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इस देश में आप इस्लाम की आलोचना नहीं कर सकते‍!

सौ साल पहले, 1920 में लाहौर में मुसलमानों की ओर से दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जो भगवान कृष्ण और महर्षि दयानन्द पर आक्षेप करती थीं। एक ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’, और दूसरी ‘बीसवीं सदी का महर्षि। दोनों की भाषा बड़ी गंदी और हिन्दू धर्म पर घृणित प्रहार था। इसके उत्तर में एक आर्य समाजी विद्वान ने ‘रंगीला रसूल’ पुस्तक लिखी, जिस में प्रोफेट मुहम्मद के जीवन का तथ्यपूर्ण वर्णन था। लेखक अपना नाम नहीं देना चाहते थे, पर उक्त पुस्तकों का उत्तर देना भी आवश्यक था। उन्होंने प्रतिष्ठित प्रकाशक महाशय राजपाल (जिन के यशस्वी बेटों का आज ‘राजपाल एंड सन्स’ और ‘हिन्द पॉकेट बुक्स’ है) से निवेदन किया। तब लेखक के स्थान पर ‘‘दूध का दूध, पानी का पानी’’ देकर पुस्तक छपी।

क्रुद्ध मुस्लिमों ने लेखक का नाम बताने को कहा, वरना प्रकाशक पर हमले की धमकी दी। परन्तु राजपाल जी ने लेखक को दिया वचन नहीं तोड़ा। उन्हें धमकियाँ मिलने लगीं। उन पर 1926 में खुदाबख्श नामक एक व्यक्ति ने छुरे से हमला किया। संयोगवश उसी समय आर्य समाज के सन्यासी स्वामी स्वतंत्रानन्द उधर से गुजर रहे थे, और राजपाल से मिलने दुकान पर आ गए। उन्होंने राजपाल को बचाया। खुदाबख्श पकड़ा गया और उसे सात साल की जेल हुई। राजपाल तीन महीने अस्पताल में रह ठीक हुए। कुछ बाद फिर एक मुसलमान ने दुकान पर संयोग से बैठे स्वामी सत्यानन्द को राजपाल समझ पर छुरे से हमला किया। वह भी पकड़ा गया, और उसे जेल हुई। सत्यानन्द भी दो महीने अस्पताल रहे।

इस बीच महात्मा गाँधी ने अपने अखबार ‘यंग इंडिया’ में राजपाल के खिलाफ बड़ा उत्तेजक लेख लिखा। यह भी कि, ‘‘एक तुच्छ पुस्तक विक्रेता ने कुछ पैसे बनाने के लिए इस्लाम के पैगम्बर की निन्दा की है, इस का प्रतिकार होना चाहिए।’’ गाँधीजी की भाषा इतनी घटिया थी कि वीर सावरकर, डॉ. अंबेदकर, समेत देश के कई बड़े लोगों ने उस की निन्दा की। विशेषतः राजपाल जैसे अत्यंत सम्मानित व्यक्ति के लिए क्षुद्र बातें लिखने के लिए। साथ ही, मामले पर एकतरफापन और मुसलमानों को भड़काने के लिए। उस के बाद राजपाल के खिलाफ नए फतवे आए, जिस में दिल्ली की जामा मस्जिद से गाँधीजी के दोस्त मौलाना मुहम्मद अली का उग्र भाषण भी था। सो, तीसरी बार 6 अप्रैल 1929 को फिर दुकान पर ही राजपाल पर इलमदीन नामक व्यक्ति ने छुरे से हमला किया, जिस से उन का प्राणांत हो गया। लाहौर में एक लाख लोगों का शान्ति-जुलूस निकला, और सभी गणमान्य लोगों ने राजपाल को भूरि-भूरि श्रद्धांजलि दी। राजपाल की पहली जीवनी उन के मित्र रहे अब्दुल रहीम ने लिखी थी।

