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बोलने की प्रभावी कला से करें लोगों के दिलों पर राज – डॉ.जैन

राजनांदगांव। आज के दौर में व्यवहार और रोजगार के क्षेत्र में संवाद कौशल का महत्व बढ़ता जा रहा है,लेकिन, प्रख्यात वक्ता और दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर डॉ.चन्द्रकुमार जैन का कहना है कि कुछ लोग हैं जिनके पास कहने योग्य कुछ भी नही होता पर वो अक्सर कुछ न कुछ कह बैठते हैं. दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जिनके पास कहने के लिए पूरा खजाना ही होता है पर वे चाहकर भी मौके पर कुछ बोल नहीं पाते हैं। हर तरफ बोलने की कला और अभिव्यक्ति के तौर तरीकों पर इतना जोर दिए जाने के बावजूद बहुतेरे लोग हैं जिनके लिए यह काम पहाड़ जैसा है।
इमेज एन्ड इफेक्टिव स्पीकिंग प्रेसेंटेशन के माध्यम से डॉ.जैन ने कहा कि झिझक, संकोच. भय, आशंका, आत्महीनता न जाने कितनी चीजें बोलने वालों की राह में अवरोधक बनकर खड़ी हो जाती हैं. कभी वे चाह कर भी बोल नहीं पाते हैं, कभी उनके भीतर अपनी बात कहने की तत्परता ही नहीं दिखती, पर सच तो यह है कि बोलना अक्सर उनके लिए एक दूभर कार्य हो होता है. लिहाज़ा डॉ.जैन का कहा कि ठीक समय पर, सही ढंग से अपनी बात न कह पाने के कारण वे प्रगति की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। आज सूचना-संचार के अंतहीन विस्तार के दौर में तो यह कहना अधिक सही है कि जो अपनी बात ठीक ढंग से कहेगा वही इस दुनिया के बाज़ार में रहेगा। इसलिए सोचकर कहने के साथ-साथ कहने पर सोचने से भी परहेज़ करना ठीक नहीं है।

डॉ.चन्द्रकुमार जैन ने कहा कि अच्छा बोलकर दुनिया अपनी मुठ्ठी में करना चाहते हैं तो दूसरो की बात ध्यान से सुनें, तभी बोलें। साथ ही उनकी रुचि का ध्यान रखकर बोलें।बोलते समय बेवजह न हाथ नचाएं, न आंखें मटकाए न दूसरों को छुए या हाथ मारें।कुछ खाते हुए कभी न बोलें। बोलते समय थूक के छींटें दूसरों पर न उड़ाएं।किसी दूर खड़े व्यक्ति से दूर से ही चिल्लाकर बात करने की कोशिश न करें, पास जाकर बोलें। शिष्टाचार के साथ बोलें।

डॉ.जैन ने उच्चाधिकारी अपने मातहतों को तुच्छ न समझें। बच्चों के सामने उनके टीचर्स व रिश्तेदारों के लिए अपशब्द न कहें। अपने पद की गरिमा बनाए रखें एवं ऐसी स्थिति से बचें कि आपसे छोटा व्यक्ति आपको जवाब दे जाए। सेवक या किसी भी बाहरी व्यक्ति से अपने घर की बातें न करें, न ही उनके सामने बहस व गाली-गलौज करें।अपनी गलत बात को सही सिद्ध करने के लिए बहस न करें,न ही चिल्ला-चिल्लाकर उसे सही सिद्ध करने की कोशिश करें। अपने से बड़ों के लिए अपशब्द उनकी पीठ पीछे भी न कहें। किसी के मुंह से निकली बात का मजाक अन्य लोगों के सामने न उड़ाएं। न ही भरी महफिल में किसी को शर्मिंदा करें। एक-दूसरे की बात इधर से उधर न करें। एक कान से सुनें, दूसरे से निकाल दें।

दरअसल डॉ.जैन ने स्पष्ट किया कि नपे-तुले शब्दों में, समय और ज़रुरत का ध्यान रखकर कही गई बात की अहमियत बढ़ जाती है।
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