हर लाल बत्ती पर रुकना पड़ता है, फुटपाथ पर चला नहीं सकते।

सुभाषजी बताते हैं हर डिब्बा वाला को सफेद टोपी पहनना जरुरी होता है। अगर कोई टोपी नहीं पहनता है तो उस पर 50 रुपये का दंड लगाया जाता है।

उन्होंने बताया कि डिब्बा वाला डिब्बों के साथ कोरियर सेवा भी दे रहे हैं और कोई भी हमारे एप पर जाकर अपनी कोरियर भेजने के लिए हमसे संपर्क कर सकता है।

उन्होंने कहा कि कसी डिब्बा वाले क मौत हो जाने पर उसकी विधवा को भी हम डिब्बा देने के काम से जोड़ते हैं लेकिन उसे चार-पाँच डिब्बे ही देने का काम देते हैं, लेकिन उनको पैसे पूरे दिए जाते हैं। अपने पति की मौत पर आनंदी बाई और भीम बाई डिब्बे देने का काम कर रही है। उन्होंने कहा कि डिब्बे वाले को साल भर में बस दो ही छुट्टी मिलती है।

सुभाषजी ने अपने मजेदार अंदाज से एक बार फिर छात्रों को ठहाका लगने पर मजबूर कर दिया। वो बतते हैं, एक बार कुछ लोग हमारे पास आए कि हम आपको आईएसओ प्रमाणपत्र देने आए हैं। हमने कह भाई हमने तो ये प्रमण पत्र मांगा ही नहीं फिर क्यों देने आए हो। इस पर उन्होंने बताया कि आपको 6 सिगमा प्रमाण पत्र मिल चुका है, जबकि 6 सिगम प्रमाणपत्र उसको लता है जिसे पहले आईएसओ प्रमाण पत्र मिले, इसलिए ये हमारी मजबूरी है कि आपको आईएसओ प्रमाण पत्र मिले।

अपने प्रबंधन गुरों को मजेदार अंदाज़ में पेश करते हुए उन्होंने बताया कि हमारे देश के लोगों का ये दुर्भाग्य है कि जब कोई विदेशी हमारे किसी काम की तारीफ करे तो ही देश के लोग, देश की सरकारें उसकी कद्र करते हैं। एक दिन मुंबई के पुलिस कमिश्नर के ऑफिस से फोन आया कि कमिश्नर साहब आपसे मिलना चाहते हैं। हम कमिश्नर से मिलने गए तो उन्होंने कहा कि लंदन से प्रिंस चार्ल्स आपसे मिलना चाहते हैं और आपके काम को देखना चाहते हैं। हमने कहा हम ऑफिस में बैठकर तो काम करते नहीं वो हमसे खुशी से मिले मगर हम तो उनसे फुटपाथ पर ही मिल सकते हैं, क्योंकि हमारा काम तो फुटपाथ से ही शुरु होकर फुटपाथ पर ही खत्म होता है। इसके बाद जब प्रिंस चार्ल्स आए तो वो चर्चगेट स्टेशन पर आए और हमारे साथ 20 मिनट बिताए। इसके बाद हमें महाराष्ट्र के राज्यपाल ने राजभवन बुलाया और तत्कालीन मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने हमारा सम्मान किया। उन्होंने अपना दर्द बयान करते हुए कहा कि 150 साल तक काम करने के बाद कभी किसी सरकार ने हमें पान पीने तक नहीं बुलाया वही सरकार प्रिंस चार्ल्स के हमसे मिलने के बाद हमें बलाकर सम्मानित करने में लगी थी।

प्रिंस चार्ल्स की शादी का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि प्रिंस चार्ल्स कैमिला भाभी से शादी करने वाले थे। हमें भी शादी का निमंत्रण मिला। हम सोच में पड़ गए कि हम गरीब आदमी एक राजा को कया भेंट दें। हमने वर के लिए महाराष्ट्रीयन पोषाख कुरता पायजामा और कोल्हापुरी चप्पल खरीद ली। मगर कैमिला भाभी को क्या भेंट दें। हमने जैसे तैसे हिममत करके दादर से 20 हजारी की महाराष्ट्रीयन साड़ी खरीदी। मगर ये शादी 8 अप्रैल 2005 को हो रही थी उस दिन भारतीय तिथि के अनुसार अमावस्या थी, हमको लगा कि ये शादी इस दिन नहीं होनी चाहिए क्योंकि हमारे देश में अमावस्या को शुभ काम नहीं होते, लेकन हम कर भी क्या कर सकते थे। राजा की शादी हम कैसे टलवा सकते थे। हमने विले पार्ले के संन्यास आश्रम में शांति पाठ करके दुल्हा दुल्हन की भेंट कोरियर से लंदन भिजवा दी। गिफ्ट लंदन पहुँचा तो रानी एलिजाबेथ ने देखा तो बहुत प्रसन्न हुई, हमें खबर भिजवाई गई कि हमें भी शादी में पहुँचना है।

इसी बीच एन शादी के दिन पोप का निधन हो गया और शादी तीन दिन के लिए टल गई। 9 अप्रैल को गुड़ी पड़वा के दिन शादी तय हुई। शादी के लिए हमको भी बुलावा आया था, लेकिन हमारे पास न तो कोई वीजा थान पासपोर्ट। मगर राजा की शादी थी तो सरकार ने एक घंटे में पासपोर्ट और वीज़ा बनवा दिया। लंदन पहुँचने पर शादी में जब महारानी ने हमको कुरते पायजामें में देखा और पता चला कि हम डब्वे वाले हैं तो उन्होंने हमें मिलने बुलाया। मगर हम उनसे बात कैसे करें, वो अंग्रेजी में बोल रही थी और हम हिंदी में। तभी जयपुर की महारानी वहाँ आई और उन्होंने अंग्रेजी और हिंदी अनुवाद करके हमारी और महारानी जी की बात करवाई। वहीँ हमारी मुलाकात नीदरलैंड की रानी से हुई।

सुभाषजी ने बताया कि हम डिब्बे वाले अपने काम केसाथ ही देश और समाज के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी का नर्वाह बखूबी करते हैं। प्रधान मंत्री के सफाई अभियान से भी जी जान से जुड़े हुए हैं। भूखे व असहाय लोगों को खाना मिले इसके लिए हमने रोटी बैंक चालू की है, जिन पार्टियों में अतिरिक्त खाना बच जाता है, वहाँ से हम खाना एकत्र कर भूखे लोगों तक पहुँचाते हैं। इसी तरह कपड़ा बैंक भी शुरु की है, जिन लोगों के पास अतिरिक्त कपड़े हैं उनसे कपड़े एकत्र कर मुंबई के आसपास के आदिवासी क्षेत्रों के गरीब लोगों तक पहुँचाते हैं।

उन्होंने अपनी बात इस शेर से की जिसमें शायद जीवन का पूरा मर्म छुपा है..

हे खुद तेरे दरबार में फरियाद करते हैं

इतना ज्यदा ज्ञान मत देना

जो हमें बर्बाद करते हैं

 

मुंबई के डब्बा वालों की वेब साईट – http://mumbaidabbawala.in/



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