उस ऐतिहासिक घटना का मूल अंश बार-बार दुहराया मिलता है। मुसलमान दूसरों के धर्मों, देवी-देवताओं, के बारे में ऊल-जुलूल बातें बोलना अपना अधिकार समझते हैं। छोटे ओवैसी का एक सार्वजनिक सभा में भगवान राम और माता कौशल्या पर बेहूदी बातें कहते वीडियो वर्षों से प्रचलित है। अभी बंगलौरू में कुछ वही हुआ है। लेकिन हिन्दू इस्लामी ग्रंथों में ही प्रोफेट मुहम्मद के बारे में लिखी बातें कह उत्तर देते हैं, तो दंगा होता है। तब राजनीतिक-बौद्धिक या तो चुप रहते या गाँधीजी की तरह मुसलमानों का पक्ष लेते हैं। इस विषम स्थिति का उपाय क्या है?

श्रीअरविन्द जैसे ज्ञानियों ने मार्ग बताया था, पर गाँधी के प्रचार में वह सब छिपा दिया गया। हाल में भी तुलनात्मक-धर्म विशेषज्ञ कूनराड एल्स्ट ने इसे लिखा, बल्कि करके भी दिखाया। उन्होंने एक मुस्लिम देश में मुस्लिमों के बीच इस्लाम एवं प्रोफेट की आमूल आलोचना करते व्याख्यान दिया। काफी सवाल-जबाव के सिवा और कुछ न हुआ।

इस्लाम की आलोचना की कुंजी है – उसे प्रोफेट की निजी विशेषताओं से हटाकर सैद्धांतिक दावों का खंडन करना। मुस्लिमों को व्यक्तिगत/सामूहिक दोषी न ठहराकर उन के मतवाद पर फोकस करना। प्रायः उलटा होता है। जैसा इधर तबलीगी जमात, या दिल्ली माइनॉरिटी कमीशन के चेयरमैन जफरुल खान के भारत-विरोधी बयानों पर हुआ। इन्हें ‘भटका हुआ’ मुसलमान कह कर इस्लाम को सिरोपा चढ़ाया जाता है। गुरू गोलवलकर से लेकर बराक ओबामा तक यही चल रहा है। सारी क्रिया-प्रतिक्रिया व्यक्ति-समूह केंद्रित रह जाती है। समस्या की जड़ अछूती बची रहती है।

बात इस्लाम के दावों पर लानी चाहिए। तमाम सांप्रदायिक इतिहास एक ही कहानी कहता है। तात्कालिक घटना कुछ हो, इस्लामी मतवाद ही मुसलमानों से सदैव एक-सा व्यवहार कराता है। यह यहाँ हजार साल से जाहिर है। बाहरी हमलावर मुसलमान, भारत में शासक मुसलमान, और हिन्दुओं के पड़ोसी मुसलमान – सब ने हिन्दुओं के साथ प्रायः एक सा व्य़वहार किया। मंदिर व देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ना, अपमान, जबरन धर्मांतरण या मार डालना। यह सब इस्लामी इतिहास किताबों में हजारहा लिखा है। आज भी खुमैनी से लेकर जफरूल, ओवैसी, जाकिर, बुखारी, नदवी, आदि बड़े-बड़े मुस्लिम नेता खुल कर जब-तब धमकियाँ देते और वही कारनामे करते हैं।

पर मुसलमानों द्वारा होते कार्य-विचार की भर्त्सना या कानूनी कार्रवाई नहीं होती। सो, उन्हें लगता है कि दूसरे उन से डरते हैं। कि इस्लाम को दुनिया पर राज करने का अधिकार है। कि दूसरे धर्म वालों को मिटना या धर्मांतरित होना है। कि मुहम्मद सारी मानवता के अंतिम और स्थाई आदर्श हैं। कि उन का अनुकरण कर के मुसलमानों ने तलवार के जोर से इतनी दुनिया जीत ली, और बाकी भी जीतना है। यही इस्लामी मतवाद के मूल तत्व हैं, जो मुस्लिमों को शुरू से रटाया जाता है।

