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विश्व मैत्री मंच पर कई रूपों में गूँजी ‘आवाज़’

आज विश्व मैत्री मंच आवाज़ शब्द से गुलज़ार होगा। आवाज़ जो चीख भी है, ध्वनि भी है, संगीत भी है साज़ भी है और संवाद भी। विश्व मैत्री मंच की लेखिकाओं ने आवाज़ विषय पर शब्दों का ऐसा जादू चलाया है कि कविता, गीत, हायकू के साथ आवाज़ ने कहीं सन्नाटा पैदा किया तो कहीँ आवाज़ एक गूँज बन गई तो कहीँ आवाज़ ने शोर को स्वर दिया। विश्व मैत्री मंच पर लेखकों का कम लेखिकाओँ का वर्चस्व ज्यादा दिखाई दे रहा है, लेखिकाओँ की आवाज़ में लेखकों की आवाज़ बहुत कम सुनाई दे रही है। फिर भी इस मंच पर हर बार एक सार्थक चर्चा, संवाद और विमर्श इसे एक नई ऊँचाई प्रदान कर रहा है ।

आज आवाज़ पर सभी की सटीक, सुंदर रचनाएँ मंच पर आयी। और अंत में सुनीता जी का अध्यक्षीय उद्बोधन भी प्रोत्साहन से भरपूर रहा।
आवाज़ विषय पर सबकी सुंदर कविताओं का मूल्यांकन किया अध्यक्ष सुनीता मैत्रेयी ने अपनी सार्थक व सटीक टिप्पणियों के साथ। हर रचना को सम्मान देते हुए सुनीता जी ने अपनी त्वरित टिप्पणियों से सभी रचनाओं के महत्व को रेखांकित किया।

काव्यगोष्ठी के इस महत्वपूर्ण दिन शुक्रवार की सुहानी सुबह की शुरुआत इन पंक्तियों से हुई

कल शब मुझे बेशक्ल की आवाज़ ने चौंका दिया
मैंने कहा तू कौन है उसने कहा आवारगी

आवाज़ ……जो गहराई तक पैबिस्त है हमारी जिंदगी में …..बिना रंग रूप शक्ल के। वो न हो तो तन्हाई में जिंदगी तड़प उठती है। सन्नाटा भयभीत करता है ।

आइए, दोस्तों आज कविता में आवाज़ के इसी महत्व को पूरे भावों और एहसासों से उकेरे। कविता का मूल भाव आवाज़ ही होना चाहिए। आज की अध्यक्ष हैं सुनीता जैन।

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काव्यकोश में मुहसीन चित्र सज्जा प्रस्तुत की है कस्तूरी मणिकांत ने।

‘आवाज़’ की संचालक भोपाल की डॉ. विनीता राहुरीकर ने कुशल संचालन कर इस ‘आवाज़’ को एक नई अभिव्यक्ति दी।

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1) *** मौन की आवाज़ ***

कहाँ से आ रही बांसुरी की धुन
कोयल की कूक ,पपीहे की हूक
लहरों का गान ,मोती की मुस्कान
गूंजने लगी डमरू की घोषणा
और शंखनाद का आरोह …

ये कौन है
जो मेरी गीली मिट्टी सी छाती को
घुंघरू बंधे पैरों से पार कर गया
सहेज लिए गीली मिट्टी में
पावों के निशान ..सूरज की तपिश बन कर
पौर पौर से ये कौन सा संगीत फूटा
की आसमान में टँग गई
नई जोगिया सुनहरी चादर …

धरती ठिठकी ,पर रुकी नहीं
धूमती रही ..घूमती रही …
प्रेम परिभाषित नहीं हुआ
बस , आ गया यूँही ..
एक कठोरता भरी भावुकता
सहलाती रही रात भर
मेरी मौन की आवाज़ को …

~~मधु सक्सेना ~~

आइये आज मौन को तोड़ें और एक साथ मिलकर एक आवाज़ लगाएँ।
आवाज़, जो हमारी बात दूसरों तक पहुँचाती है…
आवाज़ जो एन्नाटे को भँग करती है…

आवाज़ जो हमे जिंदगी का अहसास कराती है…
उसी आवाज़ को आवाज़ दीजिये…
– डॉ. विनीता राहुरीकर

मौन की आवाज़ के साथ ही एक बहुत ही शानदार आगाज मधु दीदी। एक कठोरता भरी भावुकता। विलोम उपमाओं का सुंदर तालमेल। कोयल की कूक और पपीहे का संगीत, लहरों का मधुर गान, शिव के डमरू और कृष्ण का शंखनाद।। वाह मौन भँग करने को सभी पवित्र ध्वनियाँ एकत्रित हुई और मंच सार्थक हुआ।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

सुन रहे हैं न आप
**************
कल रात भर
समंदर मुझे पुकारता रहा
दबे पांव उसकी आहट
मेरे ज़ेहन से टकराती रही
सुबह देखा तो बस
दूर तलक पानी का विस्तार
कहां है इस आवाज़ की शक्ल
जो रात भर मुझे
अपने पाश में
जकड़ती चली गई थी
मैं देख रही हूँ अनझिप
पानी पर उमड़ती लहरें
जिस पर लहरा रहा
मेरा ,आपका ,हम सबका भविष्य
क्योंकि सत्ता भी बेशक्ल है
उसकी भयानक आवाज़
सुन रहे हैं न आप ???

– संतोष श्रीवास्तव

बेशक्ल सत्ता की भयानक आवाज़। और पानी पर तैरता भविष्य, हम सब ही साँस रोके सुन रहे हैं संतोष जी। नुकीला तन्ज़ है आपकी कविता में जो बिना चुभे भी अपनी नोक का अहसास करा देती है। आवाज़ की शक्ल, वाह आज तो विपरीत अर्थ वाले बिम्बों का क्या खूब प्रयोग हुआ है।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

सुना है प्रेम की भाषा मौनहोती है ।बेड़ा गर्क हो इन साहित्यकारों का ।एक दिन मुझे समझाने लगे ,प्रेम बहुत पवित्र चीज है उसमें शब्दों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए प्रेम झूठा हो जाता है प्रेम की भाषा तो मौन है अब मैं जिसे चाहता था उससे इस बात का इजहार ही नहीं कर पाया कि मैं उससे प्यार करता हूँ।मैंने जाकर पूछा उस साहित्यकार से ,क्या करूं तो कहने लगे
भरे भुवन में करत हौ नैनन हूँ सो बात।

