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कल की चिंता आज क्यों करें?

कभी ऐसे भी लोगों को हम देखते हैं जो उम्र से युवा हैं पर चेहरा बुझा-बुझा है। न कुछ उनमें जोश है न होश। अपने ही विचारों में खोए-खोए—, निष्क्रिय ओर खाली-खाली से, निराश और नकारात्मक तथा ऊर्जा विहीन—। हाँ सचमुच ऐसे लोग पूरी नींद लेने के बावजूद सुबह उठने पर खुद को थका महसूस करते हैं, कार्य के प्रति उनमें उत्साह नहीं होता। ऊर्जा का स्तर उनमें गिरावट पर होता है। क्यों होता है ऐसा? कभी महसूस किया आपने?

यह सब हमारी शारीरिक स्वस्थता के साथ-साथ मानसिक स्थिति का और विचारों का एक प्रतिबिंब है। जब कभी आप चिंतातुर होते हैं तो ऊर्जा का स्तर गिरने लग जाता है। उस समय जो अनुभूति होती है, वह है-शरीर में थकावट, कुछ भी करने के प्रति अनिच्छा और अनुत्साह—। चिंता या तनाव जितने ज्यादा उग्र होते हैं, उतनी ही इन सब स्थितियों में तेजी आती है, किसी काम में तब मन नहीं लगता।

इन स्थितियों और चिंताओं का कारण हम ही हैं तो चिंतामुक्ति यानी सुख, शांति और आनंद भी हमारे ही भीतर हैं। चिंता दो तरह की होती है – एक बायोलोजिकल, जो शरीर के कष्टों के साथ आती है और इन कष्टों के दूर होते ही दूर हो जाती है। दूसरी है मानसिक चिंता यानी सारे दुःख, कष्ट, उलझनें इसी चिंता के साथ खड़े होते हैं। जिन्हें परिस्थिति के यथार्थ संवेदन की तरल क्षमता प्राप्त होती है, वे चिंतन को चिंताओं में तब्दील नहीं होने देते। इसके विपरीत तरल क्षमता के अभाव में व्यक्ति चिंतन को पल में चिंता बना लेते हैं। राजस्थानी के ‘ढोला मारू रा’ दूहा में सटीक कहा है कि सारा जगत चिंता में बंधा हुआ है, पर चिंता को किसी ने नहीं बांधा। जो मनुष्य चिंता को वश में कर लेते हैं, वे मनुष्य नहीं, सिद्ध पुरुष हैं। स्वेट मार्डेन का मार्मिक कथन है कि जो आत्मविश्वास से सुरक्षित है, वह इन चिंताओं, आशंकाओं से मुक्त रहता है, जिनसे दूसरे लोग दबे रहते हैं।

निराशा के सागर में डुबकियाँ लेते एक दार्शनिक ने संपूर्ण जीवन की चिंताओं का समाधान एक विचार के साथ पा लिया-क्या आज की कठिनाई आज के लिए कम हैं, फिर कल की चिंता आज क्यों करूं? सचमुच आज चिंताओं के सागर में डूबते- उबरते इंसानों की विडंबना यही है कि वे अधिकांश चिंता भविष्य को लेकर ही करते हैं या कल्पना अथवा संभावनाओं मात्र पर वे चिंताओं के अम्बार में डूबे रहते हैं।

आज को, इस क्षण को भविष्य की चिंता में गंवाने का अर्थ है – आत्म विनाश। चिंताग्रस्त होना, चिंता की मुट्ठी में कैद होना आत्म विनाश का मार्ग है। मुक्त हो जाइये इस कैद से। बीते कल और काल की मीठी-खट्टी यादों को पांवों तले रौंदकर और कभी न होने वाले भविष्य की चिंता के बोझ को कंधों पर से झटककर हल्के हो जाइये, चिंतामुक्त हो जाइये। जमकर जी लीजिए वर्तमान को। क्षणजीवी बन जाइये, अपनी पूरी शक्ति, चेतना और क्षमता इस क्षण पर लगा दीजिए। चिंतायें काफूर हो जायेगी। महात्मा गाँधी का इस सम्बंध में मार्मिक कथन है कि एक सैनिक यह चिंता कब करता है कि उसके बाद उसके काम का क्या होगा? वह तो अपने वर्तमान कर्तव्य की ही चिंता करता है।’’

रोमन महाकवि होरेस की कविता की पंक्तियाँ हैं-‘सुखी है वह मनुज और केवल वह/ कह सके अपना जो आज को/ अपने भीतर सुरक्षित कह सके जो/ हे आने वाले कल! कर लो तुम उतना/ कर सकते हो बुरा मेरा जितना/ जी लिया भरपूर मैंने तो आज को।

चिंता के कारणों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होगा कि चिंता का कारण मन में बैठा हुआ एक कल्पित भय है। वह तनिक भी वास्तविक नहीं है और यदि आप जैसा सोच रहे हैं वैसी संभावनाएं हैं तो भी उन संभावनाओं को तोड़-मरोड़ कर एवं निश्चित घटना के रूप में क्यों देख रहे हैं। यह सही है कि विमान दुर्घटनाग्रस्त होते रहे हैं, उनका अपहरण होता रहा है, परीक्षाओं में असफलताएं मिलती रहीं हैं, अच्छे और प्रगतिशील व्यापार में नुकसान होते रहे हैं, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि प्रत्येक विमान इस स्थिति से नहीं गुजरता, हर विमान का अपहरण नहीं होता, परीक्षाओं में बैठने वाले सभी छात्र असफल नहीं होते, दुनिया भर में फैले लंबे-चैड़े व्यापार सभी नुकसान नहीं झेलते। हम लोगों की कठिनाई यह है कि हम संभावनाओं को यथार्थ मान बैठते हैं। हमें अशुभ सोचने की आदत पड़ गयी है या हम भगोड़े हैं इसीलिए तो कल्पित को जीते हैं, जबकि हमें यथार्थ में जीना चाहिए। चिंता जब तक हमें सावधान करती है, हमारे भीतर कर्तव्य भावना जगाती है, तब तक वह हमारा स्वस्थ मनोभाव है किन्तु जब हम स्थिति से डरकर भागने या भाग्य पर बिसूरने पर उतारू हो जाते हैं, तब चिंता हमारी चिता बन जाती है।

