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आखिर पहेली जैसी क्यूं थी जयललिता !

जयललिता शुरू से ही आजाद जिंदगी जीना चाहती थीं, अपनी मर्ज़ी से। कोई और नियंत्रित करे, यह उन्हें कतई पसंद नहीं था। और ऐसा ही हुआ। वक्त ने उन्हें वह सब दिया, जो वह चाहती थीं। किसी न उन्हें रहस्यों की रानी कहा, तो किसी ने अबूझ पहेली बताया। लेकिन जो गीत उनको सबसे ज्यादा पसंद था, उस ‘आजा सनम मधुर चांदनी में हम..’ की छांव में अगर उनका जीवन तलाशें, तो बहुत कुछ वैसे ही समझ में आ जाता है कि श्रंगार का उनके जीवन में क्या स्थान था और क्यों आखिर पुरुषों पर उन्हें भरोसा नहीं था।

जयललिता अपने पूरे जीवनकाल में पांच और सात के अंक को ही अपना भाग्यशाली अंक मानती रहीं। और इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि पांच तारीख को ही वे दुनिया को अलविदा कह गईं। शुरू से ही अपने आसपास एक रहस्यमयी वातावरण बुनती रहीं जयललिता जीवन के शुरूआती काल में फिल्में की हीरोइन थीं, लेकिन उनकी ज़िंदगी की कहानी भी किसी फिल्मी कहानी की तरह थी। इस कहानी की नायिका भी वही थीं और निर्देशक भी। इस पटकथा की लेखक भी वे ही थीं और सारे डायलॉग भी उन्हीं के लिखे थे। अपनी जिंदगी की इस फिल्मी कथा में जयललिता का लिखा हुआ अगर कुछ नहीं था, तो वह था इस फिल्म का अंत। जिसे लिखना जयललिता का तो क्या किसी के बस में नहीं हुआ करता।

कहते हैं कि जिंदगी अपने रास्ते खुद बनाती है। और फिर हमें ले चलती है अपनो रास्तों पर। वह अकसर उसी रास्ते चलती जाती है, जिस रास्ते पर उसके साथ चलने के लिए हम बने ही नहीं होते हैं। पर कभी कभार जिंदगी खुद हम पर मेहरबानी करते हुए पलटकर उस रास्ते पर भी हमारे साथ साथ चल पड़ती है, जिसके बारे में हमने कभी नहीं सोचा होता है। जयललिता की जिंदगी की कहानी भी कुछ कुछ ऐसी ही रही।

दरअसल, जयललिता अपने जीवन में भले ही सर्वशक्तिमान नेता बन गईं, और उससे भी पहले सफलतम अभिनेता रहीं। लेकिन वे असल में वकील बनना चाहती थीं। वह भी धाकड़ वकील। वह नर्तकी नहीं बनना चाहती थीं, लेकिन जब सिनेमा के संसार में कदम रखना पड़ा तो इतनी शानदार नर्तकी बनीं कि उनसे बढ़िया नर्तकी तलाशने में लोगों की सांसे फूलने लगीं। वे तेजतर्रार थीं और पढ़ने में सबसे आगे थीं। सैकंडरी की परीक्षा में तो वे पीरे प्रदेश में टॉपर थी। लेकिन घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए उनकी मां ने उन्हें वकील बनकर अदालत में जिरह करने के बजाय अभिनय के अंदाज दिखाने के लिए सिनेमा के संसार में भेजकर हीरोइन बना दिया।

दो साल की उम्र में पिता चल बसे थे। तो मां ने उन्हें दादा-दादी के पास मैसूर भेज दिया। दस साल की थी, तब तक अपनी मां से दूर रही जयललिता का कहना था कि उनकीं मां जब उनसे मिलने आती, तो वे अपनी मां की साड़ी से खुद को बांध कर सोती थीं। ताकि वह उन्हें छोड़कर ना जाएं। लेकिन बच्ची जयललिता की सुबह नींद खुलती, तो मां जा चुकी होती थी और अकेले रहने को मजबूर जयललिता रोती रहती थी। यह एक खास किस्म का दर्द था, जिसे समझना हर किसी के बस की बात नहीं थी। लेकिन कहते हैं कि दर्द की अपनी कोई एक शक्ल नहीं होती। वह कभी कभी मुस्कान के रूप में भी उभर कर सामने आ खड़ा होता है। यही मुस्कान जयललिता के चेहरे पर उस वक्त उभरी, जब सिर्फ 13 साल की ऊम्र में उन्हें अनायास ही रोल मिल गया।

