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सौराष्ट्र का जल देवताः मनसुख भाई

आज जिस तरह देश के दर्जन भर राज्यों में भीषण सूखा पड़ रहा है, सौराष्ट्र में 18 वर्ष पहले ऐसी ही समस्या देखी गई थी। वर्ष 1998 में भूजल 700 मीटर नीचे तक जा पहुंचा था। परंतु 12वीं कक्षा पास मनसुखभाई सुवगिया के अथक प्रयासों के कारण आज भूजल का स्तर 40 फीट तक रह गया है। चेक डैम और झीलें बनाने की सस्ती विधि की मदद से वे अभी तक क्षेत्र के गांवों में 3000 चेक डैम और 300 झीलें बना चुके हैं।
जलयोद्घा मनसुखभाई की यात्रा 15 वर्ष पहले जूनागढ़ जिले के मेंदरदा तालुका के तहत आने वाले जमका गांव से शुरू हुई थी। यहां के निवासियों ने उनकी प्रेरणा से और बिना किसी सरकारी मदद के 55 चेक डैम बना दिए थे। ये सभी बांध आज भी काम कर रहे हैं। मनसुखभाई को ‘चेक डेम वाडो भाई’ के नाम से गुजरात भर में जाना जाता है। उन्हें देश भर में चेक डैम और झीलों के सबसे सस्ते मॉडल तैयार करने का श्रेय जाता है।

गुजरात में 1995 से 1998 में पड़े भीषण सूखे के कारण उन्हें विचार आया था कि प्रत्येक गांव में जलधाराओं पर पांच से लेकर पचास चेक डैम होने चाहिए और गांव से बाहर झीलें बनाई जानी चाहिए। सरकार की ओर से निराशाजनक जवाब मिलने पर उन्होंने खुद ही एक पांच सूत्री कार्यक्रम तैयार किया था। जल संरक्षण और जल स्रोतों के निर्माण को लेकर उन्होंने जन सभाएं भी आयोजित कीं। इसके बाद उन्होंने बांध बनाने के लिए 500 गांवों में 2000 स्थानों का चुनाव किया। उन दिनों सरकारी चेक डैम्स योजनाओं की कीमत 2 से 10 लाख रुपये के बीच थी और एक गांव में 5 से 50 चेक डैम बनाए जाने का खर्च कोई नहीं उठा सकता था। लेकिन मनसुखभाई ने आरसीसी से एक नया स्थायी डिजाइन तैयार कराया। उन्होंने जन सभाएं की और पैसा एकत्र करने के लिए सामुदायिक प्रयासों पर जोर दिया। इससे किसानों, मवेशी पालकों, अध्यापकों और दिहाड़ी मजदूरों को ग्रामीण सामुदायिक योजना में पैसा देने की प्रेरणा मिली। वे खुद 30 गांवों में गए और एक से लेकर 90 दिनों तक बांध बनाने वाले स्थानों पर गुजारे। इस तरह पांच वषार्ेंं तक के लंबे अरसे में दिन-रात एक करके चेक डैम और झीलों के जरिये जल संरक्षण का कार्य शुरूहो पाया।

उन्होंने जमका गांव के निवासियों के साथ अपनी मेहनत के 20,000 ‘मैन डेज’ व्यतीत करने के बाद 51 चेक डैम और दो विशालकाय झीलें तैयार कीं। बिना सरकारी मदद और गिनी-चुनी पूंजी के दम पर जमका जल संकट से उबर सका। मनसुखभाई ने इस मॉडल को राज्य के कई अन्य जिलों में भी दोहराया।

जनता में जागरूकता फैलाने के लिए 1999 में जमका गांव में जल क्रांति दिवस मनाया गया। देश में पहली बार जल संरक्षण के इस क्रांतिकारी प्रयास के आयोजन में 50,000 से अधिक लोगों ने शिरकत की थी। इस अवसर पर मनसुखभाई ने लोगों को उनके गांवों में जल संकट दूर करने और जल संरक्षण के कार्य को करने से जुड़ी शपथ दिलाई। इस ऐतिहासिक आयोजन पर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों के साथ उपस्थित थे।

मनसुखभाई के प्रयासों के कारण वषांर्ें से सूखी पड़ी छोटी नदियां एक बार फिर पानी से लबालब हो गई थीं। जिन स्थानों पर चेक डैम योजना शुरू हुई वहां सिंचाई में भी 40 से 100 प्रतिशत तक वृद्घि हुई थी। कृषि उत्पाद, ग्रामीण रोजगार और चारा उत्पाद भी दोगुना हुआ। भूजल से सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाली बिजली में भी 50 प्रतिशत की कमी आई। प्रमोद कुमार

एक नजर काम पर
जूनागढ़ जिले से शुरू हुआ प्रयोग संपूर्ण गुजरात में लागू
चेक डैम और झीलें बनाने की सस्ती विधि की मदद से अभी तक गांवों में 3,000 चेक डैम बनावाएं।
विशेषता: 18 वर्ष पहले पानी का जल स्तर 700 फीट से नीचे था पर अब 40 फीट पर आ गया है।

सूखे की समस्या से निपटने का एक मात्र रास्ता चेक डैम है। बड़े बांध सब जगह नहीं बन सकते। सभी राज्य सरकारों को जन सहयोग से यह काम करना चाहिए।— मनसुखभाई सुवगिया , गुजरात

साभार- साप्ताहिक पाञ्चजन्य से

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