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कहाँ गई खो गई हमारी वो कला और संस्कृति?

हम सब जैसे बच्चे जाते थे। पहले सर डुबो-डुबोकर तालाब खूब नहाते मस्ती करते और बाद में बढ़िया-बढ़िया मिट्टी निकाल कर सबका बर्तन भरते थे।

सब तालाब की मिट्टी नहीं लाई जाती थी जिस तालाब में बालू कम रहता था। चिकनी मिट्टी ज्यादा रहती थी उस तालाब से मिट्टी निकाली जाती थी। मेरी नानी हमेशा अपने बाल इसी चिकनी मिट्टी से धोया करती थीं। उनके बाल बड़े मुलायम रहते थे और काफ़ी समय तक काले थे।

इस मिट्टी से वर्ष भर के लिए चूल्हे, थवना (खटाई का बर्तन टिकाने के लिए उसके नीचे रखने वाला छल्ले के आकार का), वर्ष भर चूल्हा लिपने के लिए मिट्टी के धोधे बनाए जाते थे। कुछ लोग इसी दौरान अनाज धान-गेहूं संरक्षित करने के लिए मिट्टी की डेहरी, दलहन-तिलहन के लिए धुनकी बनाते थे।

हमारी तरफ चित्र में दिख रही की तरह नहीं बनती थी उसके पांच या सात पाटे बनते थे। पहले नीचे तला बनता था फिर एक पाटा बनाकर उसमें छेद किया जाता था, जिससे अनाज निकाला जा सके। हर दिन दो पाटा बनता था। जिसे मोड़ कर गोलाकार देते थे। मोड़ते समय टूटे न इसलिए मिट्टी में भूसा मिलाते थ और पाटे में रस्सी डालते थे। इन सभी पाटो को एक के ऊपर एक चढ़ाया जाता था फिर उस पर अगले दिन मिट्टी लगाकर समतल और सुंदर बनाया जाता था।

डेहरी बाहर धूप में बनती थी ताकि पर्याप्त मात्रा में धूप मिल सके और पूरी तरह सूख सके लेकिन पाटा मोड़कर आकार देते समय पाटे की मिट्टी इस तरह रहती थी की न अधिक गीली हो न अधिक सूखी हो ताकि आसानी से मुड़ सके। ज़ब डेहरी की मन मुताबिक ऊंचाई हो जाती थी।

तब उसके सारे पाटे जहाँ से जोड़कर एक दूसरे पर चढ़ाये रहते थे वहाँ से आराम से अलग किये जाते थे फिर घर में उसके स्थाई जगह पर रखा जाता था। पहले नीचे नीम की पत्ती रखकर ऊपर से अनाज भर देते थे। मिट्टी का ही ढक्कन बनाते थे जिसे पिहाना कहते थे।

उससे ढंककर मुँह बंद कर दिया जाता था। ज़ब अनाज निकालना हो तब तले की तरफ बने छोटे मुँह से निकालकर फिर उसे मिट्टी लगाकर बंद कर दिया जाता था। अब तो न कच्चे घर रहे,न डेहरी रही, न डेहरी बनाने वाले लोग, न मिट्टी निकालने वाले लोग रहे।

(लेखिका सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती हैं।)

साभार- https://twitter.com/bhagwa_sonam/