प्रेम की भाषा तो मौनहोती है ।मेरी समझ में बात आ गई और आज तक मैं न बोलने के कारण प्रेम को ढूंढ रहा हूँ। एक बार जब वहः अथक प्रयास के बाद मिली और मैं बोल पड़ा तो वहः बोली,प्रेम तो मैं भी तुमसे करती हूँ अब क्या,अब तो मेरी सगाई भी हो गयी अगर तुमने मुझे आवाज़ दी होती तो कम से कम आज मैंदूसरों के साथ न होती। यह है आवाज़ का जादू जिसने उसे बुला लिया आज उसके साथ है वो lमैं यहांभुगत रहा हूँ नैनन हूँ सो बात को।

– अमर त्रिपाठी

अय्याशी मिलती है इनकी शामों में,
पस्ती किरदारों की ऊँचे नामों में।
ख़ामोशी में इन्कलाब की चीखें हैं,
सन्नाटा सा बिखरा है कोहरामों में।
– जीतेश राज ‘नक़्श’
ख़ामोशी में इंकलाब की चीखों की गूंज।। और कोहराम में पसरा सन्नाटा। बहुत खूब जीतेश राज जी
– डॉ. विनीता राहुरीकर

** अस्तित्व की आवाज़ **

किसी भी शोर के बीच में
तुम गुम नहीं हो सकती
तुम मेरी रगों में बह रहे
हर एक प्रश्न, हर एक हल,
हर एक रहस्य, हर एक शोर,
हर एक जीत और हर हार का
अभिन्न अंग हो।

क़तरा-क़तरा मुझे मुझसे मिलाती
संवेदनाओं को सहलाती,
आशाओं को नए दर दिखाती,
निराशा के आँसुओं को
आत्मविश्वास की
गर्म फूँक से डराती
तुम मेरा अभिन्न संग हो।

कभी सूरज से बतियाती
और कुछ किरणे चुराती
कभी रात से चाँदनी
उधार ले आती, तुम
हवा संग नई दिशा ढ़ूढ़ती
मेरे मन में उठती उमंग हो।

हर भटक से मुझे खींच लाती
हर ठोकर पर गिरीने से बचाती
मन के झुरमुटों में बैठी
बिन बोले ही शोर मचाती
तुम मेरे अस्तित्व की आवाज़ हो।
मेरे अंदर बैठी एक और मैं,
जिसकी आवाज़ मेरे बाहर को
संभाल लेती है।

-आशा सिंह गौर

आस्तित्व की जोरदार आवाज़ जो किसी भी परिस्थिति में इंसान को ग़ुम नहीं होने देती। आशा जी सुबह की किरण की तरह उजास से भरी आपकी कविता। निराशा के आँसुओं को आत्मविश्वास की गर्म फूँक से डराती कितनी सकारात्मक सोच। अंदर की आवाज़ जो हमेशा बाहर को संभालती रहती है।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

तुम्हारी आवाज़ पे,
मेरे दिल के साज़ पे
बजी प्यार की धुन
तुझको लिया मैंने चुन
सुन ले ओ मेरे पिया
दिलकी कहूँ तूही सुन

– डॉ. मंजुला श्रीवास्तव

दिलबर की आवाज़, दिल का साज, तो प्यार की धुन तो बजनी ही है डॉ. मंजुला जी। हमने भी सुन ली वो प्यारी सी धुन कि आपने उन्हें लिया है चुन
– डॉ. विनीता राहुरीकर

** सुनती हूँ मैं **

एक नई दुनिया में जाकर ख़्वाब सुनहरे बुनती हूँ मैं।
ख़ामोशी मुखरित होती है,
तुमसे मिलकर जाना मैंने।
नयनों की भाषा होती है,
नज़र मिलाकर माना मैंने।

बात तुम्हारे मौन लबों की
चुप रहकर भी सुनती हूँ मैं।

दिल के भीतर खड़ा हिमालय
या बहती है नदिया कलकल।
धधक रही क्या कोई ज्वाला,
होती है जिज्ञासा पलपल।

बीत रहे जो संग तुम्हारे,
उन्हीं पलों को चुनती हूँ मैं।

पहले लगते थे अनजाने,
अब लगते हो पहचाने से।
मुखर बड़ी थी मौन हुई मैं
ऱाज तुम्हारे पा जाने से।

गीत रचाकर आज प्रणय का
सिर अपना बस, धुनती हूँ मैं!
मल्लिका मुखर्जी

ओह मल्लिका जी इतनी प्यारी सी कविता के अंत में सर धुनना!
मौन का मुखर होकर फिर मौन हो जाना। कभी कभी रिश्ते ऐसे ही किसी शब्द छीन लेते हैं कि भाषा भी गूंगी हो जाती है। बहुत अच्छी कविता आपकी
– डॉ. विनीता राहुरीकर

**फर्क **

बचपन में मेरे पापा आवाज़ लगाते थे
किसी काम के लिए
तो मैं अनसुना कर देता ,
कभी पढने का बहाना , कभी कुछ
अब वे बूढ़े हो गए हैं
हाँफते हैं दिनरात, दमे की शिकायत है
मिचमिचाती आँखों से देखते हैं सिर्फ
आवाज़ नहीं लगाते
जो मिल जाए खा लेते हैं , सोये रहते हैं चुपचाप
सोचता हूँ कि काश ! यदि आज वे आवाज़ लगाते ,
दौड़ा चला जाता मैं , दस काम छोड़कर
बतियाता उनसे ,
लेकिन अब उनके कानों में भी वक्त की रेत जम गई है
अब डॉक्टर के यहाँ मैं उनके कान के पास मुंह ले जाकर जोर से चिल्लाता हूँ
वे जवाब नहीं देते ।
महेश दुबे

मार्मिक प्रसंग महेश जी। अक्सर ऐसा होता है कि हम कुछ बातोँ को अनदेखा कर देते हैं लेकिन जब समय हाथ से निकल जाता है तब उन्हें न कर पाने का मलाल ताउम्र मन में रह जाता है।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