जबकि संपूर्ण भूत-भविष्य कौन कहे, इस्लाम को तात्कालीन दुनिया की भी खबर न थी! कुरान और सुन्ना की सारी कथाएं केवल बाइबिल पर निर्भर मिलती हैं। यद्यपि प्रोफेट मुहम्मद के समय मध्य एसिया, भारत, चीन, आदि में बड़े-बड़े बौद्ध व हिन्दू राज्य थे। असंख्य हिन्दू और बौद्ध कथाएं, देवी-देवता, अवतार, धर्म-विचार, दर्जनों देशों में सदियों से प्रतिष्ठित थे। किन्तु इस्लामी अल्लाह या प्रोफेट को उस का कुछ पता न था! उन की तमाम जानकारी बस अब्राहम, यहोवा, जीसस, मेरी, तक सीमित थी। कुरान व हदीस में ही अनेक उल्लेख हैं, जिन से पता चलता है कि अनेक अरब भी मुहम्मद की बातों को यहूदियों की नकल समझते थे। कुरान में ऐसा कुछ नहीं है जिसे दैवी या विशेष ज्ञान कहा जा सके। जिसे सातवीं सदी का कोई अन्य साधारण अरब व्यक्ति नहीं कह सकता था।

अतः इस्लामी मतवाद का ‘एक मात्र सत्य’ होने का दावा उसी समय अरब में ही संदिग्ध था। इसीलिए, इस्लामी दावों को आज के उलेमा नए-नए रंग-रोगन में पेश करते हैं, जिसे सदियों से अपरिवर्तनीय बताते थे। अब वे इस्लाम में गुलामी-प्रथा, स्त्रियों के प्रति नीच व्यवहार, संगीत व चित्र-कला की मनाही, आदि की ऐसी व्याख्याएं देते हैं जो हजार सालों में कभी नहीं दी गई। यही ध्यान देने की जरूरत है। इस्लामी मत सत्य नहीं है। इसीलिए साहित्य, कला, नैतिकता, साइंस, तकनीक, तथा सामाजिक व्यवस्था – हर चीज में मुसलमान पैदल रहे। बिलकुल शुरू से! केवल धमकी, हिंसा और धोखे-छल भरी राजनीति उन का बल है। य़ही वे अपने समाज में भी इस्तेमाल करते हैं। मतभेद दिखाने, प्रश्न उठाने वाले मुसलमान को भी मारा-धमकाया जाता है। इसीलिए किसी मुस्लिम देश में लोकतंत्र या विचार-स्वतंत्रता नहीं है। यह कैसा सत्य है?

यह तो सत्य से भय, दुर्बलता और बर्बरता है। इस की अल्पजीविता मुसलमानों को सहजता से बताने की जरूरत है। दूसरे लोग मानवीय नैतिकता का पालन करते हैं, इसलिए मुसलमानों को बराबर का सम्मान देते हैं। यह कोई डर नहीं, सभ्य व्यवहार है। केवल वे इस्लाम की मूल बातें – जिहाद, कुफ्र, शरीयत, जिम्मी, जजिया, तकिया, जैसी घातक धारणाएं – तथा इस्लामी इतिहास नहीं जानते। इसीलिए उस से निपटने का उपाय नहीं करते।

ऐसे संकीर्ण, निष्फल मतवाद को शान्ति-पूर्वक, किन्तु निर्भीक होकर आइना दिखाना ही उपाय है। यह दूसरों का आत्मरक्षात्मक अधिकार भी है! अतः हिन्दुओं को पहले भारत का गत सदियों का इतिहास ठीक से जानना चाहिए। शुरुआत के लिए सीताराम गोयल की पुस्तक ‘भारत में इस्लामी स्रम्राज्यवाद की कहानी’ (वॉयस ऑफ इंडिया, नई दिल्ली, 2020) देख सकते हैं। सत्य से ही हिन्दू भयमुक्त होंगे, और मुसलमान भी विवेकशील बनेंगे।

(लेखक राजनीतिक व ऐतिहासिक विषयों पर शोधपूर्ण लेख लिखते हैं)

साभार https://www.nayaindia.com/ से

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