हमारे मन मंे चिंताएं प्रायः वर्तमान की नहीं वरन् बीते हुए समय की घटनाओं की या भविष्य की होती हैं। ये दोनों प्रकार की चिंताएं हमारी शक्ति को इस कदर कमजोर बना देती हैं कि हम अपने वर्तमान को नष्ट कर लेते हैं। जो बीत गया सो बीत गया। बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेई। सेंट क्लेमैन्ट ऑफ एलेक्जैन्ड्रिया ने कहा भी है कि “यदि आप आशा नहीं करते हैं तो आपको इस बात का पता नहीं लगेगा कि आपकी आशाओं से परे क्या है।”

अतीत की स्मृतियां मत संजोइए। सुखद और दुखद दोनों प्रकार की स्मृतियों को भूल जाइए और अपने अतीत पर बलपूर्वक कपाट जड़ दीजिए। यदि अतीत का चिंतन मन पर बोझ बना रहा, तो हम अपने वर्तमान को गंवा देंगे। आज और इस समय को यदि हम बीते कल पर खर्च कर देंगे, तो आज की उपलब्धि से अपने आपको वंचित कर लेंगे। आज तो हमें कुछ नया करने के लिए मिला है। आज की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए मिला है। आज को बीते कल पर गंवाकर हम अपने लिये मुसीबतें बढ़ा लेंगे। बीते कल की चिंता करके हम उसे सुधार नहीं सकते, किन्तु अपने आज को अवश्य ही नष्ट कर सकते हैं।

सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप काम को कैसे करते हैं। माना कि आप बहुत अच्छे ड्राइवर हैं, पर क्या आप चिन्ता और परेशानियों से घिरे हो तब आंख बंद करके गाड़ी चला सकते हैं? ऐसा करने के लिये आपका संतुलित एवं चिन्तामुक्त होना जरूरी है, अन्यथा दुर्घटना निश्चित होगी। जीवन भी ऐसा ही है- गाड़ी चलाने जैसा, कभी तेज चलता है तो कभी धीरे, कभी क्लच पकड़ना पड़ता है तो कभी गियर बदलना पड़ता है। कभी गाड़ी ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरती है तो कभी बंद पड़ जाती है और उसे दुरुस्त करने के लिए गैराज भेजना होता है। जिन्दगी के इन तमाम उतार-चढ़ावों के बीच वही व्यक्ति अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है जो चिन्तामुक्त होकर संतुलित एवं सकारात्मकता को अपने जीवन का लक्ष्य बनाये रखे। बुद्ध ने कहा कि अंतिम सत्य कुछ नहीं, कुछ भी नहीं है, जो अजर-अमर हो। कुछ भी नहीं, जो बदला न जा सके।

एक महान विद्वान ने कहा था कि जब हम स्वार्थ से उठकर अपने समय को देखते हुए दूसरों के लिए कुछ करने को तैयार होते हैं तो हम सकारात्मक हो जाते हैं। महात्मा गांधी ने कहा कि जब आप दुखी हों तो अपने से नीचे देखो और फिर सोचो कि आप सुखी हो या दुखी। यहां देखने का नजरिया महत्वपूर्ण होगा। नीचे देखते समय अपनी सुविधाओं को देखो और ऊपर देखते हुए उनके लिए किए गए श्रम को समझने का प्रयास करो। ऊर्जा एवं सकारात्मकता से समृद्ध होकर आप जीवन को आनंदित बना सकते हैं। समाज और राष्ट्र के लिए भी ज्यादा उपयोगी साबित हो सकते है। सदा उत्साहित रहकर खुद को ऊर्जा से भरपूर रखें, इससे आपके व्यक्तित्व को नई पहचान मिलेगी। आपका आत्मविश्वास बढेगा, जीवन में सफलता की सीढ़ियों पर बहुत जल्दी आप आरोहण कर सकेंगे। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने कहा भी है कि कभी कोई इंसान बहुत आसानी से बहुत कुछ पा जाता है, जबकि किसी और को उतना ही पाने में बहुत कुछ देना पड़ता है।

कितना सुंदर कहा गया है कि क्या हुआ, यह मत सोचो, किंतु क्या करना है केवल यही सोचो। समय विभाजन, चिंता के विपरीत चिंतन, उच्च उद्देश्य की उपस्थिति, संतुलित कार्य व्यवस्था, आशावादी दृष्टिकोण, मैं तो इतने से ही बच गया…. यह सकारात्मक सोच – दुःख में सुख ढूंढ लेने की कला है – यही ऐसे उपाय हैं जिन्हें जीवन में ढालने से निश्चित रूप से आदमी का जीवन सफल और सार्थक बनता है। समझदार के लिए हर नया प्रभात नया संदेश लेकर आता है कि मैं वैसा ही हूँ जैसा कल था और वैसा ही रहूँगा जैसे अब और आज हूँ। यही सोच यदि हम विकसित करें तो चिंता रूपी कैंसर से मुक्ति पा सकते हैं।
प्रेषक:

(ललित गर्ग)
60, मौसम विहार, तीसरा माला, डीएवी स्कूल के पास,
दिल्ली- 11 0051
फोन: 22727486, 9811051133

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