**एक कविता मेरी भी**

आवाज़
सुनो,
भूली नहीं हूँ मैं आज तक
प्रयास तो किये हैं बहुत
भूलाने की
मगर दिल के किसी कोने में
अब भी तुम हो,
न जाने क्या है तुम में
वो पागलपन
वो छटपटाहट
वो लड़कपन
वो कुछ कहने की चाहत
पर कुछ न कह पाना
मुझे तुम्हारा धुत्कारना
सिर्फ इसलिए कि मेरा दूर
रहने का दर्द
बर्दाश्त न होता तुम से
समझते हैं हम,
कि आज भी तुम उसी
जगह हो जहाँ मुझे छोड़ गए थे
मैं तो लौट आई थी,
पर तुम आज भी वहीं खड़े हो
किसी कोने से आवाज़ दे रहे हो
वो आवाज़ मुझ तक पहुँच तो नहीं पाती
लेकिन ये दिल महसूस करता है,
कि आज भी ढूँढ़ते हो मुझे
उन लंबे लंबे वृक्षों के बीच
ऊँचे ऊँचे उन पहाड़ों में जहाँ
हमारा अवाज़ गूँज उठता था
और सुदूर पहाड़ों से टकराकर
वापस लौट आता था,
और बार बार हमें बाहें फैलाए
बुलाता रहता, आज भी तुम
उन पहाड़ों के बीच
मुझे पुकारते हो
इसी आस से कि
किसी कोने से तुम्हारा नाम
पुकारते मेरी आवाज़
लौट आए तुम्हारे पास,
पर उन पहाड़ों से
टकराकर लौट आती है
खामोश सी एक गहरी साँस
जब तुम तक पहुँचती है
तब तुम समझ जाते हो
मेरे आहत दिल की
व्यथा को फिर
निराश हो कर भारी मन से
लौट जाते हो उसी जगह,
जहाँ तुम मुझे छोड़ गए थे,
अकेला और तन्हा।

लता तेजेश्वर

समय बीत जाता है लेकिन उसकी गूंज बार बार हवाओं से टकरा कर अतीत की वादियों में शोर मचाती रहती है। लता जी प्रेम में आहत मन की संवेदना को खूब शब्दों में ढाला है आपने। एक आवाज़ जो मौन होकर भी ताउम्र मन की वादियों में गूंजती रहती है।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

भोर की बेला, पनघट पर गाये पनिहारिन मधुर गीत ।
अमिया की डाली मे कोयल कूके मीठे
संगीत।
नदिया मे नाव खेते-खेते नाविक गाये ददॆ भरे गीत।
सबके अंतस से निकले अंदरूनी रूहानी
आवाज़।
जो अलख जगा दे उस परमपिता के नाम की आगाज।

– गीता भट्टाचार्य

खोल दी अखियाँ गीता जी, सुबह की बांग, और आपकी आवाज़ वाह
– डॉ. विनीता राहुरीकर

*** सदा दिल की ***

अनसुनी दिल ने की सदा,
मासूम दिल की इल्तिज़ा,

झिड़कता था मन हमेशा,
अपनी ही आवाज़ पर,
क्यों खुद को सदा।

जब गुनगुनाया चांद,
आसमां पे,
पात शाख से मिल ,
बांसुरी बजाते रहे,,
सपनों की तकिया में,
मुँह छिपाये, हम
करवटें लेते रहे।
थपकियां आशाओं की,
हंस रहीं ताली बजा,
क्यों अता की खुद को,
हमने ये सज़ा।

पलकों की दहलीज़ पर,
अश्क पहरा दे रहे, पर
इसकी उसकी सबकी
खातिर, सीख ली है इन लबों ने,
मुस्कुराने की अदा।

अब सिएंगे हम न ये लब,
मुखरित होंगे मन के बोल,
झांक लेंगे प्यार से अब,
खिड़कियां अब दिल की खोल,
इस ज़माने ने सिखादी,
जीने की प्यारी अदा,
है ना ज़िन्दगी, तू बता ।

ईरा पन्त

अपनी ही आवाज़ पर दिल को झिड़कने की मजबूरी। और चांदनी के सपनो से मुहं फेरकर अँधेरे तकिये में मुहं छुपाना। दूसरों की ख़ुशी की खातिर हम अक्सर अपनी इच्छाओं आशाओं की आवाज़ को अनसुना कर देते हैं। लेकिन अब लब खोलकर मुखर होने का समय है तो खोल दीजिये ईरा जी मन की खिड़कियाँ
– डॉ. विनीता राहुरीकर

आवाज़ देते
गर आ नहीं पाये
हम आ जाते।

तेरी आवाज़
बढ़ाती धड़कन
मैं तो खो जाती।

दे दो आवाज़
बढ़ाओ परवाज़
नापें आकाश ।

आवाज़ नहीं
मौन ही करे बात
सुनसान में ।

आवाज़ दे दी
सामने चलते को
अनजान में।

आवाज़ सुन
चौंक देखा उसने
मैं शरमायी।

दोनों की दूरी
झटपट मिटायी
मुसकान ने ।

सुषमा सिंह

दे दो आवाज़, बढ़ाओ परवाज नापे आकाश क्या बात है सुषमा जी, सुनसान में मौन की आवाज़, बहुत बढ़िया हाइकू आपके। – डॉ. विनीता राहुरीकर

मत छेड़ो मेरे मौन को
उसे एकान्त में विचरने दो
मौन मुखरित हो गया तो
दुनिया में तूफान उठ जाएगा

मत कुरेदो इस मौन को
रहने दो खामोशी से पार
जान लो कि तुम कदाचित
सह सकोगे न इसकी आँच को

देखते रह जाओगे तब
विचारों के उठते बुलबुले
एक टीस है वहाँ पर जो
चुभन दे जाएगी दिल पर तेरे

समझ सकते हो क्या
मेरे मौन की भाषा को तुम
तो पढ़ लो इसमें अनकहे
मेरे जज़्बातों की पूरी किताब।

– चन्द्र प्रभा सूद

सुनती हूँ मैं

एक नई दुनिया में जाकर
ख़्वाब सुनहरे बुनती हूँ मैं।

ख़ामोशी मुखरित होती है,
तुमसे मिलकर जाना मैंने।
नयनों की भाषा होती है,
नज़र मिलाकर माना मैंने।

बात तुम्हारे मौन लबों की
चुप रहकर भी सुनती हूँ मैं।

दिल के भीतर खड़ा हिमालय
या बहती है नदिया कलकल।
धधक रही क्या कोई ज्वाला,
होती है जिज्ञासा पलपल।

बीत रहे जो संग तुम्हारे,
उन्हीं पलों को चुनती हूँ मैं।

पहले लगते थे अनजाने,
अब लगते हो पहचाने से।
मुखर बड़ी थी मौन हुई मैं
ऱाज तुम्हारे पा जाने से।

गीत रचाकर आज प्रणय का
सिर अपना बस, धुनती हूँ मैं!

