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राम मंदिर के निर्माण के लिए घी बचाने का संकल्प

सन 2014 के आसपास की बात होगी, जोधपुर में एक युवा साधु सड़क पर घूमती बीमार और कमजोर गायों को देख कर द्रवित होता है, और फिर एक गौशाला स्थापित करता है। पहले ही दिन लगभग साठ गायें उस गौशाला में स्थान पाती हैं। ये सब वे गायें हैं जो अब दूध नहीं देतीं। मालिकों ने पगहा काट कर हांक दिया और वे किसी धंधेबाज के हाथ में पड़ कर कत्लखानों तक पहुँचने की प्रतीक्षा कर रही थीं। गौभक्ति इस देश के मूल चरित्र में है, और यही कारण है कि गौशालाओं के लिए दान करने वालों की यहाँ कभी कमी नहीं रही। साधु प्रयत्न करते हैं तो उन्हें सहयोग करने वाले भी अनेकों मिल जाते हैं। गायों की संख्या बढ़ती है। दूध का उत्पादन भी होने लगता है और गौशाला में दही घी भी निकलने लगता है। थोड़ा सा घी आश्रम में दीप,आरती में प्रयोग होता है, शेष बचता रहता है। साधु महाराज दूध घी का व्यापार नहीं करते। फिर एक दिन मन में विचार आता है, “कभी तो राम मंदिर पर कोर्ट का निर्णय आएगा! कभी तो अयोध्या में मन्दिर का निर्माण होगा! कभी तो जलेगा राम मंदिर में अखंड दीप… कभी तो लौटेंगे राम, कभी तो होगी राजा दशरथ के महल में महाआरती… क्यों न तब के लिए घृत एकत्र किया जाय?” “किंतु घी तो एक समय के बाद खराब हो जाता है… यदि गायों के आहार की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाय, और घी में कुछ जड़ी बूटी मिलाई जाय, तब भी दस बारह वर्षों से अधिक समय तक ठीक नहीं रह सकता गाय का घी… मन्दिर तो जाने कब बनेगा… बनेगा, बनेगा या नहीं बनेगा, कौन जानता है? फिर?” तब साधु सोचता है, कौन जाने, प्रभु शीघ्र ही निर्माण कराने वाले हों। सबकुछ बदला बदला सा तो लग ही रहा है… हवाओं में एक पवित्र गन्ध तो तैरने ही लगी है… मनुष्य के व्यवहार में पुनर्जागरण के संकेत तो दिखने ही लगे हैं… भरोसा रख रे मन! सब शुभ होगा…” और वह युवक सन्यासी उसी दिन से घृत इकट्ठा करता है। उस राम मंदिर में दीपक जलाने के लिए, जिसके बनने की अभी कोई आशा नहीं! साधु अपनी ओर से कुछ सावधानियां रखता है। गायों को घास और पानी के अतिरिक्त और कुछ नहीं देता। उसे घी की शुद्धता का ध्यान रखना है। वह इसके साथ कुछ और प्रयोग करता है। उस गोशाले में हमेशा श्रीमद्भगवतगीता के श्लोक बजते रहते हैं। और फिर! इस संसार में कुछ भी असम्भव नहीं दोस्त! ईश्वर पल भर में हर किंतु,परंतु का अंत कर देता है। जिसके लिए हम सोचते हैं कि यह कभी नहीं हो सकता, वह यूँ ही हो जाता है। समय करवट ले चुका है। दो महीने बाद 17 नवम्बर को जोधपुर के वे सन्यासी 216 बैलों से जुते 108 छकड़ों पर लाद कर छह सौ किलो गाय का शुद्ध घी और हवन सामग्री लिए अयोध्या के लिए निकल रहे हैं। जितना हो सके, उतने घरों से बटोर लेंगे एक एक मुट्ठी सामग्री! स्वाभिमान के इस महायज्ञ में जितनी आहुतियां पड़ जांय, शुभ है। साधु का संकल्प पूरा हो रहा है… राष्ट्र का संकल्प पूरा हो रहा है… युग बदल रहा है भारत! सब शुभ होगा… सब मङ्गल होगा…

साभार- https://t.me/modified_hindu4/29659 से