डॉ. रघुराज सिंह कर्मयोगी : साहित्य और तकनीकी के अनोखे साहित्यकार

देश के साहित्यकारों में कोटा के डॉ.रघुराज सिंह कर्मयोगी एक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने तकनीक के क्षेत्र में होते हुए भी हिंदी साहित्य की वृद्धि में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। साथ ही अपनी तकनीकी विधा को भी साहित्य का हिस्सा बनाया। आसान नहीं होता दो विपरीत विधाओं पर एक साथ काम करना। विज्ञान में दो विपरीत ध्रुव अलग – अलग दिशाओं में खींचते हैं जब कि ये उनके बीच चुंबक का कार्य कर तकनीक और साहित्य को जोड़ कर साहित्य के क्षेत्र में अनोखे साहित्यकार बन कर उभरे हैं।

तकनीकी में इन्हें जहां महारत हांसिल है वहीं कविताएं, कहानियां,बाल कथाएं, लधु कथाएं,नाटक, निबंध और उपन्यास विधा में भी सिद्धहस्त लेखक हैं और देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी 251 रचनाएं अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। सात साझा संग्रहों में भी इनकी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं। इन्होंने पत्रिका “प्रयास” रेलवे वर्कशॉप कोटा, स्मारिका लज्जाराम मेहता स्मारिका श्रावणी तीज मेला एवं स्मारिका,कर्मयोगी साहित्य सेवा संस्थान,कोटा का संपदान भी किया है। साहित्य समिति कोटा की 110 काव्य गोष्ठियों एवं साहित्यिक कार्यक्रमों का सफल आयोजन भी इनके नेतृत्व में किया गया है। इन्होंने 2013 से समिति के अध्यक्ष के रूप में अब तक 378 रचनाकारों को सम्मानित किया है।दूरदर्शन राजस्थान जयपुर केंद्र और आकाशवाणी कोटा से कई बार आपकी कविताओं और कहानियों का प्रसारण भी किया जा चुका है।

कृतियां
इनकी पहली कृति 2001 में “थाम लो तिरंगा-शौर्यगाथाएं” के रूप में सामने आई। यह क्रम 2021 में आई अंतिम तेरहवीं कृति “नैनों की मत सुनियो-काव्य संग्रह” के बाद निरंतर जारी है। इस बीच में इनकी “मटकी भर पानी- कहानी संग्रह” ,”आज का एकलव्य-कहानी संग्रह ” ,”सीता लौट आओ- कहानी संग्रह”, शिक्षा ही धन है-बाल कहानी संग्रह”, “दादी घर चलो-बाल कहानी संग्रह”, “ओठों की थरथराहट-लघुकथा संग्रह” , “देहदान-नाटक संग्रह”, “चंबल का कलरव-निबंध संग्रह”, “नीले आसमान की परछाई उपन्यास”, “पिघलते हिम शिखर-उपन्यास” और “सिसकती आहटें काव्य संग्रह” प्रकाशित हुए।

आपने साहित्य सृजन के साथ – साथ तकनीकी के अपने क्षेत्र में अब पांच पुस्तकों “वैगन मेंटीनेंस टैक्नोलॉजी”, पैसेंजर कोच मेंटीनेंस टेक्नोलॉजी”, आधुनिक वेगनों का रखरखाव एवं कार्य सिद्धांत”,”आधुनिक केरिज एवं वैगन परीक्षा गाइड” और “रेलवे लोको इंजनों का संचालन एवं कार्य सिद्धांत” नामक पुस्तकों का लेखन और प्रकाशन भी करवाया। देश की विभिन्न पत्रिकाओं में आपकी जीवनी भी प्रकाशित की गई है। विभिन्न मीडिया चैनल्स द्वारा विशेष अवसरों पर इनका साक्षात्कार ले कर प्रसारित किया गया है।
आपके एक गीत की बानगी देखिए…….
लीलाधर गिरधारी कृष्णा मोर मुकुट धारी।
गल बैजयंती माल सुशोभित पीतांबर धारी।
धर्म प्रेम के कारण तुमने लियो प्रभु अवतरणा।
आ जा खेलें कुंज गलिन में जय श्री राधे कृष्णा।
मथुरा में तेने जन्म लियो नंदलाला नाम कहायौ।
मांतु जसोदा आंगन खेलियो राधा रास रचायौ।
मोहिनी सी छवि देख निहारुं मिट जावै त्रिसना।
आजा खेलें कुंज गलिन में जय श्री राधे कृष्णा।
बाल सखा संग तोड़ी मटकी माखन मिश्री खायौ।
मारौ टोल गेंद गई जमुना कालिया नाग भगायौ।
ग्वालिन चुगली कर मैया सों बंधवाइ दिए चरणा।
आ जा खेलें कुंज गलिन में जय श्री राधे कृष्णा।
सुनत बांसुरी की मीठी धुन बछियां दौड़ी आवें।
पग पैजनिया कमर करधनी वृंदावन हुलसावें।
निर्वस्त्र स्नान मना है जग में होइ वस्त्र हरणा।
आ जा खेलें कुंज गलिन में जय श्री राधे कृष्णा।
मुट्ठी भर भर माटी खाई मैईया डांट पिलाई।
अंतरिक्ष के चंदा रविरथ कान्हा दरश कराई।
मान बढ़ायौ प्रभु जी मेरौ पड़ौ आप शरणा।
आ जा खेलें कुंज गलिन में जय श्री राधे कृष्णा।

