आखिर पी.एचडी. का सपना साकार हुआ….

दर्शकों से खचाखच भरा पांडाल करतल ध्वनि से गूंज रहा था। मंत्री लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक, भारतीय और राजस्थान प्रशासनिक व पुलिस सेवा के अधिकारी, प्रोफेसर,मीडिया कर्मी, स्टूडेंट्स सभी खुशी और जोश से करतल ध्वनि कर रहे थे। जन- जन में लोकप्रिय उनके चहेते जन सम्पर्क अधिकारी को पी. एचडी. की उपाधि प्रदान करने के लिए नाम जो पुकारा गया था। कोटा खुला विश्वविद्यालय में कुलाधिपति और राजस्थान के राज्यपाल श्री बलीराम भगत ने प्रभात कुमार सिंघल को उपाधि प्रदान की तो एक बार फिर मंच और पांडाल करतल ध्वनि से गूंज उठा। उपाधि प्रदान करते समय मंच पर उपस्थित अतिथि स्व. भुवनेश चतुर्वेदी ने राज्यपाल को बताया कि ये हमारे बहुत ही प्रिय जन सम्पर्क अधिकारी हैं तो उन्होंने कमर थपथपा कर होंसला अफजाई की। उपाधि प्राप्त कर लौटते समय अग्र पंक्ति के विशिष्ठ अतिथियों ने मुस्कान और बधाइयों से स्वागत किया। समारोह समाप्त हुआ तो बधाई देनें वाले शुभचिंतकों ने घेर लिया और अपने अपरिमित स्नेह से आप्लावित कर दिया। करीब एक हजार स्नेहिल लोगों के स्नेह की गंगा में आज तक गौते लगा रहा हूं।

मैं भी अंतर्मन तक गदगद था, खुश था और अपने आपको मिली सफलता के लिए गौरवान्वित महसूस कर रहा था। वर्ष 1996, जनवरी 11 का दिन मेरे लिए यादगार बन गया जब पी. एचडी. की उपाधि प्राप्त करने का मेरा 18 वर्ष पुराना सपना पूरा हुआ था। इस सपने को पूर्ण करने के सूत्रधार बने मेरे गुरुदेव शोध मार्गदर्शक इसी विश्वविद्यलाय में इतिहास विभाग के हैड प्रॉफेसर डॉ. बृज किशोर शर्मा इतने भाव विभोर हो गए कि उन्होंने बांहे फैला कर गले से लगा लिया और अपना आशीर्वाद प्रदान कर कहा खूब तरक्की करो। आखिर मै उनका पहला छात्र था जिसे इस उपाधि से नवाजा गया था।

उपाधि मिलने के पीछे की कहानी भी कम रोचक नहीं है। संघर्ष की मुकम्मल दास्तान है। जयपुर में एक निजी कम्पनी में नौकरी करते हुए 1977 में इतिहास विषय में स्वपाठी छात्र के रूप में राजस्थान विश्व विद्यालय से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त करने पर वहीं इतिहास के प्रॉफेसर जयनारायण आसोपा के निर्देशन में ” राजपुताने में पुलिस प्रशासन 1857 से 1947″ विषय पर पी. एचडी. करने के लिए पंजीकरण करा लििया।

दो साल तक विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय और बीकानेर के राजकीय अभिलेखागार में कठिन अध्यन कर सामग्री संकलित की। जून माह में बीकानेर रहकर अध्यन करना, एक माह तक रोज गर्म लू के थपेड़ों और रेतीली आंधियों के बीच पैदल अभिलेखागार पहुंचना और तपती रात की गर्मी, ऊपर से बिजली की आंखमिचौली बहुत ही कष्ट कारक रहा। मन में लग्न थी, पी. एचडी. जो करनी थी सब सहा।