हुआ यूं कि सिर्फ 13 साल की जयललिता अपनी मां से मिलने फिल्म के सेट पर पहुंची, तो फिल्म के निर्देशक ने उनकी मां से पार्वती के बचपन के रोल के लिए कहा, क्योंकि उस दिन जो रेल करनेवाली लड़की थी, वह पहुंची ही नहीं। सिर्फ एक दिन की बात समझकर जयललिता ने यह रोल क्या किया, जिंदगी ने उनकी तकदीर में यही करना लिख दिया। मां तो उनकी पहले ही चली गई थीं, सिर्फ एक भाई था। लेकिन जिंदगी का फलसफा है कि असल रिश्ते वो नहीं होते जो खून से बनते हैं। रिश्ते तो असल में वो होते हैं जो खून में चढ़कर जिंदगी भर आपका साथ निभाने के लिए चल पड़ते हैं। इसीलिए सिनेमा में काम करते करते जयललिता एमजी रामचंद्रन के बहुत करीब आ गईं। तीस फिल्में कीं, लेकिन उनमें से जब 28 फिल्में सुपर हिट हो जाएं, तो करीबियां बढ़ना बहुत सहज हो जाता है।

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राजस्थान के तपते रेगिस्तान के जैसलमेर में एक बार जब नंगे पांव शूटिंग करनी पड़ रही थी, तो जयललिता के पांव रेत में जल रहे थे, तो एमजी रामचंद्रन ने उन्हें अपनी गोद में उठा लिया था। पता नहीं, यह रेत की गर्मी से उपजी जलन को जयललिता के न झेल पाने से पैदा हुए अनुराग का आधार था, या कुछ और। लेकिन दुनिया ने इसे दोनों के अतिआत्मीय रिश्तों की रवायत माना और बहुतों ने श्रृंगारिक संबंधों से जन्मे स्नेह का परिणाम। लेकिन न तो जयललिता ने और न ही एमजीआर ने कभी दोनों के बीच के संबंधों का सच बयान करने की जरूरत समझी। वैसे, एमजीआर की बाकायदा धर्मपत्नी होने के बावजूद बेचारी जानकी तो कहीं भी किसी भी परिदृश्य में भी नहीं थी।

फिल्मों से लेकर समाज और राजनीति से लेकर जीवन के हर पहलू में हर जगह जयललिता ही एमजीआर के साथ दिखतीं। दोनों की ऊम्र में पूरे 31 साल का फासला था, लेकिन फिर भी दोनों ने निजी रिश्तों को कभी सार्वजनिक न होने देने की रणनीति के तहत जिंदगी को जिया। फिर भी जिंदगी तो जिंदगी होती है। वह अपनी असलियत उजागर कर ही देती है। शायद इसीलिए, दोनो के बीच का यह रिश्ता कभी उनके चेहरे पर उभरती मुस्कान को समझने की एक दूसरे की कोशिश, तो कभी उस हंसी के पीछे के दर्द के दरिया को देखती दोनों की आंखों में नजर आ ही जाता था।

एमजी रामचंद्रन सुपरस्टार थे और जैसा कि दक्षिण भारत के सुपरस्टार वहां के लोगों के लिए भगवान हुआ करते हैं। सो, एमजीआर की भी भगवानों की रोज पूजा होती थी। तो फिर उनके नाम की पार्टी तो चलनी ही थी। सो, जब एमजीआर ने डीएमके से दूर होकर अपनी पार्टी बनाई, और अपने अंतिम समय से पहले जयललिता अपनी पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया तो लंबं समय तक जवाब ही नहीं मिला। क्योंकि जयललिता राजनीति से दूर रहना चाहतीं थीं। लेकिन एमजीआर सन 1982 में एमजीआर ने उनसे कहा कि वे बीमार हैं और उन्हें जयललिता की जरूरत है क्योंकि वे सिर्फ उन्हीं पर शत प्रतिशत भरोसा करते हैं। तो, जयललिता इनकार नहीं कर सकीं और राजनीति में आईं तो सिनेमा के संसार से भी ज्यादा तेजी से छा गई।