मल्लिका मुखर्जी

आवाज़
सच मैंने सुनी थी
वह आवाज़ दर्द की
जब तुम कराहे थे ।
हां सुनी थी वह आवाज़
जख्मो की जब तुम
छटपटाये थे
तुम्हे कैसे बताऊॅ
वह मौन जब इतना मुखर हो गया था
कि मेरी चीख निकल गई थी
सच कहती हूँ उस वक्त हिल गई थी
मेरे कानों को भी विश्वसनीय नहीं हो रहा था जब दरवाजे पर खड़ी मौत
हाथों में लिए वारंट
दीवार पर हंस हंस कर
किसका रही थी और मैं विकल
अपने प्यार को बचाने की नाकाम
आवाजो के साथ
धराशायी आवाजें
मुझे रौदती
चली गई थी ।
एक आवाज़ फिर भी
शेष थी जिन्दगी की
रोना मत
मेरे लिए
कम न में खिलते
फूलों लिए ।।

– रमा वर्मा श्याम

बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति दर्द की रमा वर्मा जी। कभी कभी कुछ आवाजें उम्र भर सालती रहती हैं।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

एक शेर

आवाजें घोंट दी जायेंगी, तो भीतर ही भीतर कोहराम मचायेंगी
फिर किसी कयामत के दिन चीख बन
कहर सरेआम मचायेंगी

– ज्योति गजभिये

दमन से दबाई हुई आवाजें अक्सर फिर गरज के साथ फूट पड़ती हैं। ज्योति जी। एक फुफकार बनकर। – डॉ. विनीता राहुरीकर

मन की आवाज़

मैं भी तो तुम जैसी ही हूँ
पर कहते सब गूँगी गुड़िया
सारे भाव समझती हूँ मैं
मैं भीहूँ तुम जैसी बिटिया

बोल नहीं सकती हूँ मुँह से
पर मेरी भी ,है आवाज़
हाव भाव, आँखों से कहती
मैं मन के सारे अल्फाज़

बिन बोले ही भाँप जाऊँ मैं
छुपे हुए जो गहरे राज़
माँ का दर्द समझती हूँ
मजबूरी बापू की आज

पर अवाज़ वाले न समझे
दर्द है कितना , कितने घाव
दया दृष्टि, सहानुभूति से
मन में जलता रोज अलाव

नही बोल सकती हूँ मैं
तो क्या इसमें है,मेरा दोष
रोज ही चुभते , खार नयन के
नासूर बनें और बनगए रोष

ना सूरों से करी दोस्ती
वो ही अब हमराज़ हैं
मेरा दोष बताओ क्या है
नहीं मिली आवाज़ है
– डॉ. मंजुला श्रीवास्तव

स्वर नही है तो क्या हुआ, मन के भीतर एक हाहाकार तो है। और भाव तो छटपटाते हैं। डॉ. मंजुला जी बहुत ही करुणा भरे शब्दों में आपने मन की उस छटपटाहट को आवाज़ दी है। बहुत सुंदर कविता है आपकी हमेशा की तरह। सधी हुई – डॉ. विनीता राहुरीकर

आवाज़

किसने दी आवाज़ दी द्वारे पर

क्या मुझे मनाने आए हो?

या सूरज की तपिश लिए

फिर !मुझे जलाने आए हो ?

कांच सा हीरा लिए , क्या,

फिर भरमाने आए हो ?

छोड़ दरकते रिश्तो में मुझे

क्यों विश्वास दिलाने आए हो ?

टूटी वीणा झंकृत हो कैसे !

क्यूँ स्वर साधने आए हो ?

मुखर हुए जब गीत मेरे ,

शब्द लरजाने आए हो ?

सुमन बिछाती रही पथ पर ,

क्या शूल चुभाने आए हो ?

आवाज़ बनी हर जुल्म की मैं

अब मौन कराने आए हो ?

–डॉ. निरूपमा वर्मा —

आवाज़ बनी हर जुल्म की मैं, अब मौन कराने आये हो। जो अपनी मंजिलों पर आगे बढ़ चुके हैं वो कब पीछे की आवाजों को सुना करते हैं। और आवाज़ भी पता नहीं किस प्रयोजन से मुखरित हुई है मनाने या जलाने के लिए। तब तो मन में प्रश्न उठना स्वभाविक ही है। बहुत अच्छी रचना डॉ. निरुपमा जी।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

अद्भुत सचमुच ,अद्भुत है
वह रक्त रंजीत श्वेत इमारत।
मौन कड़ी मुखरित छबि
बता रही कथा करुणा भरी।
प्रणयी का प्रणय निवेदन है
भूखी जठराग्नि की दावा है।
जूट थे जो हाँथ अभ्यर्थना में

बेबश हुए ओ काटकर
कैसी निर्दयी प्रतिभूति थी वह
वः प्रेम प्रतीक स्मारक
हृदय हीन निर्दयी है वः
हर निशां ए मोहोब्बत
कह रहा है मौन रहकर
अद्भुत सचमुच अद्भुत है
वः रक्त रंजीत श्वेत इमारत
जयश्री शर्मा

ताजमहल के पीछे छिपी एक नृशंस कहानी को आपने ठीक शब्द दिए हैं। वास्तव में प्रेम के इस प्रतीक कहलाने वाली इमारत की नींव में न जाने कितने करुण क्रंदनों का स्वर दफ़न है। लेकिन आपकी कविता मौन पर बात कर रही है जयश्री जी। आज का विषय आवाज़ है। – डॉ. विनीता राहुरीकर

आज सोलह दिसम्बर है
जब दामिनी
भीड़ भरी
सड़क पर
जोर जोर से
पूरी ताकत से
चिल्लाई थी
लड़ी थी
भिड़ी थी
पूरे साहस के साथ
उन दरिन्दों ने उसे
बुरी तरह कूटा
जी भर के लूटा
आँतें बाहर निकाल
फेंक दिया
सड़क पर
जहाँ
मदद के लिए
चिल्लाने पर भी
घंटों गाड़ियाँ नहीं रुकीं
फिर भी वो हारी नहीं
फरियाद करती रही
उन्हें सजा देने की
चाह थी उसमें जीने की
उसकी आवाज़
आज भी गूँज रही है
ब्रह्माण्ड में
क्योंकि
आवाज़ मरा नहीं करती
क्या हम सुन पा रहे हैं?

– डॉ. मंजुला श्रीवास्तव- रायपुर छग भारत

दामिनी उर्फ़ ज्योति प्रसाद की दारुण पीड़ा। ओह। जब समस्त देश स्तब्ध रहकर शर्म से पानी पानी हो गया था। डॉ. मंजुला जी। दामिनी की आवाज़ आज भी ब्रह्माण्ड में न्याय की गुहार लगाते हुए घूम रही है। पता नहीं कब सुनी जायेगी। – डॉ. विनीता राहुरीकर

है वक़्त की आवाज़ दबाया नहीं करते,
जो दर्द को सीने में छिपाया नहीं करते ।
करते हैं जो”सागर”
इबादत तहे-दिल से,
भूले से कभी किसको सताया नहीं करते।

– प्रभा शर्मा “सागर”

मुझे नहीं सोने देती–

शीत लहर के आगोश में,
कुकुरों के रोने की आवाज़।
बीच चौराहे मेरी बहन की,
लूटने की आवाज़।
सभ्य समाज में ,
शिक्षित नारी के पीटने की आवाज़।
नवजात कन्या-भूर्ण की,
चीखों की आवाज़।
बाहुबली नेता के आगे,
कमजोर जनता की आवाज़।
मुझे नही सोने देती,
कुछ ऐसी आवाज़,
उठा रही हूँ मुखर हो,
मैं अपनी आवाज़।
नीरव नही हूँ मैं,
तू क्यों न करूँ आवाज़।
मुझे नही सोने देती,
कुछ ऐसी आवाज़।।

— पूर्ति वैभव खरे—

ग़रीबी के भंवर में,
मैं कुछ न ख़रीद पाया !
न रोटी,न दाल,
बच्चों के लिए न ज़मीन,
न सर छुपाने का घर ही !
जो सस्ता और उपलब्ध था,
वही ख़रीदा – मौन !!