इसी बीच 20 फ़रवरी 1979 को नौकरी की एक परीक्षा का परिणाम आया, सहायक जन सम्पर्क अधिकारी के रूप में चयन और कोटा सूचना केंद्र में नियुक्ति की सूचना प्राप्त हुई। एक बार तो विचार बना पहले पढ़ाई पूरी कर ली जाए, पर पुलिस विभाग में सेवारत मेरे पिता ने सुझाया आज के जमाने में नौकरी मुश्किल से मिलती है। तुम्हारा चयन भी हो गया है, पहले नोकरी ज्वॉइन करो, भाग्य में होगा तो पढ़ाई बाद में हो जाएगी। पढ़ाई पूरी नहीं कर पाने का मलाल लिए और शायद आगे कभी होगी इसी विचार के साथ 1 मार्च 1979 को कोटा में नोकरी ज्वॉइन करली। कुछ साल, नई नोकरी, नया काम था अतः इसे सीखने और अपने को स्थापित करने के परिश्रम में गुजर गए। समय निकाल कर यह जरूर किया की जो कुछ संकलित किया था उसे लिख कर व्यवस्थित कर लिख लिया। इसी बीच पत्राचार द्वारा राजस्थान विश्व विद्यालय से पत्रकारिता और जन संचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी
कर लिया जो नौकरी की दृष्टि से उपयोगी था।

जन सम्पर्क अधिकारी पद पर पदोन्नति भी हो गई। करीब 14 साल बीत गए पी. एचडी. करना तो अब दिवा स्वप्न जैसा हो गया था। शायद मेरे भाग्य में नहीं यही सोच कर मलाल रहता था और कभी – कभी लिखी गई पांडुलिपि को देख कर ही संतोष कर लेता था। इतना समय बीतने पर मेरा पंजीकरण भी रद्द हो गया था।

कहते है “होई वही जो राम रची राखा” यह उक्ति उस समय सार्थक होती लगी जब जनवरी 1994 को जयपुर के मेरे एक मित्र डॉ. बृजकिशोर शर्मा अचानक मुझे कोटा के जे.के. लॉन शिशु एवं महिला चिकित्सालय में मिल गए। लंबे समय बाद मिले तो जी भर कर मित्रों में खूब बातें हुई और वहीं एक दुकान पर चाय की चुस्कियां ले कर बतियाते रहें। याद आया तो बोले भाई तुम्हारी पी. एचडी. का क्या हुआ?

सारी कथा उन्हें बताते हुए कहा अब क्या होगी शर्मा जी।

शर्मा जी ने कहा पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती अगर तुम वास्तव में गम्भीर हो तो मै कोटा विश्व विद्यालय में अपने गाइडेंस में पंजीकरण करा देता हूं। तुमने काफी काम किया हुआ है, तुम्हें दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार जाना होगा।

पूरा करने में तीन साल लगेंगे। उनका यह कहना था मुझे लगा जैसे घर बैठे गंगा आ गई। सपने फिर से साकार होते लगे। अब क्या था नवीन पंजीकरण हुआ और जुट गए सुषुप्त सपनों की नई उड़ान भरने को।

तत्कालीन जिला कलेक्टर श्री तपेंद्र कुमार ने एक महीने के अवकाश की मंजूरी दे कर प्रेरित भी किया। ग्रेटर कैलाश से एक माह तक सिटी बसों में खड़े – खड़े धक्के खाते हुए आना – जाना और सुबह 10 से शाम 8 बजे तक राष्ट्रीय अभिलेखागार में अध्यन कर वापस लौटा तो मौलिक सन्दर्भ की करीब 2500 ज़ेरॉक्स प्रतियां मेरे साथ थी। लिखना शेष रह गया था सो नोकरी के दबावों के बीच भी देर रात तक जाग कर तीन साल में यह प्रोजेक्ट पूरा कर लिया। जिसका सुफल हजारों गणमान्य लोगों की गरिमामय उपस्थिति में मुझे प्राप्त हुआ और मेरा सपना साकार हुआ।
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