पुरस्कार एवं सम्मान
आपको साहित्य और तकनीक लेखन के लिए अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया। बाल साहित्य और शोध एवम् विकास संस्थान, सिरसा द्वारा इनको “दादी घर चलो” और “शिक्षा ही धन है” बाल कहानियों के लिए सिरसा में 30 सितंबर को माता इंदिरा स्वपन्न बाल साहित्य पुरस्कार -23 से सम्मानित किये जाने की घोषणा की गई है। इनको रेल कर्मचारियों के लिए “बैगन मेंटीनेंस टेक्नोलॉजी” पुस्तक हिंदी में लिखने पर रेल मंत्री द्वारा 7 अप्रैल 1999 को लालबहादुर शास्त्री तकनीकी लेखन पुरस्कार अभिनंदन पत्र एवं दस हजार रुपए से सम्मानित किया गया। भारतेंदु समिति कोटा द्वारा राष्ट्रीय स्तर की उपाधि “साहित्य श्री” से वर्ष 2003 में नवाजा गया। “मटकी भर पानी” कहानी संग्रह पुस्तक पर भारतीय दलित साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा 30 दिसंबर 2008 को डॉ.बी.आर.अंबेडकर फैलोशिप एवं स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।

रेल राजभाषा पत्रिका ने 9 जुलाई 2012 को इनकी कहानी”अंगूठे की बलि” को सर्वश्रेष्ठ कहानी घोषित कर पुरस्कार स्वरूप700 रुपए प्रदान कर सम्मानित किया।”आज का एकलव्य” कहानी संग्रह पुस्तक पर मुंशी प्रेमचंद कथा साहित्य पुरस्कार एवं छ: हजार रुपए नगद राशि प्रदान कर रेल मंत्री द्वारा 11फरवरी 2014 को सम्मानित किया गया। प.म. रेलवे जबलपुर के महाप्रबंधक ने 15 अगस्त 2014 को रेल कर्मचारियों के नाम जारी संदेश में साहित्यिक इनकी उपलब्धियों के लिए विशेष उल्लेख के रूप में इनका नाम रेलवे गजट में शामिल किया जाना बड़ी उपलब्धी है। साहित्य, कला एवं संस्कृति संस्थान हल्दीघाटी,नाथद्वारा में 3 सितंबर 2017 को राष्ट्रीय कार्यक्रम में प्रेमचंद कथा सम्मान प्राप्त करने का गौरव प्राप्त हुआ। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी शिलांग मेघालय न 25 – 27 मई 2019 को आयोजित कार्यक्रम में पूर्ण जीवन की उल्लेखनीय
साहित्यिक उपलब्धियों के लिए शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया। इन महत्वपूर्ण पुरस्कार और सम्मान सहित इनको समय – समय पर राजस्थान ही नही देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा लेखन और तकनीकी उपलब्धियों, उत्कृष्ठ सेवाओं और कार्यों तथा विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने पर अब तक 6 दर्जन से अधिक पुरस्कार, पदक, नकद राशि, अलंकरण आदि के रूप में प्रदान कर सम्मानित किया जा चुका हैं, जो न केवल इनके लिए वरन समस्त साहित्यकार बंधुओं के लिए गौरव का विषय है।

परिचय : लेखक और कवि के रूप में विख्यात डॉ.रघुराज सिंह कर्मयोगी का जन्म 9 अगस्त 1951 को पिता स्व.र्श्री मूलचंद कर्मयोगी एवं माता स्व. श्रीमती चंपा देवी के परिवार में हुआ। आपने आगरा से यांत्रिक अभियंत्रण में डिप्लोमा किया और आपको विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ द्वारा विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि प्रदान की गई। आप पश्चिमी – मध्य रेलवे से सहायक मंडल यांत्रिक अभियंता पद से सेवा निवृत हुए। आपने रामा औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र में प्राचार्य के रूप में सेवाएं दीं।

संपर्क : मो. 8003851458

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवम् पत्रकार,कोटा