राज हीरामन

*आवाज़*

एक दिन
उम्र के ढलते पड़ाव पर
कुछ ठिठक कर
देखा मैंने मुड़कर
कई आवाज़ें खड़ी कतारबद्ध
बुला रहीं थीं मुझे…
इस पूरे जीवन में
सुन चुकी थी सब कुछ
फिर भी आसान न था
अनदेखा या अनसुना कर पाना
आज भी..
समेटा अपने कदमों को
रुख़ किया आवाज़ो का
मुलाकात हुई
पहली आवाज़ से
यह थी
अधूरे ख्वाब की आवाज़
जिसे पाना न था
संसार का स्नेह
न दौलत
न देह…
पर अधूरी थी कहीं
आवाज़ और मैं
दोनों ही
असमंजस में
आज भी पूरा न कर पाने की
बेबसी में बढ़ गयी कुछ आगे
अगली आवाज़ की ओर..
सुनी मैंनें
एक कलश चावल की आवाज़
और दख़ल था मेरा
हर शय में…
उसका विराट फैलाव
मेरी पहचान बना
जीवन और सघंर्ष की पहचान
जिसे कोई पहचान ही न पाया..
दुखी है कलश
अब कर पाने में भरपाई !
बढ़ी मैं फिर कुछ आगे
खड़ी थी नज़रे झुकाए
मेरे मन की आवाज़…
घुट रही है आज भी
मेरे ही सामने
असमर्थ सी
और लड़खड़ाती हुई..
सम्बल दिया
और बढ़ गई मैं
बेचैन आवाज़ों की
अन्तहीन यात्रा पर…

*करुणा सक्सेना* ग्वालियर, मध्यप्रदेश
आवाज़
भोर की बेला,पनघट पर गाये पनिहारिन मधुर गीत ।
अमिया की डाली मे कोयल कूके मीठे
संगीत।
नदिया मे नाव खेते-खेते नाविक गाये ददॆ भरे गीत।
सबके अंतस से निकले अंदरूनी रूहानी
आवाज़।
जो अलख जगा दे उस परमपिता के नाम की आगाज।
– गीता भट्टाचार्य

आवाज़ सुनो
सब बेसहारों की
सहारा बनो
शब्दों में ढली
हृदय की आवाज़
प्रार्थना बनी
न दो आवाज़
पुरानी सुधियों को
रहो आज में
आनंदबाला शर्मा
जो वक्त की आवाज़ को दबाया नहीं करते, जो तहे दिल से इबादत करते हैं वो किसी को सताया नहीं करते। बहुत खूब कहा प्रभा शर्मा जी।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

पूरे समाज का ही नहीं प्राणी मात्र के दर्द को भी आवाज़ दी है आपने पूर्ति। यह आपके मन की कोमल संवेदना को दर्शाती है। कुछ आवाजें ऐसी ही होती हैं जो नींद में भी मन को सुनाई देती रहती हैं। बहुत अच्छी कविता आपकी। – डॉ. – डॉ. विनीता राहुरीकर

बहुत दिनों बाद आज आदरणीय राज हीरामन जी को पढ़ने का सौभाग्य मिला। बहुत ख़ुशी हो रही है आज आपकी रचना पढ़कर। आपकी बहुमूल्य समीक्षाओं की बहुत याद आती है। कितना कुछ सीखने को मिलता था। – डॉ. विनीता राहुरीकर

बैचेन आवाजों की अंतहीन यात्रा पर…. जीवन भर हम दूसरों के तय किये मार्ग पर ही खुद को होम करते चलते हैं। कहाँ खुद के ख्वाब और चाहतें पूरी कर पाते हैं। एक बेबसी सी बन जाती है जिंदगी। अधूरी इच्छाओं की टूटी हुई आवाज़ बनकर गुज़र जाती है।। करुणा जी बहुत संवेदनशील कविता आपकी। – डॉ. विनीता राहुरीकर

वाह गीता जी, भोर की बेला, पनिहारिन का गीत, अमिया की डाली पर कोयल का संगीत, नाव, नाविक, और परमपिता की अलख। उजास छा गया मन पर। – डॉ. विनीता राहुरीकर
आवाज़….
नहीं मैनेँ अनसुना नहीं किया
उस आवाज़ को
जो मेरे भीतर से
उठती थी…
हर बार मैंने
बहुत ध्यान से सुना
समझा, और अमल किया
उसकी बात पर…
क्योंकि वही थी जो
मुझे समझती थी
जानती थी
सबसे बेहतर, सबसे बढ़कर
मुझे पूरा विश्वास था उस पर…
तभी मै आज भी
सुनती हूँ पूरी ईमानदारी से
उसकी आवाज़
चलती हूँ थामकर
उसका हाथ…
पूरा सम्मान देती हूँ
मैं उसे,
आज जो भी हूँ
सिर्फ उसी आवाज़ की वजह से हूँ
वह आवाज़
जो सुन सकती हूँ सिर्फ मैं
मेरे स्व की…
डॉ. विनीता राहुरीकर
अतीत को भूलकर आज में रहना, जब मन के भाव शब्दों में ढल जाते हैं तो प्रार्थना बन जाते हैं बहुत सुंदर पँक्तियाँ आनंद बाला जी। बेसहारों की आवाज़ सुनकर उनका सहारा बनने की प्रेरणा। – डॉ. विनीता राहुरीकर

