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ब्रिटेन की जनता ने क्यों दिया त्रिशंकू संसद

पूरी दुनिया की नजर ब्रिटेन में ब्रिटेन में हुए मध्यावधि चुनाव पर लगी थी। इसका कारण साफ था, क्योंकि प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने समय पूर्व चुनाव कराने का जोखिम यूरोपीय संघ से अलग होने में कठोरता बरतने तथा अपने अनुसार निर्णय करने लायक स्थिति में आने के लिए उठाया था। दुनिया यह देखना चाहती थी कि आखिर ब्रिटेन के लोग क्या निर्णय देते हैं और उन्होंने निर्णय दे दिया। सच कहा जाए तो लोगों द्वारा त्रिशंकू संसद का परिणाम देना प्रधानमंत्री और कंजरवेटिव पार्टी की नेता थेरेसा मे के लिए बहुत बड़ा झटका है। अगर उनको तनिक भी आशंका होती कि उनकी पार्टी को ब्रिटिश संसद कॉमन सभा में भारी बहुमत नहीं मिलेगा तो वो समय पूर्व चुनाव में जाने का निर्णय कदापि नहीं करतीं। आखिर 2020 तक वो आराम से सरकार चला सकतीं थीं। लेकिन ब्रेक्जिट यानी यूरोपीय संघ से बाहर जाने के फैसले के बाद देेश की जो दशा थी उसमें उनके सामने इसकी प्रक्रिया को पूरा करने में बाधाएं आ रहीं थीं। उसमें उन्हें लगा कि यदि चुनाव द्वारा उन्हेें भारी बहुमत मिल जाता है तो वे दबाव मुक्त होकर यूरोपीय संघ से बाहर आने के लिए वार्ता कर सकेंगी तथा अपने अनुसार फैसला करने से उन्हें कोई रोक नहीं पाएगा। उस समय जो सर्वेक्षण आए वे भी स्वयं थेरेसा मे को प्रधानमंत्री की दौर में इतना आगे बता रहे थे कि उनके सामने कोई था ही नहीं। सर्वेक्षण कंजरवेटिव पार्टी को भी भारी बहुमत का संकेत दे रहे थे। वैसे भी टोनी ब्लेयर के बाद लेबर पार्टी को लेकर आम धारणा यही थी कि वह अभी तक अपने को संभाल नहीं पाई है। उसके नेता जेरेमी कॉर्बिन को एक सर्वेक्षण मे मात्र 20 प्रतिशत ने प्रधानमंत्री के रुप में पसंद किया था जबकि थेरेसा मे को 50 प्रतिशत ने। इससे उत्साहित होकर थेरेसा मे ने चुनाव में जाने का निर्णय किया।

साफ है कि यह दांव उल्टा पड़ गया है। उनकी पार्टी को 650 सदस्यों की संसद में केवल 318 सीटें मिलीं हैं जबकि 2015 में उसे 331 सीटें मिलीं थीं। इसके समानांतर लेबर पार्टी को 261 सीटें प्राप्त हो गईं जबकि 2015 में उसे 232 सीटें मिलीं थीं। इस प्रकार थेरेसा मे बहुमत के लिए आवश्यक 326 के आंकड़े से आठ सीटे पीछे हैं। हालांकि उत्तरी आयरलैंड की डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी के समर्थन से थेरेसा मे प्रधानमंत्री रह जाएंगी। इस पार्टी को 10 सीटें मिलीं हैं। लेकिन ब्रिटेन के लोगों की चिंता यह है कि ऐसे संक्रमणकाीन समय में जब ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो रहा है, एक कमजोर सरकार देश के हितों की रक्षा कहां तक कर पाएगी। वह भी उस हालत में जब देश में ब्रेक्जिट से जुड़े मुद्दों को लेकर काफी मतभेद हैं। आखिर 01 मार्च 2017 को प्रधानमंत्री थेरेसा मे को ब्रेक्जिट बिल पर पहली बार संसद में हार का सामना करना पड़ा था। ब्रिटिश संसद के ऊपरी सदन हाउस ऑफ लार्ड के 358 सदस्यों ने संशोधन के पक्ष में मतदान किया। यह थेरेसा मे लिए बहुत बड़ा धक्का था। इस संशोधन में ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन में मौजूद यूरोपीय संघ के नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की वकालत की गई। हालांकि हाउस ऑफ लार्ड में सरकार की पराजय का निर्णयात्मक महत्व नहीं था। कारण, हाउस ऑफ कॉमन्स में वापस आने पर सांसद संशोधन को दरकिनार कर सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में इस प्रकार के मत का भी तो महत्व है।

