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लूट की हाँ छूट हो

हेमंत की शीतलता,
झुका सकेगी क्या उन्हें?
सेकनी है स्वार्थ रोटी,
प्रकारांतर से जिन्हें।।

फसल की वाजिब हाँ,
मिले कीमत किसान को,
कहो है गुरेज किसको ?
खुलकर सामने आए
हो विरोध जिसको?
किन्तु प्रश्न यह,
है ही नही,
बोलने को सत्य ,
तैयार कोई,
है ही नही।।

कृषक का स्वार्थ है उसे,
अधिकतम मूल्य मिले,
सरकार चाहे फसल,
उसे सस्ती मिले,
बिचौलियों की चाह,
उनको कमीशन मिले,
अफसरों को भेंट दो,
ताकि सब परमीशन मिले,
व्यापारियों को मुनाफे की,
खुली सब छूट हो,
पूँजी पति कह रहे
हिस्से में हमारे,
कुछ तो लूट हो।

जनता की परवाह किसको,
भले ही सब आह उसको,
लूट हो निर्बाध,
चाह सबकी यही है,
व्यर्थ है पूछना ,
कहना या सुनाना,
गलत क्या है ?
और क्या सही है?

लब्बो लुआब आंदोलन
का यही है “विनोदम्”
सबको कुछ न कुछ,
लूट की हाँ छूट हो।।

विनोदम्
16 दिसम्बर, 2020

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