(दामिनी) —-
तुम्हारे जाने के बाद
देखना यह है, कि
हम क्या कर पाये?
पता है तुम्हें,
हम सिर्फ तारीख
याद रख पाये
उस तारीख के बहाने से वह सब
कि कैसे तुमको नोचा गया,
घसीटा गया, पटका गया,
तुम्हारे नरम शरीर के अन्दर
लोहे को डाल
तुम्हारी आंतो को बाहर निकाल
कैसे तुमको तड़पाया गया
पर आज भी इस घटना को
हम सब कविताओं में, कहानियों में
और टी वी चैनलों पर
सुना और दिखा रहे हैं
लेकिन उन दरिन्दों का हम
हश्र नहीं दिखा पा रहे हैं
क्योंकि
कमजोर हैं हम कानून से
राजनेताओं के खेल से
समाज की उल्टी सोच से
पता है तुम्हारे अपराधी को
सिलाई मशीन देकर कहा गया है
कि वह कपड़े सिलकर पश्चाताप करे
तुम उदास मत होना यह सोचकर कि
तुम अब कपड़े नहीं पहन सकती
मेरा यकीन मानो उस नीच के हाथ
कपड़े सिल भी नहीं सकते
कुछ भी नहीं बदला
सब वैसा ही है
आज भी लुट रही हैं अस्मतें
चल रहा है नंगापन
गली- कूचे और चौक- चौराहों पर
लोग बस आंखें फेर कर
लांघ रहे है जिंदा लाशों पर से,
क्या करती तुम जी कर ?
कौन सा संघर्ष करती?
कहां बैठ धरना प्रदर्शन करती ?
यहाँ तो सिर्फ वोट पाने को
धरने धरते हैं लोग
इंसाफ के मंदिरों में
पहरा है भ्रष्ट ठेकेदारों का
क्या अब भी तुमको लगता है कि
तुम फिर से जन्म लेना चाहती हो
इस नपुंसक समाज में ।।
– मीना सदाना अरोरा
दामिनी तो क्या हम तो किसी के लिए कुछ नहीं कर पाये मीना जी। इस देश में कानून व्यवस्था इतनी लचर है कि 70 बरस बाद भी अपराधी को सजा नही मिल पाती। जहां देश के रक्षक स्वयं ही सुरक्षित नहीं हैं वहाँ आम जनता का और क्या हाल होगा। मार्मिक कविता। – डॉ. विनीता राहुरीकर

घण्टियाँ अब और मै कितनी बजाऊँ
उंघते देवताओं को कैसे जगाऊँ
भाव के भाव भी अब बढ़ चले हैं
मन भर ये थाल मै कैसे लगाऊँ
दूध का जला होकर भी अब जाने
दिल में नवस्वप्न मै कैसे सजाऊँ
अनजाने अन्याय को तुम देखते हो
प्रीत भी और नेह भी कैसे जताऊँ
छोड़कर आसन घड़ी भर आ सको तो
आओ मै अब आदमी तुमको बनाऊँ
शंख की आवाज़ से जागे नही जो
अब अजां देकर उन्हें कैसे उठाऊँ
वर्षा रावल

देवताओं का आव्हान और न आने का उलाहना। कभी तो बड़ी व्याकुलता होती है कि अब सारे देवता कहाँ चले गए। जो शंख की आवाज़ से जागे नहीं… यही तो व्यथा है वर्षा जी ।
– डॉ. विनीता राहुरीकर
काफ़िला यादों का
फिर दिल से गुज़रता रहा
कोई दूर से, देर तक
आवाज़ देता रहा
थे मजबूर हम, कर अनसुना
उस आवाज़, को चलते रहें
एक लम्हा तेरे प्यार का
आज फिर मचलता रहा
आज भी तेरी आवाज़ के शब्द
बनकर सरगम सज़ते रहें
दिल तेरी आवाज़ पर फिर
एक अफसाना बुनता रहा
काफ़िला यादों का
फिर दिल से गुज़रता रहा
कोई दूर से, देर तक
आवाज़ देता रहा
– नीता सक्सेना

दिल से गुज़रते यादों के काफिले से कोई देर तक आवाज़ देता रहा। अतीत के आगे अक्सर इंसान मजबूर हो जाता है, और उस अवाज को हम पीछे छोड़ देते हैं। लेकिन उस आवाज़ की सरगम पर उम्रभर एक अफ़साना तो बुनता ही रहता है। चांदनी रात सी रोमानी आपकी कविता नीता जी ।
– डॉ. विनीता राहुरीकर

मौन

मौन के इस विस्तार में-
डूबते उतराते न जाने कितने प्रश्न-
अपने निरुत्तर होने का बोझ ढो रहे हैं…
यह अनगिनत त्रिशंकु –
हमारे इर्द गिर्द इसी इंतज़ार में मंडराते हुए…
की कब कोई आह …कोई सिसकी, इन्हें बींधे ..
और इन्हें मिल जाये एक आसमान.. या फिर एक ज़मीन ..
—जिसकी जो नियति हो!
और हम –
हर ख़ुशी, घंटों…. इसी मुद्रा में गवां देते हैं –
पल..घंटों में…
घंटे प्रहारों में..
और प्रहर…दिनों… हफ़्तों …महीनों में
परिवर्तित हो जाते हैं…
लेकिन यह मौन..
जस का तस-
बींधे जाने के इंतज़ार में-
और विस्तार पाता जाता है.

– सरस दरबारी
बिंध जाने के इंतज़ार में और विस्तार पाता जाता है। बहुत सुंदर रचना आदरणीय सरस जी। किन्तु आज का विषय आवाज़ है। – डॉ. विनीता राहुरीकर

हर पंक्ति में एक हायकु है-
आवाज़ नहीं, मौन ही करे बात ,सुनसान में।
आवाज़ दे दी ,सामने चलते को, अनजान में।
आवाज़ सुन ,चौंक देखा उसने, मैं शरमाई ।
दोनों की दूरी ,झटपट मिटी है, मुसकान में।
सुषमा सिंह
जी सुषमा जी बहुत बढ़िया हाइकू आपके – डॉ. विनीता राहुरीकर

नर्तकी
आवाज़ छेड़े जैसे संगीत के साज़ों को
आके छेड़ा है तूने मेरे दिल के तारो को
बिन घुँघरू नर्तकी बन नाच उठी “प्रीत”
तूने ही सुलगाया बुझे हुये अंगारो को
डॉ़. प्रियंका सोनी “प्रीत”