ब्रिटेन के यूरोपीय संघ विभाग ने कहा कि लार्ड द्वारा विधेयक में संशोधन का पक्ष लिए जाने से हम हताश हैं। ध्यान रखिए, इस विधेयक को कॉमन्स ने बिना संशोधन के ही पारित किया था। इस विधेयक का सीधा सा उद्देश्य जनमत संग्रह के परिणाम को प्रभावी बनाना था। प्रधानमंत्री ने कहा कि यूरोपीय संघ देशों के नागरिकों के अधिकार की गारंटी विदेशों में ब्रिटेन के संरक्षण सौदे का हिस्सा होगी। लेकिन लार्ड समर्थित संशोधन के अनुसार सरकार को तीन माह के भीतर अनुच्छेद 50 के तहत प्रस्ताव लाना होगा। इसमें ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन में मौजूद यूरोपीय संघ के नागरिकों के लिए समान निवास अधिकार सुनिश्चित करना होगा। इस पराजय ने थेरेसा को कुछ समय के लिए विचलित किया और उन्होंने सोचा कि बार-बार की किच-किच से अच्छा है कि एक बार चुनाव में जाकर नया जनादेश लिया जाए और जनादेश मिल जाता है तो फिर इनका सामना ज्यादा आत्मविश्वास से किया जा सकता है। चुनाव की घोषणा के कुछ दिन पहले ही उन्होंने यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने की औपचारिक शुरुआत के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे।

तो जो कुछ 1 मार्च को हुआ वैसा आगे भी हो सकता है। सच कहा जाए तो अब इसकी संभावना ज्यादा बढ़ गई है। थेरेसा मे नहीं चाहती थीं कि ब्रेक्जिट के दौरान यूरोपीय संघ से सौदेबाज़ी में कोई अड़चन पैदा हो। उनको लगता था कि जैसे-जैसे ब्रेक्जिट को लेकर बातचीत आगे बढ़ेगी, ब्रसेल्स और वेस्टमिंस्टर में बैठकें होंगी, उसमें भारी बहमत से उनकी स्थिति मजबूत होगी। अप्रैल में थेरेसा मे ने चुनाव की घोषणा करते हुए कहा था कि वे तीन साल पहले चुनाव कराकर एक जोखिम उठा रही हैं, लेकिन ये जरूरी है। उन्होंने मतदाताओं से कंजरवेटिव सरकार को बहुमत से जिताने की अपील की थी। कहा था कि ब्रिटेन यूरापीय संघ के आगे न झुके, इसलिए देश को मजबूत नेतृत्व चाहिए, ताकि देश के लिए एक अच्छी डील की जा सके। अब उन्हें लेने के देने पड़ गए हैं। अब यह मानने में कोई समस्या नहीं है कि मध्यावधि चुनाव कराने का थेरेसा का फैसला उसी तरह गलत आकलन पर आधारित था जैसा डेविड कैमरुन का यूरोपीय संघ से अलग होने के मुद्दे पर जनमत संग्रह का। कम से कम वो बहुमत की सरकार की नेता तो थीं।