बचपन में पिता चले गए थे। फिर मां गई थीं, तो जयललिता अकेली हो गई थीं। फिर भी जैसै तैसे खुद को सम्हाला, तो अब एमजीआर साथ छोड़ गए। जिंदगी में रह रह कर दावानल बनते दर्द के दरिया की तासीर ही ऐसी थी कि जयललिता तो क्या किसी भी शख्स के बातर से तोड़कर रख देती। बस, इसी टूटन को जयललिता ने जोड़कर खुद को इतना मजबूत किया कि वे एक लौहमहिला की तरह उभर कर सामने आईं। सन 1982 में वे राजनीति में आईं। सन 1984 में पहली बार राज्यसभा की सांसद चुनी गईं। फिर तो वे साल दर साल अपने आप से ही बड़ी होती गईं। और अंत में तो उन्होंने इतना बड़ा आकार पा लिया कि सामान्य लोग सोच भी नहीं सकते।

आला दर्जे की अंग्रेजी बोलनेवाली जयललिता की ताकत अगर उनका जीवट था, तो ज्योतिष में भरोसा उनकी सबसे कमजोरी। ज्योतिष विद्या पर उन्हें खुद से भी ज्यादा विश्वास था। कहते हैं कि ज्योतिषियों की सलाह पर ही वे सरकार के सारे काम करतीं। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिराने का काम भी उन्होंने ज्योतिषियों की सलाह पर ही किया था। अपनी खासमखास शशिकला को साथ रखना, उन्हें घर से विदा करना और फिर से उन पर अगाध विश्वास भी ज्योतिषियों की सलाह पर ही किया। जयललिता किसी पर भी बहुस आसानी से भरोसा नहीं करती थीं। लेकिन पुरुषों पर तो बिल्कुल भी नहीं करती थीं। या ज्यादा साफ शब्दों में इसे यूं भी कहा जा सकता है कि वे मर्दों के प्रति कोई भाव नहीं रखती थी। वे इस सबको छुपाती भी नहीं थीं।

एक बार इंटरव्यू के अंत में जब पत्रकार करण थापर ने जयललिता से हाथ मिलाते हुए कहा कि आपसे बात करके अच्छा लगा, तो जयललिता ने माइक पटकते हुए भावविहीन अंदाज में सख्ती के साथ कहा – ‘लेकिन मुझे आपसे बात करके बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।’ बाद में तो उन्होंने एक बातचीत में यह भी कहा था कि मर्दों को लेकर उनके मन में एक अजीब सी शंका रहती है। सच्चाई सिर्फ यही है कि एमजी रामचंद्रन के अलावा अपने जीवन में उन्होंने किसी भी पुरुष को खुद से बड़ा तो बहुत दूर, खुद के बराबर भी नहीं माना। केंद्र की राजनीति में वे बहुत पहले तक घोषित रूप से अटल बिहारी वाजपेयी और जसवंत सिंह आदि बहुत कम लोगों को ही सम्मान की निगाह से देखती थी। लेकिन इनके अलावा किसी को कभी कुछ भी नहीं समझा। जयललिता पुरुषों के प्रति बहुत सख्त थीं। करुणानिधि जैसे दिग्गज नेता को आधी रात को नींद से उठाकर घर से घसीटते हुए जेल भेजने के बाद खुशी में जयललिता ने मंदिर में एक हाथी दान में दिया था, इससे ज्यादा उनके सख्त होने का उदाहरण और क्या हो सकता है। जयललिता के जीवन में वाद विवाद और अपवाद बहुत आए, लेकिन इन सब पर हर बार विजय पानेवाली जयललिता नायक से जननायक और फिर महानायक बनकर लाखों लोगों की ‘अम्मा’ से अब भगवान बनकर पूजे जानेवाली महिला के रूप में बरसों बरसों तक याद की जाती रहेंगी।

(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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