“अनंत कैद – पंगुता”
परकटे परींदे की तरह, खंडित शरीर में, आत्मा फड़फड़ाती है,
तब मुझे उनकी व्यथा समझ मेंआती है
पंगुता का अभिशाप, लील लेता है पूरे जीवन को,
केवल असीम दृढ़ता ही, इससे पार पा पाती है…
हर तरफ हैं सकैंड़ों प्रश्न, क्यों..?, कैसे..?, क्या..?
सर उठाकर इनका, जवाब देने की हिहम्मत,
बिरलों में ही आपाती है…
मौका नहीं चूकते लोग – हीनता का अहसास कराने का,
नीचा दिखाने का,
इसका फ़ायदा उठाने का,
अटूट साहस और अदम्य जीजिविषा ही,
इसका ड़टकर सामना कर पाती है…
गहन जख्म दिये हैं, जिन्होंने दुखित ह्रदय को,
एक संस्कारी, धीर-गंभीर चेतना ही, उन्हें क्षमा कर पाती है…
छिन्न-भिन्न अंतस के टुकड़े सहेज कर आगे बढती हूूँ,
भग्न ह्रदय से, जीवन का गीत रचती हूूँ,
पास ना आये हताशा, दूर रहे निराशा,
एक दृढ़ इच्छाशक्ति ही, चट्टान की तरह, वहाँ अडिग रह पाती है,
जहाँ आशा की नन्ही लौ टिमटिमाती है,
और आगे बढने की राह दिखाती है…
-अर्पणा शर्मा
मैं लौटना चाहती हूँ, हां चाहती हूँ लौटना उसी संसार में
जहाँ सुनाई देती है आज भी
वही चिर परिचित आवाज़
पर नियति ने किया कैसा छल
न रहा उनका साथ
न वो बसन्त की बहार
न कोयल की कूक
रह गई बस एक हूक
टूट कर बिखर गए वो
सारे के सारे सुनहरे पल
बेवफा कहलाईं मैं
वो सारी तोहमत
शेष न बची कोई
आस न चाह कोई
पर मैं फिर भी टूटी नही
मन को समझाया ,सम्हली
यही नियति है सोच आगे बढ़ी
अब बिताना चाहती हूँ
बचे हुए जीवन के पल
उन्ही यादो के सहारे
उसी पुकारती आवाज़ को सुनते
यादो के उसी संसार में लौट जाना
चाहती हूँ एक बार, बार बार
वृंदा पंचभाई

बहुत ज़ोर से मुस्कराकर,
मखौल कर रही है
यहां वहां जहां कहां
फुदक फिदक रही है
सनसनाहट,भिनभिनाहट,
घबराहट,झनझनाहट?
बहुत ज़ोर की आवाज़ ____ सुनसान
मस्तिष्क में भरी है
वन्या जोशी

आदरणीय अध्यक्ष जी
नमस्कार, हायकु प्रस्तुत हैं

“आवाज़”

चीख़ना मत
कहकर उसने
मुँह दबाया

कब तक यूँ
मेरी आवाज़ चुप
रह पाएगी

आख़िरकार
एक दिन फूटेगा
मेरा ग़ुबार

टूटे बाँध को
रोकना असंभव
आएगा बाढ़

चीख़ पुकार
चण्डी का प्रतिशोध
शिव बेबस

रक्त की धार
प्रलय हाहाकार
रोक सकोगे?

वह्शियों के
दमन से ही सच्ची
श्रद्धांजलि है

डॉ.प्रीति प्रवीण खरे – भोपाल म.प्र

विश्व मैत्री मंच के ‘आवाज़’ के जादू पर अध्यक्ष सुनीता मैत्रेयी का वक्तव्य
आज काव्य गोष्ठी के दिन आज *आवाज़*
कल शब मुझे बेशक्ल की आवाज़ ने चौंका दिया!
मोहसिन की आवाज़ को शक़्ल कस्तूरी की—- मुखर किया मोहसिन की आवाज़ को कस्तूरी ने—ख़ूबसूरती के साथ!!
सन्नाटा जब भयभीत करता है,कहा संतोष जी ने तो तन्हाइयाँ भी तड़प उठती हैं!
वाक़ई ये अकेलेपन की तड़प और तड़प की आवाज़ ,हमें कितना विचलित कर देता है।
उफ़ ” दर्द जब बयानगी पर उतरेगा तो इंतहा तो होगी ही!
*आवाज़* — : एक शब्द के कितने भाव आज मंच पर! सच है आप सभी आशु कवि हैं और आपकी लेखनी को मेरा नमन है!
जब एक आवाज़ के इतने रंग और रूप दिखें तो मेरा तो मौन ही आपको पढ़ेगा मित्रों!
वही हुआ भी——*
अध्यक्षा की औपचारिकता फिर भी निभानी है. … सो आएँ——
मौन तोड़ा सर्वप्रथम मधु ने! आपका शानदार आग़ाज दोस्त! इतने बिम्ब और आकर्षक शिल्प से भाव बिखेरे कि आवाज़ मुझ तक क्या ,हरएक तक पहुँची… असीम बधाई!
अरे! अमर जी !
क्या कह गए गद्य में आप! आप लिखते नहीं कहते हैं और आपकी बात ही कविता है!
किंतु प्रेम और मौन पर अधिक कहा—-आवाज़ दब गई! पर कहन की बधाई
बहुत ख़ूबसूरत कहा!
जीतेश जी आपके शेर—कोहरामों में सन्नाटा …. कमाल हैं दो लाइन ही….. चीख़ों की बेताबी हम तक पहुँची! बधाई!
गीता जी बोलीं क्या—- प्रश्न ही कर बैठीं! कौन बुलाए? हम क्या जाने ! पर आपका मन जानता होगा!
कम कहा भाव पूर्ण कहा!
संतोष जी! मुख़ातिब हुईं!
सुन रहे हैं न आप? अभिव्यक्ति एक नहीं कई आवाजों को व्यक्त करती,
समंदर के जेहन से टकराकर निकली आवाज़ें —- निश्चित व्याकुल हुई मैं!
आशा जी की सार्थक, भावप्रधान रचना! विशेष बधाई लें आप!
बस वाहह कह पा रही हूँ….
लगती नहीं त्वरित है! लेखनी को नमन!अस्तित्व की आवाज़/ प्रशंसा जितनी हो कम है!
मंजुला जी या तो विधा हो या अतुकांत!
श्रम थोड़ा और हो /भाव सुंदर हैं
वाहहहह!
मल्लिका जी!
बात तुम्हारे मौन लबों की*
ख़ूबसूरत गीत —- आवाज़ से हट गया! पर मुझे बेहद पसंद आया! बधाई लें!
महेश जी
फ़र्क़ … बहुत गहरा अर्थ लिए ,कम शब्दों में ….
आपको नमन! आप इतना मज़ाक करते हैं / लगता नहीं , कि आप ऐसा कह देंगे!बस निःशब्द हूँ!
लता जी
आपकी आवाज़ बख़ूबी दम-खम के साथ हम तक पहूँची! हर तन्हाई का ज़िक़्र हर आवाज़ की अनुभूति हुई
बधाई
पापा का गीत है वर्षा जी ,नमन वंदन मेरा! ये हमारी धरोहर है! किंतु आपने मौन शेयर किया / शब्द आवाज़ था!
इरा जी
आवाज़ का दूसरा रूप दिखाया आपने — भाव बहुत सुंदर हैं/थोड़ा परिष्कार माँगती है!
सपनों की तकिया/व्याकरण त्रुटि!
बधाई लें सुंदर आवाज़ की!
सुषमा जी
विधा स्पष्ट नहीं हुई!
किंतु लिखा अच्छा है!
भावयुक्त!
चन्द्र प्रभा जी
मत छेड़ो मेरे मौन को/ मौन भाव ही केन्द्रित हैं, शब्द आवाज़ था!
किंतु रचना और भाव शानदार हैं ,बधाई लें!
शैलजा पाठक जी की कविता …. महेश जी ने साँझा की—- बधाई उन तक पहूँचे! स्तब्द्ध हूँ!
रमा वर्मा जी
कुछ वर्तनी में अशुद्धियाँ हैं कुछ भाव भटके और कथ्य अंत में अस्पष्ट है! पुनः प्रयास हो तो मज़ा आए!
शुभकामनाएँ…
ज्योति जी वाह हहहह!!
ये क्या कह गईं आप!!
वाक़ई मचाएँगी!! बधाई आपकी सोच और भाव को, समझ को!!
बहुत अच्छी आवाज़ मंजुला जी! शिल्प, भाव सभी! यदि आप विधा पर काम करें तो सुंदर काव्य लिख सकती हैं
शुभकामनाएँ
अमर जी
पद्य में प्रयास
सुंदर सीख! पर आवाज़ , शोर , चिल्लाने में अन्तर है!
कथ्य में आवाज़ के भाव लाइए न!
निरुपमा जी
प्रथम पंक्ति में दी की पुनरावृत्ति है,भूलवश हो!
भाव देखें—–
प्रथम चरण में पूछा मनाने आए तुकांत है जलाने आए… जो विपरीत हो गया!
कथ्य ,भाव ,विधा में कमी है …. पुनः प्रयास हो!
शाम…. नाम समझ नहीं आया ,क्षमा!
कविता भी कथ्य भी आवाज़ से भटकी है —

