डिजिटल इंडिया या दिमागी गुलामी

प्रधानमंत्री ने ‘डिजिटल इंडिया’ कार्यक्रम का काफी धूम-धड़ाके से उद्घाटन कर दिया है। यदि सरल हिंदी में कहा जाए तो इसे हम सूचना-क्रांति कह सकते हैं लेकिन हमारी सरकार में बैठे महान राष्ट्रवादी नेताओं को ‘डिजिटल इंडिया’ के लिए भारतीय भाषाओं का कोई शब्द नहीं मिला। यह उनकी बौद्धिक अपंगता है। मुझे डर है कि एक लाख करोड़ रुपए के इस विशाल कार्यक्रम को यह बौद्धिक अपंगता घेरे रहेगी।

‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्मार्ट सिटी’ जैसे अंग्रेजी शब्दों के साथ अब दिमागी गुलामी का यह नया शब्द, ‘डिजिटल इंडिया’, भी जुड़ गया है। इस कार्यक्रम के तहत सरकार देश की जनता को इंटरनेट याकि अंतर्जाल की सुविधा सर्वत्र सुलभ करवाएगी। देश के दूर-दराज के गांवों को एक-दूसरे से और शहरों से जोड़ेगी। लगभग प्रत्येक भारतीय को चलित फोन याकि मोबाइल फोन से जोड़ेगी। लोग-बाग अपने फोन से ही अनेक काम घर बैठे-बैठे संपन्न कर लेंगे। टिकटों का आरक्षण करवा लेंगे, चीज़े खरीद-बेच सकेंगे, अर्जियां भरकर फोन या कंप्यूटर से ही भिजवा सकेंगे, लेन-देन के लिए उन्हें बैंक जाने की जरुरत नहीं होगी। दुनिया भर की जानकारी वे घर बैठे ही प्राप्त कर सकेंगे। इसमें शक नहीं कि यह सूचना-क्रांति होगी। भारत में अब नए युग का सूत्रपात होगा।

लेकिन डर यहीं है कि हमारी सरकार के महापंडित नेता इसे ज्ञान-क्रांति कहने लगेंगे। उन्होंने ऐसा कहना शुरू भी कर दिया है। वे सूचना को ही ज्ञान समझते हैं। यूनानी दार्शनिक सुकरात ज्ञान को बड़ा सद्गुण मानते थे लेकिन जरा पूछा जाए कि अमेरिका और यूरोपीय देशों का, जहां यह सूचना क्रांति संपन्न हो चुकी है, क्या हाल है? क्या वहां के लोग सद्गुणी हो गए हैं? इन देशों में जितने अपराध, बलात्कार, व्यभिचार, हत्या आदि होते हैं, उतने दुनिया के कई पिछड़े कहे जाने वाले देशों में नहीं होते।

इसका अर्थ यह नहीं कि हम नई-नई तकनीकें न अपनाएं। जरूर अपनाएं लेकिन इनके खतरों से भी आगाह रहें। इंटरनेट की वजह से देश में अश्लीलता का प्रचार पिछले दस-बीस सालों में जितना हुआ है, शायद पिछले 10-20 सदियों में नहीं हुआ। हमारी संपूर्ण इंटरनेट सूचना प्रणाली का संचालन कौन करता है? विदेशी कंपनियां! गूगल, माइक्रोसाफ्ट, एपल, याहू, स्काइप और फेसबुक वगैरह। घोड़ा हमारा है और लगाम उनकी है। ये कंपनियां करोड़ों रुपए रोज का मुनाफा हमसे कमाती हैं। हमारी जासूसी भी अपने आप हो जाती है। ई-कामर्स के जरिए रोज़ करोड़ों-अरबों का खेल हो रहा है लेकिन रोजगार कितने लोगों को मिल रहा है? हमारी खून—पसीने की कमाई के अरबों—खरबों रुपए ये मालदार देश क्यों उड़ा ले जाते हैं? हम अपने ‘सर्वर’ क्यों नहीं लगा सकते? हम सर्वश्रेष्ठ मोबाइल फोन क्यों नहीं बना सकते? हम गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां क्यों नहीं खड़ी कर सकते? देश के सिर्फ 25 करोड़ लोगों को मिलनेवाली सूचना की इस सुविधा से शेष एक सौ करोड़ लोग वंचित हैं और ज़रा सरकार यह तो बताए कि वह अंग्रेजी के जरिए आम जनता तक इस कार्यक्रम को कैसे पहुंचाएगी? जब तक भारतीय भाषाएं इस कार्यक्रम का माध्यम नहीं बनेंगी, इस कार्यक्रम की भौतिक अपंगता भी बढ़ती चली जाएगी।

साभार- http://www.nayaindia.com/ से