यह मानने में भी कोई हर्ज नहीं है कि बड़ी संख्या में ब्रिटेन के लोगों ने मध्यावधि चुनाव को उचित नहीं माना। दरअसल, 2014 में स्टॉकलैंड के ब्रिटेन से अलग होने पर मतदान, उसके बाद 2015 में आम चुनाव, फिर 2016 में यूरोपीय संघ में रहने और न रहने के लिए मतदान….. के बाद लोग फिर से चुनाव के लिए मानसिक रुप से तैयार भी नहीं थे। उन्हें लगा कि यह चुनाव उन पर लाद दिया गया है। दूसरे, हम न भूलें कि जून 2016 में ब्रेक्जिट मतदान में 52 प्रतिशत लोगांे ने यूरोपीय संघ से बाहर निकलने का समर्थन किया जबकि 48 प्रतिशत ने विरोध। इस तरह ब्रिटिश जनमत आरंभ से ही इस मामले पर विभाजित था। यह विभाजन हर पार्टी के अंदर था। पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन ब्रिटेन के यूरोप में रहने के समर्थक थे और उन्होंने लोगों से इसके पक्ष में मतदान करने की अपील की थी। बहुमत ने उनकी अपील को स्वीकार नहीं किया और उन्होंने नैतिकता के आधार पर पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी पार्टी में इस मामले को लेकर विभाजन था। थेरेसा मे ही यूरोपीय संघ से बाहर निकलने के पक्ष में थीं। चुनाव परिणाम में भी इस विभाजन को दिखना ही था। जहां-जहां लोगों ने ब्रक्जिट के पक्ष में मतदान किया था वहां-वहां कंजरवेटिव को अच्छे वोट मिले हैं। चुनाव प्रक्रिया के बीच मैनचस्टर एवं लंदन में दो आतंकवादी हमलों ने भी ब्रिटिश जनमत को प्रभावित किया। लेबर पार्टी ने इसे मुद्दा बनाया।

सवाल है कि अब होगा क्या? ऐसा नहीं है कि ब्रेक्जिट की प्रक्रिया रुक जाएगी। कंजरवेटिव और लेबर दोनों पार्टियों ने चुनाव में ब्रेक्जिट का वायदा किया है। इनके पास 80 प्रतिशत से ज्यादा सीटे हैं। अब संभव है थेरेसा मे की सोच और योजना के विपरीत ब्रेक्जिट का एक ऐसा नरम संस्करण सामने आए जिसकी कल्पना पहले नहीं की गई थी। थेरेसा मे ने एक बाजार तथा सीमा शुल्क संध को नकार दिया था। अब वह एजेंडा में आ सकता है। थेरेसा भारी बहुमत प्राप्त कर इस मामले में संसद को नजरअंदाज करना चाहतीं थीं। अब ऐसा संभव नहीं होगा। इस जनादेश का संदेश भी यही है कि ब्रिटेन कठोर ब्रेक्जिट की ओर न जाए जैसा थेरेसा मे अपने चुनावी अभियान में बता रहीं थीं। यानी ब्रिटेन पूरी तरह यूरोप से कटे नहीं। लोगों की इस सोच के कारण थेरेसा मे के लिए ब्रेक्जिट पर बातचीत का मुद्दा काफी जटिल हो गया है। इस परिणाम को हम यूरोप में बढ़ रहे भूमंडलीकरण विरोधी भावना के विरुद्ध उभरते जनादेश की कड़ी में भी देख सकते हैं। हॉलैंड और फ्रांस के चुनावों में लोगों ने यूरोपीय संघ की विरोधी धूर दक्षिणपंथी पार्टियों केा नकार दिया। ऐसा लगता है कि ब्रिटेन के लोग भी ब्रेक्जिट के मामले मंें संतुलित व्यवहार के पक्ष में है। खासकर अप्रवासन एवं व्यापार के मामले में वे ब्रिटेन को कटा-छंटा नहीं देखना चाहते। हम न भूलें कि इस चुनाव में युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। वे एक देश से दूसरे देश में जाने तथा रोजगार अवसर को महत्व देते हैं। कठोर ब्रेक्जिट उनकी अपेक्षाओं के विपरीत होगा। इस तरह देखें तो इस चुनाव परिणाम ने ब्रिटेन के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिसमें वह यूरोपीय संघ से अलग तो होगा लेकिन संभवतः यूरोप से पूरी तरह कटकर, व्यापार एवं अप्रवासान सहित हर मामले में अपनी स्वतंत्र नीतियां और आचरण नहीं कर पाएगा। यह कितना सही होगा एवं कितना गलत इसका मूल्यांकन आगे ही हो पाएगा।

अवधेश कुमार, ई.ः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स,दिल्लीः110092, दूर.ः01122483408, 09811027208



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