मंजुला जी
दामिनी ने तब भी दहलाया था आज आपके शब्दों ने भी! बधाई!
प्रभा जी
ग़ज़ब लिखा इस बार!
मुक्तक की बधाई!
पूर्ति जी
शानदार भावयुक्त रचना!
कमाल की अभिव्यक्ति!
किंतु आवाज़ की पुनरावृत्ति खटक रही है, उसको कम करेंगी तो वज़न बढ़ेगा!
मंजुला जी
सचित्र कविता/बेहद मार्मिक

राज हीरा जी
आपने मौन पर लिखा/.भाव अच्छे हैं!
करूणा जी
सुंदर बधाई
नई कविता की हर शर्त पूरी करती कविता! आप सामने होतीं तो गले लगा लेती!
वाह वाह वाह!!!
आपने गीता जी सुंदर लिखा
दो- तीन बंद और लिखिए…. सुंदर गीत बनेगा!
भाव सुंदर बुने आनन्द बाला जी!
विनीता जी
बहुत ख़ूब!
सार्थक और सटीक
बधाई लें
स्वीकार किया सच को आपने, अच्छा किया!
वाह मीना जी
दामिनी की आवाज़ आपकी कलम से ललकारती हुई!
नपुंसक समाज को आईना भी दिखाया/बधाई लें।
वाहहह वर्षा जी
आपने भावों की माला को बहुत सुंदर पिरोया!!
शंख की आवाज़—-
नीता जी
दिल की आवाज़ पर अफ़साना बुना आपने! बढ़िया है!
सरस जी अच्छा लिखा पर मौन पर ही था!
सुषमा जी
अंत में हायकू आए आपके आवाज़ पर!
सैटिंग भी ठीक हो तो पठनीय व प्रभावित करेंगे!
असलम जी का लिंक है — आवाज़ पर भी नहीं!
प्रियंका जी
साजों/तारों/अंगारों — तुकाँत ठीक करने होंगे!
भाव सुंदर!
अच्छी कविता अपर्णा …. आवाज़ से हटकर!
वृंदा जी
बहुत ख़ूब! ग़ज़ब और कमाल! यादों के संसार में लौट पाना ही ,स्वयं की तलाश तक पहूँचना है!
वन्या जी
बस जल्दी वाली ही है
प्रीति जी सबसे अंत में सार्थक हायकू हुए!
बधाई
आप सभी को मेरी अल्पबुद्धि से समीक्षा की है!
किसी का नाम छूटा हो तो क्षमा!!!
विनीता जी बहुत ख़ूब संचालन … वाहो फ़ैक्टर!
संतोष जी आपका आभार!
सभी लेखकों की लेखनी को नम
सुरभि दी ,मधु जी
आपका स्नेह मुझ पर!

आत्मीय स्वागत है प्रीति जी आपका। बहुत बढ़िया हाइकू आपके। आवाजों को दबाकर रखना असम्भव है। एक दिन तो गरज ही जाती हैं। डॉ. विनीता राहुरीकर

आपका हार्दिक धन्यवाद सुनीता जी। व्यस्ततम समय में भी आपने सभी रचनाओं को पढ़ा और सार्थक समीक्षा दी।

शुक्रिया सुनीता
बहुत सुंदर वक्तव्य था तुम्हारा। सभी की कविताओं पर बहुत सटीक बात की तुमने। आज के अध्यक्षीय वक्तव्य के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया।

विनीता जी अपने खूबसूरत संचालन से सारे दिन आपकी प्रतिक्रियाओं के संग रही अपनी भाषा का जादू बिखेरती रही। विनीता जी आपकी मैं बहुत आभारी हूँ ।

दोस्तों एक बात कहना चाहती हूँ ।कृपया दिये हुए विषय को ध्यान से पढ़ लिया करिए। कई लोगों ने आवाज़ को ही मौन कर दिया जबकि आज आवाज़ पर कविताएं आमंत्रित थी।आप की सभी कविताएं परसों हिंदी मीडिया में आप पढ़ सकेंगे प्रतिक्रियाओं के साथ ।

और एक बात कुछ लोग अभी भी नियमों का पालन नहीं करते हैं। आपके सहयोग से ही विश्व मैत्री मंच आगे तक जाएगा ….जा रहा है लेकिन हर चीज के नियम बहुत जरूरी है। इसलिए बार-बार आग्रह है नियमों का पालन करें। इतर पोस्ट न डालें। कस्तूरी के बनाए पोस्टर बहुत ही ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। जो कि हर दिन हिंदी मीडिया में भी प्रकाशित हो रहे हैं ।कस्तूरी तुम्हें इस उपलब्धि के लिए बधाई।
संतोष श्रीवास्तव

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